UP CM के गजब किस्से: अगर राम मनोहर लोहिया स्वार्थी होते तो क्या मुलायम सिंह यादव कभी CM बन पाते? जानिए असली समाजवाद की कहानी


होमElectionsuttarakhand

अगर राम मनोहर लोहिया स्वार्थी होते तो मुलायम नहीं बनते CM? जानिए इनसाइड स्टोरी

Last Updated:

ram manohar lohia death anniversary: आज 12 अक्टूबर को डॉ. राम मनोहर लोहिया की पुण्यतिथि है. वही नेता जिन्होंने भारतीय राजनीति को गैर-कांग्रेसवाद का मंत्र दिया और शोषितों-वंचितों की आवाज बुलंद की. भारतीय राजनीति में जब भी समाजवाद और उत्तर प्रदेश की सत्ता का जिक्र होता है तो डॉ. राम मनोहर लोहिया का नाम आता ही आता है. और लोहिया के साथ मुलायम सिंह यादव का नाम भी सबसे ऊपर आता है. उत्तर प्रदेश की सियासत में ‘UP CM के गजब किस्से’ के इस पार्ट में आज हम आपको डॉ. राम मनोहर लोहिया की पुण्यतिथि पर बताने जा रहे हैं कि कैसे डॉ. लोहिया के निस्वार्थ समाजवाद ने सूबे को ‘धरतीपुत्र’ मुलायम सिंह यादव जैसा मुख्यमंत्री दिया. जानें पूरी कहानी.

Top Deals Inside

अगर राम मनोहर लोहिया स्वार्थी होते तो मुलायम नहीं बनते CM? जानिए इनसाइड स्टोरीZoom

UP CM के गजब किस्से: क्या लोहिया के बिना मुलायम सिंह यादव का राजनीतिक सफर इतना आगे बढ़ पाता?

ram manohar lohia mulayam singh yadav socialism: भारतीय राजनीति में कई नेता ऐसे हुए जिन्होंने खुद सत्ता की कुर्सी पर बैठने से ज्यादा नए नेताओं को आगे बढ़ाने और विचारधारा को मजबूत करने पर जोर दिया. डॉ. राम मनोहर लोहिया भी ऐसे ही नेताओं में गिने जाते हैं. समाजवाद, सामाजिक बराबरी और गैर-कांग्रेसवाद की राजनीति करने वाले लोहिया ने कई कार्यकर्ताओं को रास्ता दिखाया. आज उसी लोहिया की12 अक्टूबर को पुण्यतिथि है. लोहिया से वैसे तो जुड़ी बहुत सारी कहानी हैं, लेकिन मुलायम से जुड़ी उनकी बहुत सारी कहानी है. लोहिया के बारे में कहा जाता है एक ऐसे नेता थे जिन्होंने कभी अपने परिवार या स्वार्थ को राजनीति के बीच नहीं आने दिया. अगर वो ऐसा करते तो शायद यूपी को मुलायम सिंह यादव जैसा मुख्यमंत्री कभी नहीं मिलता. जानें बिना देर किए ये पूरी कहानी.

एक नेता की सीख, दूसरे का संघर्ष

उत्तर प्रदेश की राजनीति में डॉ. राम मनोहर लोहिया और मुलायम सिंह यादव का नाम समाजवाद के साथ लिया जाता है. एक ने सामाजिक बराबरी और पिछड़ों की भागीदारी की आवाज उठाई. तो दूसरे ने किसान परिवार से निकलकर प्रदेश की सत्ता तक का सफर तय किया. मुलायम की राजनीतिक यात्रा में लोहिया की विचारधारा और समाजवादी आंदोलन की अहम भूमिका रही. लेकिन क्या होता? अगर लोहिया युवाओं को आगे बढ़ाने में भरोसा नहीं करते? ‘UP CM के गजब किस्से’ में जानिए इस रिश्ते से जुड़ा चर्चित किस्सा.

