UK Universities crisis: क्यों संकट में हैं ब्रिटिश यूनिवर्सिटीज? छंटनी, कोर्स बंद और लंबे हड़ाल से हलकान

UK Universities crisis: क्यों संकट में हैं ब्रिटिश यूनिवर्सिटीज? छंटनी, कोर्स बंद और लंबे हड़ाल से हलकान


UK Universities crisis: अपनी शानदार पढ़ाई और कैंपस लाइफ के लिए मशहूर ब्रिटेन की यूनिवर्सिटीज इन दिनों गंभीर आर्थिक संकट से जूझ रही हैं. जिसके चलते यूनिवर्सिटीज में कर्मचारियों की छंटनी, कोर्स बंद करने और शैक्षणिक सुविधाओं में कटौती जैसे कदम उठाए जा रहे हैं. हाल में यूनिवर्सिटी ऑफ नॉटिंघम ने ऐसे ही कुछ कदम उठाए हैं. जिसके तहत नौकरियों में कटौती के साथ आधुनिक विदेशी भाषा और म्यूजिक के कोर्स बंद करने का फैसला शामिल है. इसके अलावा, छात्रों को मिलने वाली पारंपरिक वन-टू-वन पर्सनल ट्यूटरिंग व्यवस्था भी खत्म की जाएगी.

बीबीसी की रिपोर्ट के अनुसार, यूनिवर्सिटी ने इन बदलावों को दीर्घकालिक भविष्य के लिए कदम बताया है. उसका कहना है कि मौजूदा परिस्थितियों में संस्थान की वित्तीय स्थिति लंबे समय तक टिकाऊ नहीं रह सकती है. इस बीच नॉटिंघम, एडिनबर्ग और डंडी यूनिवर्सिटीज में कर्मचारियों की छंटनी और कोर्सेज में कटौती के विरोध में हड़ताल जारी है.

तीन साल में 609 पदों पर कटौती का प्लान

यूनिवर्सिटी ऑफ नॉटिंघम ने मई में अगले तीन वर्षों के दौरान 7,363 फुल-टाइम इक्विवेलेंट पदों में से 609 पदों में कटौती का प्रस्ताव रखा था. यूनिवर्सिटी ने नए छात्रों के लिए आधुनिक विदेशी भाषाओं और म्यूजिक के सभी कोर्स निलंबित करने तथा नर्सिंग के पाठ्यक्रमों में भी कटौती की संभावना जताई थी.

यूनिवर्सिटी एंड कॉलेज यूनियन (UCU) इस फैसले के विरोध में आंदोलन कर रही है. रिपोर्ट के अनुसार, यूनियन ने 11 दिसंबर तक हड़ताल जारी रखने की बात कही है. यदि यूनिवर्सिटी मैनेजमेंट बातचीत के लिए आगे नहीं आता है, तो यूनियन आगे की कार्रवाई पर भी विचार कर सकती है.

एडिनबर्ग यूनिवर्सिटी में विवाद करीब 140 मिलियन पाउंड की प्रस्तावित कटौती को लेकर है. वहीं, नॉटिंघम में आधुनिक विदेशी भाषाओं, अमेरिकी और कनाडाई अध्ययन तथा म्यूजिक से जुड़े पाठ्यक्रमों पर फैसले का विरोध हो रहा है. डंडी विश्वविद्यालय में भी कर्मचारियों की छंटनी और अनिवार्य रिडंडेंसी के खिलाफ प्रदर्शन जारी हैं. इन विरोध प्रदर्शनों ने इस बात को लेकर चिंता बढ़ा दी है कि वित्तीय संकट का असर छात्रों की पढ़ाई, परीक्षाओं और उन्हें मिलने वाली शैक्षणिक सहायता पर भी पड़ सकता है.

आर्ट्स और ह्यूमैनिटीज के कोर्स पर क्यों बढ़ रहा दबाव?

