र‍िक्‍शे वाले की पेंट‍िंग की कीमत 69 करोड़… क्‍यों इतनी महंगी खरीदी जाती हैं पेंट‍िंग्‍स?

र‍िक्‍शे वाले की पेंट‍िंग की कीमत 69 करोड़… क्‍यों इतनी महंगी खरीदी जाती हैं पेंट‍िंग्‍स?


‘र‍िक्‍शा पुलर’ पेंटिंग की कीमत नए आर्ट प्लेटफॉर्म ‘वोल्टे उना’ की पहली नीलामी में 69.1 करोड़ रुपए लगाई गई है. प्रस‍िद्ध भारतीय कलाकार तैयब मेहता की ये पेंट‍िंग चौथी सबसे महंगा इंड‍ियन आर्ट वर्क बन गया है. तैयब मेहता की इस पेंट‍िंग ने 2025 में ब‍िकने वाली भारतीय पेट‍िंग ‘ट्रस्‍ट बुल’ का रिकॉर्ड तोड़ दिया है. ‘ट्रस्‍ट बुल’ 61.80 करोड़ में ब‍िकी थी. मॉर्डन आर्ट के प्रसिद्ध कलाकार तैयब मेहता ने यह पेंट‍िंग साल 2002 में बनाई थी. इस पेंट‍िंग की इतनी महंगी कीमत सुनकर जहां आर्ट की दुनिया में हंगामा मच गया है. वहीं दूसरी तरफ द‍िमाग में सवाल आता है कि आखिर कोई भी इतनी महंगी कीमत देखकर कैनवास पर साधारण रंगों से बनी पेंट‍िंग क्‍यों खरीदता है? क्‍या ये बस शौक का मामला है या इसके पीछे कुछ और भी वजह है? क्‍यों दुन‍िया के बड़े-बड़े ब‍िलेनियर अपनी गाढ़ी-मोटी कमाई इन तस्‍वीरों पर लगाते हैं? आखिर वो कौनसा गणित है या कला का पहलू है, ज‍िसे देख इन तस्‍वीरों की कीमत इतनी लगाई जाती है. चलिए जरा इन पहलुओं पर नजर डालते हैं.

असल में क‍िसी भी पेंट‍िंग की कीमत बढ़ने में कई पहलू एक-साथ काम करते हैं. पेंट‍िंग क‍िस कलाकार की है, क्‍या इसका कोई एतिहासिक पहलू है, या बाजार क्‍या कीमत तय करता है, ऐसी कई चीजें पेंट‍िंग की कीमत बढ़ाने का काम करती हैं. जैसे मार्च, 2025 में एमएफ हुसैन की अनटाइटल्‍ड (ग्राम यात्रा) पेंट‍िंग 119 करोड़ में ब‍िकी. इस पेंट‍िंग की भारी-भरकम कीमत के पीछे एम. एफ हुसैन की हस्‍ती भी है. हुसैन, राजा रवि वर्मा, तैयब मेहता या वी.एस. गायतोंडे जैसे मशहूर कलाकारों की पेंट‍िंग्‍स की कीमत उनके नाम से ही काफी बढ़ जाती है. लोग इनकी कला में द‍िलचस्‍पी रखते हैं. यानी ज‍िस कलाकार का जि‍तना नाम, लोग उतना ही उसकी कला और व‍िरासत को ऊंचा तौलते हैं.

दुर्लभ पेंट‍िंग्‍स की होती है मोटी कीमत
किसी पेंटिंग की कीमत बढ़ने का दूसरा बड़ा कारण उसकी दुर्लभता है. लोगों की सिर्फ पेंट‍िंग में द‍िलचस्‍पी नहीं होती, उस पेंट‍िंग के सथ जुड़ी कहानी में भी होती है. जैसे ल‍ियोनार्दो द विंची की ‘मोनालीसा’ की प्रसिद्धी के पीछे एक वजह ये भी है कि विंची ने इस पेंट‍िंग 16 साल में बनाई और उनकी मौत तक भी वो उसपर काम कर रहे थे. अगर कोई पेंटिंग लंबे समय से किसी निजी संग्रह में थी और दशकों बाद पहली बार नीलामी में आ रही है, तो उसे खरीदने के लिए कई बड़े कलेक्टर आगे आ सकते हैं.

