शिमला. हिमाचल प्रदेश में सेब बागवानों की मुश्किलें अब सिर्फ मौसम की मार, बीमारियों और बाजार में कीमतों तक सीमित नहीं रह गई हैं. बगीचों में मजदूरों की कमी और लगातार बढ़ती उत्पादन लागत ने भी बागवानों की चिंता बढ़ा दी है. खासकर पहाड़ी इलाकों में सेब की पेटियों को बगीचे से सड़क या स्टोर तक पहुंचाना किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं होता.
कई जगह खड़ी ढलानों पर सेब की पेटियां उठाकर लाने और ले जाने में काफी मेहनत, समय और श्रम के साथ-साथ बहुत पैसा लगता है. लेकिन अब इसी समस्या का समाधान तलाशने के लिए हिमाचल के एक बागवान ने ऐसी तकनीक अपनाई है, जो आने वाले समय में पहाड़ी बागवानी की तस्वीर बदल सकती है.
शिमला जिले के कोटखाई के ढांगवी गांव में बागवान सुनील चौहान ने अपने बगीचे में मोनोरेल सिस्टम स्थापित किया है. यह मोनोरेल एक बार में 500 किलो से अधिक वजन ढोने में सक्षम है और करीब 45 डिग्री की खड़ी ढलान पर भी काम कर सकती है. यानी जिन रास्तों पर सेब की पेटियां पहुंचाना बागवानों और मजदूरों के लिए मुश्किल भरा काम है, वहां अब पटरी पर दौड़ती मशीन यह जिम्मेदारी संभालने की तैयारी में है.
मजदूरों की कमी से परेशान बागवान ने खोजा नया रास्ता
सुनील चौहान भी लंबे समय से ऐसी ही परेशानी का सामना कर रहे थे. उनके बगीचे में काम करने वाले परिवारों में से एक के काम छोड़ने और दूसरे परिवार के भी जाने की बात सामने आने के बाद उनके सामने आने वाले सेब सीजन में ढुलाई की व्यवस्था को लेकर चिंता खड़ी हो गई. पहाड़ी क्षेत्रों में लगे बगीचों में हर जगह वाहन पहुंचाना संभव नहीं होता. ऐसे में सेब की पेटियों को सड़क तक पहुंचाने के लिए मजदूरों पर निर्भर रहना पड़ता है. इसी समस्या ने सुनील चौहान को एक ऐसा विकल्प तलाशने के लिए प्रेरित किया, जिससे ढुलाई का काम आसान हो और मजदूरों पर निर्भरता भी कम की जा सके.
चीन से मंगवाया इंजन और ट्रैक, 4.20 लाख रुपये की लागत
इस तकनीक की सबसे बड़ी खासियत इसकी भार उठाने की क्षमता है. मोनोरेल एक बार में 500 किलो से अधिक वजन ढो सकती है. इसके अलावा, करीब 45 डिग्री तक की खड़ी ढलान पर काम करने की क्षमता इसे पहाड़ी बागवानी के लिहाज से खास बनाती है.
सिर्फ सेब नहीं, खाद-उर्वरक और क्रेट भी पहुंचाएगी मोनोरेल
इस मोनोरेल का इस्तेमाल केवल सेब की पेटियों को नीचे पहुंचाने के लिए नहीं होगा. बागवान इसका उपयोग खाद, उर्वरक, क्रेट और खेती-बागवानी में इस्तेमाल होने वाले दूसरे सामान को बगीचे के अलग-अलग हिस्सों तक पहुंचाने के लिए भी कर सकेंगे. इससे बगीचे के भीतर सामान ढोने में लगने वाली मेहनत कम करने में मदद मिल सकती है. हालांकि, इसका वास्तविक लाभ अलग-अलग बगीचों की बनावट, ट्रैक की लंबाई, रखरखाव और संचालन की लागत पर निर्भर करेगा.
सुनील चौहान ने बताया कि समस्या के समाधान के लिए मोनोरेल तकनीक का सहारा लिया.
तीन बगीचे, सालाना करीब 4 हजार पेटियों का उत्पादन
सुनील चौहान के पास सेब के तीन बगीचे हैं. उनके मुताबिक, इन बगीचों से सालाना करीब 4 हजार पेटियों का उत्पादन होता है. फिलहाल उन्होंने एक बगीचे में मोनोरेल सिस्टम स्थापित किया है. इसका परीक्षण सफल रहने के बाद अब अगले सेब सीजन से इसका इस्तेमाल करने की तैयारी है. इसके बाद दूसरे बगीचे में भी इस तकनीक को लगाने की योजना है.
जम्मू-कश्मीर और उत्तराखंड के बागवानों के साथ भी साझा होगी तकनीक
शिमला जिले के कोटखाई के ढांगवी गांव में बागवान सुनील चौहान ने अपने बगीचे में मोनोरेल सिस्टम स्थापित किया है.
इलेक्ट्रिक इंजन की जगह पेट्रोल इंजन, लागत बनी बड़ी वजह
मोनोरेल सिस्टम में फिलहाल पेट्रोल इंजन का इस्तेमाल किया गया है. इसकी वजह इलेक्ट्रिक इंजन की अधिक कीमत बताई जा रही है. बागवानों के लिए नई तकनीक अपनाने में शुरुआती निवेश सबसे बड़ी बाधाओं में से एक है. करीब 4.20 लाख रुपये खर्च कर इस सिस्टम को स्थापित करना हर छोटे बागवान के लिए आसान नहीं होगा. ऐसे में सरकारी सहायता की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है. इस सिस्टम पर सरकार की ओर से बागवानों को सब्सिडी के रूप में कुछ सब्सिडी मिलेगी तो अधिक बागवान इसे अपनाने के बारे में विचार कर सकते हैं. गौर रहे कि मंडी के सुंदरनगर में बागवानी क्लस्टर में भी इसी तरह की मोनो रेल बनाई गई है.