ब्रिटेन में आर्ट्स, ह्यूमैनिटीज, म्यूजिक और आधुनिक भाषाओं जैसे विषयों के भविष्य को लेकर बहस तेज हो गई है. सार्वजनिक विमर्श में कभी-कभी इन विषयों को कम उपयोगी डिग्री बताकर खारिज किया जाता है. लेकिन विशेषज्ञों और शिक्षा क्षेत्र से जुड़े संगठनों का कहना है कि इन विषयों का महत्व केवल शुरुआती वेतन या नौकरी मिलने की दर से नहीं आंका जा सकता.

ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के छात्र समाचार पत्र Cherwell में प्रकाशित एक लेख के अनुसार, पिछले कुछ वर्षों में कई संस्थानों ने म्यूजिक के पाठ्यक्रम बंद किए हैं. आर्ट्स, ह्यूमैनिटीज और भाषाओं से जुड़े कार्यक्रमों में भी कटौती की गई है. लेख में नॉटिंघम के प्रस्तावित बदलावों के अलावा किंग्स्टन विश्वविद्यालय के उस फैसले का भी उल्लेख किया गया, जिसके तहत पिछले वर्ष अंग्रेजी, दर्शनशास्त्र और अंतरराष्ट्रीय संबंधों समेत कई पाठ्यक्रम बंद करने का निर्णय लिया गया था.

STEM और ह्यूमनिटीज की कमाई में कितना अंतर?

ब्रिटिश एकेडमी की वर्ष 2020 की रिपोर्ट Qualified for the Future: Quantifying Demand for Arts, Humanities and Social Science Skills के अनुसार, रोजगार के दस साल बाद STEM विषयों के स्नातक आर्ट्स, ह्यूमैनिटीज और सोशल साइंसेज के स्नातकों की तुलना में सालाना औसतन करीब 6,000 पाउंड अधिक कमाते थे. हालांकि, वेतन का यह अंतर अलग-अलग विषयों से जुड़े करियर विकल्पों और उनसे विकसित होने वाले कौशलों की पूरी तस्वीर पेश नहीं करता.

हायर एजुकेशन पॉलिसी इंस्टीट्यूट (HEPI) की 2023 की रिपोर्ट Humanities Education is a UK Strength में कहा गया कि ब्रिटेन के सबसे तेजी से बढ़ते दस क्षेत्रों में से आठ में ह्यूमैनिटीज के स्नातकों की संख्या किसी भी अन्य विषय के स्नातकों से अधिक थी.

रिपोर्ट ने इस धारणा पर सवाल उठाया कि ह्यूमैनिटीज और STEM की पढ़ाई को एक-दूसरे के विकल्प के रूप में देखा जाना चाहिए. इसके मुताबिक, ह्यूमैनिटीज के दौरान विकसित होने वाले लेखन, शोध, विश्लेषण, संवाद और आलोचनात्मक चिंतन जैसे कौशल कई क्षेत्रों में उपयोगी होते हैं.

ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था में क्रिएटिव इंडस्ट्रीज का योगदान

आर्ट्स और ह्यूमैनिटीज का महत्व शिक्षा तक सीमित नहीं है. फिल्म, संगीत, प्रकाशन और दूसरी क्रिएटिव इंडस्ट्रीज भी अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान देती हैं. उपलब्ध क्षेत्रीय आंकड़ों के अनुसार, ब्रिटेन की क्रिएटिव इंडस्ट्रीज अर्थव्यवस्था में सालाना करीब 59.4 अरब पाउंड का योगदान करती हैं.

इन क्षेत्रों में लेखन, शोध, भाषाओं की समझ, सांस्कृतिक व्याख्या और कहानी कहने जैसे कौशलों की अहम भूमिका होती है. द बीटल्स, हैरी पॉटर और जेम्स बॉन्ड जैसे ब्रिटिश सांस्कृतिक उत्पाद यह दिखाते हैं कि रचनात्मक कार्य किस तरह व्यावसायिक मूल्य पैदा करने के साथ देश की अंतरराष्ट्रीय पहचान को भी मजबूत कर सकते हैं.

