MOAB Attack On Iran: अमेरिका और ईरान के बीच छह महीने से ज्यादा समय से जारी संघर्ष में एक बार फिर बड़ा सैन्य टकराव होने का खतरा मंडरा रहा है. अमेरिकी सेना ने ईरान के ऊर्जा ढांचे और परमाणु ठिकानों को निशाना बनाने के लिए नए हमले की योजनाएं तैयार की हैं. इन योजनाओं में अमेरिका के सबसे बड़े गैर-परमाणु बम ‘मदर ऑफ ऑल बॉम्ब्स’ (MOAB) के इस्तेमाल का विकल्प भी शामिल है. आखिरी बार 2017 में अमेरिका ने अफगानिस्तान में इस बम को गिराया था. अब लगभग 10 साल बाद फिर इसे इस्तेमाल करने की बात सामने आ रही है. CNN की रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिकी अधिकारियों ने यह जानकारी दी है. हालांकि, इस बम की विनाशकारी ताकत के बावजूद सैन्य अधिकारियों के बीच इसके असर को लेकर सवाल हैं. माना जा रहा है कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अगर दोबारा हमले का आदेश देते हैं, तो इसका मकसद सिर्फ ईरान को नुकसान पहुंचाना नहीं, बल्कि ट्रंप को इस युद्ध से निकलने का रास्ता देना भी हो सकता है. वह एक ऐसा रास्ता चाहते हैं, जिसे वह अपनी जीत के तौर पर पेश कर सकें.
ईरान पर गिरेगा अमेरिका का सबसे बड़ा बम
अमेरिकी सैन्य योजनाओं से परिचित अधिकारियों के मुताबिक, ट्रंप प्रशासन ने ईरान के ऊर्जा ठिकानों और परमाणु कार्यक्रम से जुड़े लक्ष्यों पर हमले के विकल्प तैयार करने को कहा है. इनमें GBU-43/B Massive Ordnance Air Blast Bomb यानी MOAB का इस्तेमाल भी शामिल है. यह अमेरिका के हथियारों के जखीरे में मौजूद सबसे बड़ा गैर-परमाणु बम है. यानी इस बम से ज्यादा ताकतवर बम सिर्फ न्यूक्लियर बम है. इसका इस्तेमाल ईरान के साथ मौजूदा संघर्ष में अब तक नहीं हुआ है.
अगर ट्रंप इसे इस्तेमाल करने का आदेश देते हैं, तो युद्ध का स्तर और बढ़ सकता है. रिपोर्ट के मुताबिक, इन योजनाओं में ईरान के उन ठिकानों को भी निशाना बनाने का विकल्प है, जिन्हें जमीन के काफी नीचे बनाया गया माना जाता है. इनमें पिकैक्स माउंटेन (Pickaxe Mountain) का नाम भी शामिल है. अमेरिका और इजरायल को संदेह है कि यहां ईरान के परमाणु कार्यक्रम से जुड़े कुछ हिस्से रखे गए हैं. हालांकि, अधिकारियों के बीच इस बात पर सहमति नहीं है कि MOAB ऐसे ठिकानों को नष्ट करने में कितना कारगर होगा.
MOAB क्या है?
अमेरिका का MOAB (मदर ऑफ ऑल बम्स) करीब 9,800 किलो यानी लगभग 10 टन वजनी सबसे बड़ा गैर-परमाणु बम है. इसमें H-6 नाम का विस्फोटक इस्तेमाल होता है, जो TNT से ज्यादा शक्तिशाली है. यह GPS की मदद से निशाना साधता है और इसे लड़ाकू विमान के बजाय C-130 जैसे बड़े मालवाहक विमान से गिराया जाता है. पैराशूट की मदद से यह हवा में स्थिर होकर नीचे आता है और जमीन से टकराने से पहले हवा में ही फटता है, जिससे धमाके का असर बड़े इलाके में फैलता है. इसे इराक युद्ध के दौर में विकसित किया गया था और 2003 में इसके अंतिम टेस्ट हुए.
इसका मकसद बड़े इलाके में मौजूद सैनिकों, सैन्य उपकरणों और जमीन के ऊपर बने मजबूत बंकरों को निशाना बनाने के साथ दुश्मन के सैनिकों का मनोबल तोड़ना भी था, ताकि वे आत्मसमर्पण कर दें या लड़ाई से पीछे हट जाएं. बाद में इसके इस्तेमाल का दायरा गुफाओं और सुरंगों जैसे जमीन के नीचे मौजूद ठिकानों तक बढ़ाया गया, लेकिन यह गहराई में घुसकर हमला करने वाला बम नहीं है. इसलिए गहरे अंडरग्राउंड परमाणु ठिकानों को नष्ट करने के लिए इसे उपयुक्त नहीं माना जाता. इसकी असली ताकत बड़े इलाके में भारी तबाही मचाना है, न कि जमीन के बहुत अंदर तक पहुंचकर हमला करना.
