Siddh Kunjika Stotram: नवरात्रि में नहीं कर पा रहे दुर्गा सप्तशती पाठ, तो सिद्ध कुंजिका स्तोत्र पढ़ने से मिलेगा पूर्ण फल, जानें विधि, फायदे

Siddh Kunjika Stotram: नवरात्रि में नहीं कर पा रहे दुर्गा सप्तशती पाठ, तो सिद्ध कुंजिका स्तोत्र पढ़ने से मिलेगा पूर्ण फल, जानें विधि, फायदे


Siddh Kunjika Stotram: नवरात्रि के समय में देवी दुर्गा के भक्त मातारानी को प्रसन्न करने के​ लिए दुर्गा सप्तशती का पाठ करते हैं. कुछ लोगों के पास प्रतिदिन दुर्गा सप्तशती का पाठ करने के लिए समय नहीं है. ऐसे में वे लोग परेशान न हों, उनको नवरात्रि के 9 दिनों में सिद्ध कुंजिका स्तोत्रम् का पाठ करना चाहिए. रुद्रयामल तंत्र के अनुसार, भगवान शिव ने माता पार्वती को कुंजिका स्तोत्र के बारे में बताया था. उन्होंने क​हा कि जो व्यक्ति कुंजिका स्तोत्र का पाठ करता है, उसे संपूर्ण दुर्गा सप्तशती के 700 श्लोकों के पाठ का संपूर्ण फल मिल जाता है.

सिद्ध कुंजिका स्तोत्र पढ़ने के फायदे

  1. य​दि आप संपूर्ण दुर्गा सप्तशती के 13 अध्यायों का पाठ नहीं कर सकते हैं, तो सिद्ध कुंजिका स्तोत्र पढ़ें, इसे सप्तशती का सार कहते हैं. आपको पूरा पुण्य फल प्राप्त होगा.
  2. जो इस स्तोत्र का पाठ करता है, उसे शत्रु बाधा, भय, कर्ज, नजर दोष, तंत्र-मंत्र आदि से संरक्षण प्राप्त होता है.
  3. मां दुर्गा की कृपा से अकाल मृत्यु, दुर्घटना, गंभीर रोग, मान​सिक अशांति आदि से सुरक्षा मिलती है.
  4. इसको पढ़ने से मनोकामनाएं पूरी होती हैं. धन, यश, ऐश्वर्य और बिजनेस में बढ़ोत्तरी होती है.
  5. सिद्ध कुंजिका स्तोत्रम् का पाठ करने से 9 ग्रहों की शांति होती है, उससे जुड़े दोष दूर हो जाते हैं.
  6. इसके प्रभाव से आत्मविश्वास और मनोबल मजबूत होता है.

सिद्ध कुंजिका स्तोत्रम् पढ़ने की विधि

सिद्ध कुंजिका स्तोत्रम् का उपयोग किसी को हानि पहुंचाने के लिए नहीं करना चाहिए. नवरात्रि के समय आप प्रात:काल या सूर्यास्त के बाद एक दीप जलाएं. फिर मन को एकाग्र करके लाल रंग के एक कंबल वाले आसन पर बैठ जाएं. इस स्तोत्र में शक्तिशाली बीजाक्षर हैं, जिनका शुद्ध उच्चारण करके पाठ करें.

सिद्ध कुंजिका स्तोत्रम्

शिव उवाच

शृणु देवि प्रवक्ष्यामि, कुञ्जिकास्तोत्रमुत्तमम्।
येन मन्त्रप्रभावेण चण्डीजापः शुभो भवेत॥1॥

न कवचं नार्गलास्तोत्रं कीलकं न रहस्यकम्।
न सूक्तं नापि ध्यानं च न न्यासो न च वार्चनम्॥2॥

कुञ्जिकापाठमात्रेण दुर्गापाठफलं लभेत्।
अति गुह्यतरं देवि देवानामपि दुर्लभम्॥3॥

गोपनीयं प्रयत्नेन स्वयोनिरिव पार्वति।
मारणं मोहनं वश्यं स्तम्भनोच्चाटनादिकम्।
पाठमात्रेण संसिद्ध्येत् कुञ्जिकास्तोत्रमुत्तमम्॥4॥

अथ मंत्र

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे।
ॐ ग्लौ हुं क्लीं जूं स: ज्वालय ज्वालय ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल
ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ज्वल हं सं लं क्षं फट् स्वाहा।

इति मंत्र

नमस्ते रूद्ररूपिण्यै नमस्ते मधुमर्दिनि।
नमः कैटभहारिण्यै नमस्ते महिषार्दिनि॥1॥

नमस्ते शुम्भहन्त्र्यै च निशुम्भासुरघातिनि॥2॥

जाग्रतं हि महादेवि जपं सिद्धं कुरूष्व मे।
ऐंकारी सृष्टिरूपायै ह्रींकारी प्रतिपालिका॥3॥

क्लींकारी कामरूपिण्यै बीजरूपे नमोऽस्तु ते।
चामुण्डा चण्डघाती च यैकारी वरदायिनी॥4॥

विच्चे चाभयदा नित्यं नमस्ते मन्त्ररूपिणि॥5॥

धां धीं धूं धूर्जटेः पत्नी वां वीं वूं वागधीश्वरी।
क्रां क्रीं क्रूं कालिका देवि शां शीं शूं मे शुभं कुरु॥6॥

हुं हुं हुंकाररूपिण्यै जं जं जं जम्भनादिनी।
भ्रां भ्रीं भ्रूं भैरवी भद्रे भवान्यै ते नमो नमः॥7॥

अं कं चं टं तं पं यं शं वीं दुं ऐं वीं हं क्षं
धिजाग्रं धिजाग्रं त्रोटय त्रोटय दीप्तं कुरु कुरु स्वाहा॥
पां पीं पूं पार्वती पूर्णा खां खीं खूं खेचरी तथा॥8॥

सां सीं सूं सप्तशती देव्या मन्त्रसिद्धिं कुरुष्व मे॥

इदं तु कुञ्जिकास्तोत्रं मन्त्रजागर्तिहेतवे।
अभक्ते नैव दातव्यं गोपितं रक्ष पार्वति॥

यस्तु कुञ्जिकाया देवि हीनां सप्तशतीं पठेत्।
न तस्य जायते सिद्धिररण्ये रोदनं यथा॥

इति श्रीरुद्रयामले गौरीतन्त्रे शिवपार्वतीसंवादे कुञ्जिकास्तोत्रं सम्पूर्णम्।
॥ॐ तत्सत्॥



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