कमाई के नए रास्ते तलाश रहीं यूनिवर्सिटीज

आर्थिक संकट से निपटने के लिए ब्रिटेन की यूनिवर्सिटीज खर्च घटाने के साथ-साथ आय के नए स्रोत तलाश रही हैं. इसके तहत विदेशों में कैंपस खोलने, दूसरे देशों के संस्थानों के साथ शैक्षणिक साझेदारी करने, ऑनलाइन शिक्षा और एग्जीक्यूटिव एजुकेशन जैसे विकल्पों पर जोर दिया जा रहा है.

45% यूनिवर्सिटी घाटे में, आर्थिक दबाव बरकरार

इंग्लैंड के उच्च शिक्षा क्षेत्र के नियामक ऑफिस फॉर स्टूडेंट्स (OfS) ने अपनी वित्तीय स्थिरता संबंधी समीक्षा में कहा है कि विश्वविद्यालयों के सामने आर्थिक चुनौतियां अब भी गंभीर हैं. नियामक के अनुसार, 2025-26 में इंग्लैंड के करीब 45 फीसदी उच्च शिक्षा संस्थानों को घाटे का सामना करना पड़ा. इसके पीछे छात्रों के दाखिले को लेकर अनिश्चितता, महंगाई, परिचालन लागत में बढ़ोतरी और नकदी प्रवाह पर दबाव जैसे कारण हैं.

कुछ संस्थान आय और खर्च के बीच उतार-चढ़ाव को संभालने के लिए बैंक ऋण पर अधिक निर्भर हो गए हैं. इससे अप्रत्याशित खर्चों से निपटने के लिए उनके पास उपलब्ध वित्तीय भंडार सीमित हो रहा है.

OfS ने अंतरराष्ट्रीय छात्र लेवी के संभावित असर को लेकर भी चिंता जताई है. नियामक के अनुमान के मुताबिक, वर्ष 2028 से इस लेवी के कारण उच्च शिक्षा क्षेत्र पर करीब 570 मिलियन पाउंड का अतिरिक्त वित्तीय बोझ पड़ सकता है.

यूनिवर्सिटीज का क्या कहना है?

ब्रिटेन की यूनिवर्सिटीज का प्रतिनिधित्व करने वाले संगठन यूनिवर्सिटीज यूके ने कहा कि संस्थान शिक्षा की गुणवत्ता बनाए रखते हुए आर्थिक चुनौतियों से निपटने की कोशिश कर रहे हैं. संगठन के मुताबिक, विश्वविद्यालय खर्च में दक्षता बढ़ाने और अंतरराष्ट्रीय साझेदारियों को मजबूत करने जैसे कदम उठा रहे हैं. इस वर्ष की शुरुआत में किए गए उसके एक सर्वेक्षण में भी सामने आया कि संस्थान सीमित संसाधनों के बीच बेहतर काम करने के लिए सहयोग और नए तरीकों का सहारा ले रहे हैं.

अंतरराष्ट्रीय छात्रों पर क्या होगा असर?

पाठ्यक्रम बंद होने का असर अंतरराष्ट्रीय छात्रों पर विशेष रूप से गंभीर हो सकता है. कई छात्र फीस जमा करने, आवास की व्यवस्था करने और यात्रा की योजना बनाने के बाद किसी विश्वविद्यालय में दाखिला लेते हैं. ऐसे में कोर्स बंद होने से उनकी पढ़ाई और आर्थिक योजनाएं प्रभावित हो सकती हैं.

दूसरे विश्वविद्यालय में स्थानांतरण करने की स्थिति में छात्रों को अपनी शैक्षणिक योजना बदलनी पड़ सकती है. उनके वीजा और इमिग्रेशन से जुड़े मामलों पर भी असर पड़ सकता है.



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