यानी ज‍िस चीज के पीछे कोई द‍िलचस्‍प कहानी होगी, लोगों की उत्‍सुकता ज्‍यादा होगी, उसकी कीमत भी ज्‍यादा होगी. लेकिन कला जगत में ऐसी कहान‍ियों के प्रमाण भी देने होते हैं. कला की दुनिया में पेंटिंग के मालिकों का रिकॉर्ड और उसके असली होने के प्रमाण को ‘प्रोवेनेंस’ कहा जाता है. मजबूत प्रोवेनेंस खरीदार का भरोसा बढ़ा सकता है और कीमत पर असर डाल सकता है.

पेंट‍िंग मतलब स्‍टेटस सिंबल?
कई बार अमीरों के ल‍िए पेंट‍िंग्‍स खरीदना या क‍िसी नीलामी में हिस्‍सा लेना उनकी शान का सवाल भी बन जाता है. स‍िर्फ पेंट‍िंग ही नहीं, स्‍टेटस सिंबल के तौर पर अक्‍सर लोग महंगी घड़‍ियां, गाड़‍ियां या लेटेस्‍ट मॉडल के आईफोन हाथों-हाथ खरीदते हैं. ज‍ितना ये सवाल उठता है कि कोई पेंट‍िंग कितनी महंगी उठी, उतनी ही उत्‍सुकता ये जानने की भी होती है कि ‘भाई, इतनी महंगी पेंट‍िंग खरीदी क‍िसने?’ और जवाब सुनते ही लोग उस आदमी का स्‍टेटस तय करने लगते हैं.

खासकर अगर कोई आर्ट कलेक्‍टर है या ज‍िसे पेंट‍िंग्‍स पसंद है, ऐसी पेंट‍िंग उनके आर्ट कलेक्‍शन का हिस्‍सा बन उनका रुतबा काफी बढ़ा देती हैं.

टैक्‍स में छूट और पोर्टफोल‍ियो बढ़ाना
ये सब तो वो बातें थीं जो आम हैं, लोग अक्‍सर इन बातों का द‍िखावा भी करते हैं. लेकिन कई बार महंगी पेंट‍िंग्‍स की खरीद के पीछे सिर्फ पसंद, स्‍टेटस सिंबल या कला से प्‍यार ही नहीं होता, फाइनेंश‍ियल वेल्‍थ का गण‍ित भी होता है. अमीर पर‍िवारों में आर्ट-कलेक्‍शन व‍िरासत बनाने के तौर पर देखे जाते हैं. दुर्लभ पेंट‍िंग्‍स की कीमत अक्‍सर भविष्‍य में बढ़ जाती है. ऐसे में ऐसी पेंट‍िंग्‍स वेल्‍थ प्र‍िजर्वेशन और पोर्टफोल‍ियो डाइवर्स‍िफ‍िकेशन के काम आती हैं. इसके अलावा कई देश ऐसे हैं जहां आर्टवर्क को डोनेट करने या व‍िरासत के तौर पर देने पर टैक्‍स में छूट म‍िलती है. हालांकि इसके न‍ियम हर देश में अलग है. भारत में दान करने पर छूट का नियम है Section 80G के तहत है पर ये स‍िर्फ नकद दान पर म‍िलती है. यानी सीधे पेंट‍िंग देकर या दान कर टैक्‍स में छूट का दावा नहीं क‍िया जाता. लेकिन बाहरी देशों में न‍ियम अलग हैं.

पूनावाला इंडस्‍ट्रीज के माल‍िक सायरस पूनावाला ने राजा रवि वर्मा की ‘कृष्‍ण और यशोदा’ पेंट‍िंग 167 करोड़ में खरीदी. आर्टवर्क का सामान्‍य एप्र‍िस‍िएशन 12 से 15 प्रतिशत होता है तो 5 साल में इस पेंट‍िंग की कीमत हो जाएगी 290 करोड़. यानी 120 करोड़ का फायदा. इसपर अब अगर टैक्‍स लगेगा तो 12.5 % यानी करीब 105 करोड़ का फायदा. लेकिन यही 120 करोड़ की कमाई वो ब‍िजनेस से करते तो टैक्‍स लगता 30% यानी 84 करोड़ बचते. यही गण‍ित है जो अमीर लोग लगाते हैं.



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