Uttarakhand BJP : 2027 के चुनाव पहले कुमाऊं बना बैटल ग्राउंड, BJP ने उतारे दिग्गज, किस बात का डर?

Uttarakhand BJP : 2027 के चुनाव पहले कुमाऊं बना बैटल ग्राउंड, BJP ने उतारे दिग्गज, किस बात का डर?


हल्द्वानी. उत्तराखंड में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले बीजेपी ने कुमाऊं पर अपना फोकस बढ़ा दिया है. राष्ट्रीय नेतृत्व की सक्रियता से लेकर विधानसभा स्तर पर संगठन की मजबूती और क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व तक, पार्टी की गतिविधियां चुनावी तैयारियों के नए संकेत दे रही हैं. इसकी अहम वजह 2017 और 2022 के चुनावी नतीजे भी हैं. 2017 में कुमाऊं की 29 में से 23 सीटें जीतने वाली बीजेपी 2022 में 18 सीटों पर सिमट गई, जबकि कांग्रेस की सीटें पांच से बढ़कर 11 हो गईं. ऐसे में 2027 से पहले कुमाऊं में भाजपा के सामने अपनी पुरानी बढ़त हासिल करने की चुनौती है. सितंबर में बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन का प्रदेश कार्यसमिति की मीटिंग में भाग लेने के लिए हल्द्वानी दौरा और अब काशीपुर में विधानसभा विस्तारकों एवं प्रभारियों की दो दिवसीय कार्यशाला संगठनात्मक सक्रियता को दिखाती है. 70 विधानसभा क्षेत्रों के विस्तारकों और प्रभारियों के जरिए बूथ स्तर तक संगठन की मजबूती, कार्यकर्ताओं के बीच समन्वय और चुनावी तैयारियों की समीक्षा पर जोर है. कार्यशाला में राष्ट्रीय संगठन महामंत्री बीएल संतोष, प्रदेश प्रभारी राम माधव और मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की मौजूदगी भी अहम है. बीएल संतोष तो कुमाऊं के कई दौरे लगा चुके हैं.

भाजपा की रणनीति में क्षेत्रीय और सामाजिक प्रतिनिधित्व भी महत्वपूर्ण है. कुमाऊं से जुड़े दिनेश आर्य को राज्यसभा भेजना, मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी का क्षेत्र से राजनीतिक जुड़ाव और केंद्रीय राज्य मंत्री अजय टम्टा की मौजूदगी पार्टी को नेतृत्व के अलग-अलग स्तरों पर प्रतिनिधित्व देती है. हालांकि, इस प्रतिनिधित्व का चुनावी लाभ कितना मिलेगा, यह स्थानीय संगठन और जनता के बीच नेताओं की स्वीकार्यता पर निर्भर करेगा.

कांग्रेस ने बढ़ाई चिंता

2022 के चुनाव में कुमाऊं में कांग्रेस की सीटें छह बढ़ीं, जबकि भाजपा की पांच सीटें कम हुईं. यही बदलाव आगामी चुनाव के लिहाज से अहम है. हल्द्वानी जैसे शहरी केंद्रों से लेकर पहाड़ी और तराई की सीटों तक स्थानीय समीकरण अलग-अलग हैं. रोजगार, भर्ती, शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क और पलायन जैसे मुद्दे भी चुनावी माहौल को प्रभावित कर सकते हैं. कांग्रेस भी हल्द्वानी में राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे की रैली के जरिए क्षेत्र में अपनी सक्रियता दिखा चुकी है. भाजपा के लिए चुनौती सिर्फ जीती हुई सीटें बचाने की नहीं, बल्कि उन विधानसभा क्षेत्रों में अपनी स्थिति मजबूत करने की भी है जहां कांग्रेस ने पिछली बार बेहतर प्रदर्शन किया था. इसके लिए संगठन की सक्रियता के साथ स्थानीय नेतृत्व, उम्मीदवारों की स्वीकार्यता और बूथ प्रबंधन निर्णायक होंगे.

निकाय चुनाव ने बढ़ाई धुकधुकी
जून में दो नगर पंचायत नगर बाजपुर की नगर पंचायत गढी नेगी और चंपावत की नगर पंचायत पाटी के चुनाव हुए. तमाम कोशिशों के बावजूद सत्ताधारी बीजेपी दोनों सीटें हार गई. दोनों पर निर्देलीयों ने बाजी मारी. यही नहीं, इसी महीने ऊधमसिंह नगर में नगर पालिका किच्छा और नगर पालिका सिरौलीकलां के पालिका चुनाव में भी बीजेपी को हार का सामना करना पड़ा. इन दोनों सीटों पर कांग्रेस चुनाव जीत गई. चुनाव से ठीक पहले आए ये रूझान बीजेपी के लिए किसी झटके से कम नहीं थे.

कुमाऊं में कांग्रेस के पास दिग्गज
गढ़वाल की तुलना में मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस के पास कुमाऊं में दिग्गज नेताओं की भरमार है. इसमें पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत, पूर्व स्पीकर गोविंद सिंह कुंजवाल, पूर्व सांसद प्रदीप टम्टा, नेता प्रतिपक्ष और बड़ा दलित चेहरा यशपाल आर्य, पूर्व प्रदेश अध्यक्ष करन मेहरा, उप नेता प्रतिपक्ष भुवन कापड़ी, पूर्व कैबिनेट मंत्री और मौजूदा विधायक तिलक राज बेहड़ जैसे चेहरे शामिल हैं.

गढ़वाल में नेतृत्व विहीन

गढ़वाल में कई सीटों पर कांग्रेस नेतृत्व विहीन नजर आती है. यहां बीजेपी उसके कई क्षत्रपों को अपने पाले में ले जा चुकी है. ब्रदीनाथ विधानसभा में कांग्रेस का सबसे बड़ा चेहरा रहे राजेंद्र भंडारी, गंगोत्री विधानसभा में पूर्व विधायक विजयपाल सजवाण, पुरोला सीट से पूर्व विधायक मालचंद, टिहरी से कभी कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष रह चुके मौजूदा विधायक किशोर उपाध्याय, पूर्व कैबिनेट मंत्री दिनेश धनै, कांग्रेस के धनौल्टी से पूर्व में प्रत्याशी रह चुके जोत सिंह बिष्ट, देहरादून से पूर्व कैबिनेट मंत्री दिनेश अग्रवाल, 2016 में कांग्रेस में बगावत करने वाले विधायक उमेश शर्मा काऊ, सुबोध उनियाल, सतपाल महाराज, प्रदीप बत्रा कभी कांग्रेस के बड़े चेहरे हुआ करते थे. आज सभी बीजेपी में शामिल हैं.

2027 में असली परीक्षा
हल्द्वानी में राष्ट्रीय नेतृत्व की सक्रियता, काशीपुर में संगठनात्मक कार्यशाला और दिनेश आर्य का राज्यसभा निर्वाचन बीजेपी के कुमाऊं केंद्रित प्रयासों की तस्वीर पेश करते हैं, लेकिन बैठकों और संगठनात्मक गतिविधियों का वास्तविक असर चुनाव में ही सामने आएगा. 2017 में मिली बढ़त को 2022 में गंवाने के बाद बीजेपी के लिए कुमाऊं में अपना सियासी गणित सुधारना अहम है. कांग्रेस की चुनौती अपनी बढ़ी हुई ताकत को बरकरार रखने की होगी. ऐसे में 2027 की जंग में कुमाऊं दोनों दलों के लिए निर्णायक राजनीतिक मैदान बन सकता है.



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