Shatavari Farming: इस औषधीय फसल की जड़ का भाव 1 लाख रुपये क्विंटल, रामपुर के किसान कर रहे खेती

Shatavari Farming: इस औषधीय फसल की जड़ का भाव 1 लाख रुपये क्विंटल, रामपुर के किसान कर रहे खेती


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Farming Tips: 9 बीघे में उगाई शतावरी, जानिए कितने महीने में तैयार होती है फसल

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रामपुर: खेती में अच्छी कमाई के लिए फसल का सही चुनाव करना जरूरी है. इसी वजह से किसान अब पारंपरिक फसलों के साथ औषधीय फसलों की खेती में भी रुचि ले रहे हैं. रामपुर के अजीमनगर क्षेत्र के किसान जलीस अहमद करीब 9 बीघे में नेपाली वैरायटी की शतावरी उगा रहे हैं. किसान के मुताबिक, पिछले साल इसकी जड़ों का भाव 90 हजार से 1 लाख रुपये प्रति क्विंटल तक मिला था. आइए जानते हैं शतावरी की खेती कैसे की जाती है और इसका बाजार भाव कितना है.

रामपुर: किसान अगर फसल का सही चुनाव करें, तो खेती से अच्छी कमाई कर सकते हैं. इसके लिए पारंपरिक फसलों के साथ औषधीय फसलों की खेती भी एक विकल्प हो सकती है. ऐसी ही एक फसल शतावरी है, जिसकी जड़ों से पाउडर और अर्क तैयार किया जाता है. इनका इस्तेमाल आयुर्वेदिक उत्पादों में होता है. रामपुर के अजीमनगर क्षेत्र में किसान बड़े पैमाने पर शतावरी की खेती कर रहे हैं. इस फसल को तैयार होने में समय जरूर लगता है, लेकिन बाजार में इसकी जड़ों की अच्छी कीमत मिलने से किसानों को कमाई की उम्मीद रहती है.

रामपुर के किसान जलीस अहमद नेपाली वैरायटी की शतावरी की खेती कर रहे हैं. उन्होंने करीब 9 बीघे में यह फसल लगाई है. किसान के मुताबिक, उन्हें एक पौधा करीब 1 रुपये 60 पैसे का पड़ा था. शतावरी को पूरी तरह तैयार होने में लगभग 18 से 24 महीने का समय लग सकता है. इसके बाद खेत से इसकी जड़ों की खुदाई की जाती है और उन्हें बाजार में बेचने के लिए तैयार किया जाता है.

शतावरी की सबसे बड़ी खासियत इसकी जड़ें हैं. इनसे पाउडर और अर्क तैयार किया जाता है, जिनका इस्तेमाल आयुर्वेदिक दवाओं में होता है. इसके अलावा शतावरी से बने उत्पादों का इस्तेमाल टॉनिक, महिला स्वास्थ्य और ऊर्जा से जुड़े उत्पादों में भी किया जाता है. इसी वजह से बाजार में इसकी जड़ों की मांग बनी रहती है. शतावरी की खेती बीज से शुरू होती है. किसान के मुताबिक, एक एकड़ खेत में इसकी खेती के लिए करीब 5 किलो बीज की जरूरत होती है. सबसे पहले बीज से पौधे तैयार किए जाते हैं. इसके बाद पौधों को खेत में लगाया जाता है. एक बीघे में करीब 1200 पौधे लगाए जा सकते हैं. पौधे से पौधे के बीच लगभग 2 फीट की दूरी रखी जाती है, ताकि उन्हें बढ़ने के लिए पर्याप्त जगह मिल सके.

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किसान बताते हैं कि शतावरी की खेती में दूसरी कई फसलों की तुलना में पानी की जरूरत कम पड़ती है. उनके मुताबिक, करीब महीने में एक बार सिंचाई से काम चल जाता है. साथ ही इस फसल में कीड़ों का प्रकोप कम होने और जानवरों से नुकसान की आशंका कम रहने की बात भी किसान बताते हैं. इससे खेत की बार-बार निगरानी करने की जरूरत कम हो सकती है. जब पौधे पूरी तरह विकसित हो जाते हैं, तो उनकी जड़ों की खुदाई की जाती है. इसके बाद जड़ों को उबाला जाता है और उनका छिलका हटाकर धूप में सुखाया जाता है. इस प्रक्रिया के बाद जड़ें बाजार में बेचने के लिए तैयार होती हैं. किसान के मुताबिक, करीब 25 क्विंटल गीली जड़ों की प्रोसेसिंग के बाद लगभग 2 से 4 क्विंटल तैयार माल बच सकता है.

जलीस अहमद बताते हैं कि पिछले साल शतावरी का भाव करीब 90 हजार से 1 लाख रुपये प्रति क्विंटल तक मिला था. फिलहाल उनकी फसल को लगाए हुए करीब 5 महीने हुए हैं और बाजार में इसका भाव लगभग 65 हजार रुपये प्रति क्विंटल चल रहा है. फसल तैयार होने में अभी काफी समय बाकी है. ऐसे में किसान को उम्मीद है कि तब तक बाजार भाव में और बढ़ोतरी हो सकती है.

किसान के मुताबिक, उनके इलाके में कई किसान शतावरी की खेती कर रहे हैं और अच्छी कीमत मिलने के कारण इससे कमाई भी कर रहे हैं. दूसरे किसानों को इसकी खेती से फायदा मिलता देखकर जलीस अहमद ने भी इसे उगाना शुरू किया. पिछले साल मिले 90 हजार से 1 लाख रुपये प्रति क्विंटल तक के भाव ने उन्हें इस औषधीय फसल की खेती के लिए प्रेरित किया.



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