क्या MOAB से कामयाबी पा सकेगा अमेरिका?
MOAB की सबसे बड़ी खासियत उसका विशाल विस्फोट है. यह जमीन से टकराने से पहले हवा में फटता है, जिससे धमाका चारों तरफ फैलता है. रिपोर्ट के मुताबिक, इसका विस्फोट नौ शहरी ब्लॉक के बराबर क्षेत्र को प्रभावित कर सकता है. लेकिन यही इसकी एक बड़ी सीमा भी है. यह बम बड़े इलाके में सतह पर भारी तबाही मचा सकता है, मगर जमीन के बहुत नीचे मौजूद मजबूत ठिकानों को भेदने के लिए नहीं बनाया गया है. ईरान के जिन परमाणु ठिकानों को निशाना बनाने की बात हो रही है, उनमें से कुछ के मजबूत चट्टानों के नीचे बने होने का संदेह है. पिकैक्स माउंटेन के बारे में माना जाता है कि वहां ग्रेनाइट की कई परतें सुरक्षा देती हैं. ऐसे में MOAB का इस्तेमाल करने के बावजूद इन ठिकानों को पूरी तरह नष्ट करना मुश्किल हो सकता है.
क्या ट्रंप को युद्ध से निकलने का रास्ता चाहिए?
इस पूरी योजना का सबसे अहम पहलू सैन्य ताकत के साथ-साथ राजनीति भी है. अमेरिका में ईरान के खिलाफ युद्ध को लेकर नाराजगी बढ़ रही है. रिपब्लिकन पार्टी को आशंका है कि नवंबर में होने वाले मध्यावधि चुनाव में मतदाता इस संघर्ष को लेकर ट्रंप प्रशासन के खिलाफ प्रतिक्रिया दे सकते हैं. ट्रंप पर युद्ध खत्म करने का दबाव है, लेकिन वह इसे हार के रूप में पेश नहीं होने देना चाहते. रिपोर्ट के मुताबिक, राष्ट्रपति और उनके सलाहकार कई महीनों से ऐसे विकल्पों पर चर्चा कर रहे हैं, जिनके जरिए युद्ध को निर्णायक रूप से खत्म करने का संदेश दिया जा सके.
‘फायरवर्क्स शो’ से जीत का दावा करने की तैयारी?
CNN की रिपोर्ट में एक सूत्र ने सैन्य योजनाओं के कुछ विकल्पों को ‘फायरवर्क्स शो’ जैसा बताया. इसका मतलब ऐसे हमले से है, जो देखने में बहुत बड़ा और विनाशकारी हो, लेकिन जरूरी नहीं कि उससे युद्ध से जुड़े लक्ष्य भी पूरे हो जाएं. इस रणनीति के पीछे कथित तौर पर यह विचार है कि अमेरिका कुछ बड़े हमले करे, फिर जीत का दावा करे और अपनी सेना को वापस बुलाने की प्रक्रिया शुरू कर दे.
आम लोगों की जान पर भी मंडरा सकता है खतरा
MOAB का इस्तेमाल सिर्फ सैन्य ठिकानों को नुकसान पहुंचाने तक सीमित नहीं रह सकता. इसका बहुत बड़ा विस्फोट क्षेत्र आसपास के इलाकों को भी प्रभावित कर सकता है. अगर इसे आबादी के नजदीक मौजूद ऊर्जा ढांचे या दूसरे ठिकानों पर इस्तेमाल किया जाता है, तो आम नागरिकों के हताहत होने की आशंका बढ़ सकती है.
MOAB का आखिरी इस्तेमाल कब हुआ था?
MOAB का इस्तेमाल इससे पहले 2017 में हुआ था. उस समय ट्रंप अपने पहले राष्ट्रपति कार्यकाल में थे और उन्होंने अफगानिस्तान में ISIS के ठिकानों पर इस बम को गिराने की मंजूरी दी थी. अफगान अधिकारियों के मुताबिक, उस हमले में ISIS के 36 लड़ाके मारे गए थे. विस्फोट से तीन अंडरग्राउंड सुरंगें और हथियारों व गोला-बारूद का भंडार नष्ट हुआ था. उस समय अमेरिकी और अफगान अधिकारियों ने कहा था कि हमले में कोई आम नागरिक नहीं मारा गया.