1963 का वो चुनाव, जब गांव-गांव घूम रहे थे मुलायम

मीडिया में छपी खबरों के मुताबिक, साल 1963 में उत्तर प्रदेश की फर्रुखाबाद लोकसभा सीट पर उपचुनाव हुआ था. डॉ. राम मनोहर लोहिया सोशलिस्ट पार्टी के उम्मीदवार थे. युवा मुलायम सिंह यादव अपने साथियों के साथ उनके प्रचार में जुटे थे. उस समय मुलायम पहलवानी करते थे और राजनीति में अपनी पहचान बनाने की कोशिश कर रहे थे. वह गांवों में जाकर लोगों से मिलते और लोहिया के लिए समर्थन जुटाते थे.

मुलायम का जवाब सुनकर लोहिया ने जेब में रखे 100 रुपये

प्रचार के दौरान एक दिन लोहिया की मुलाकात मुलायम सिंह यादव से हुई. उन्होंने पूछा कि इतनी धूप और धूल में घूमते हुए वह क्या खाते हैं और रात में कहां रहते हैं. मुलायम ने बताया कि वह जेब में लाई-चना रखते हैं. गांवों में लोग प्यार से खाना खिला देते हैं. रात हो जाने पर जिस गांव में होते हैं, वहीं सो जाते हैं. खबरों में बताया गया है कि मुलायम का जवाब सुनकर लोहिया प्रभावित हुए. उन्होंने मुलायम के कुर्ते की जेब में 100 रुपये का नोट रख दिया. उस दौर में यह रकम काफी मायने रखती थी. यह किस्सा मुलायम के संघर्ष और युवा कार्यकर्ताओं के प्रति लोहिया के स्नेह के उदाहरण के तौर पर याद किया जाता है.

अगर लोहिया स्वार्थी होते, तो क्या मुलायम CM बन पाते?

अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर लोहिया स्वार्थी होते तो क्या मुलायम CM बन पाते? असल में यही सवाल लोहिया की राजनीति और उनके विचारों को समझने का एक तरीका है. लोहिया सामाजिक बराबरी, पिछड़ों के अधिकार और गैर-कांग्रेसवाद के लिए जाने जाते थे. वह चाहते थे कि राजनीति में समाज के उन वर्गों को भी जगह मिले. जिन्हें लंबे समय तक पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं मिला था. उनकी राजनीति में विचारधारा और संगठन को महत्व दिया जाता था. मुलायम सिंह यादव इटावा के एक किसान परिवार से आए थे. वह किसी बड़े राजनीतिक परिवार की विरासत लेकर राजनीति में नहीं उतरे थे. उन्होंने समाजवादी आंदोलन के साथ अपना राजनीतिक सफर आगे बढ़ाया. यह कहना सही नहीं होगा कि केवल लोहिया की एक मुलाकात ने उन्हें मुख्यमंत्री बनाया, लेकिन लोहिया के विचारों और उस दौर के समाजवादी आंदोलन ने उनके जैसे कार्यकर्ताओं के लिए राजनीतिक रास्ते तैयार जरूर किए.

सिद्धांतों का वो असली समाजवाद

डॉ. राम मनोहर लोहिया अक्सर एक बात कहा करते थे कि सच्चे समाजवादी को ‘संतति और संपत्ति’ यानी परिवार और पैसे के मोह से हमेशा दूर रहना चाहिए. उन्होंने कभी भी राजनीति में अपने किसी रिश्तेदार या परिवार के सदस्य को आगे नहीं बढ़ाया. अगर डॉ. लोहिया भी दूसरे नेताओं की तरह स्वार्थी होते तो वह अपनी राजनीतिक विरासत अपने किसी करीबी को सौंप देते. लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया. उन्होंने पार्टी में एक ऐसी जमीन तैयार की जहां बिना पैसे और बिना बड़े पारिवारिक बैकग्राउंड का कार्यकर्ता भी आगे बढ़ सके. इसी निस्वार्थ सोच की वजह से 1967 में मुलायम सिंह यादव को पहली बार जसवंतनगर सीट से विधानसभा का टिकट मिला और वह चुनाव जीते.

जमीन से सत्ता के शिखर तक

लोहिया जी के सिद्धांतों का ही असर था कि एक साधारण किसान परिवार का बेटा राजनीति के शीर्ष पर पहुंच गया. मुलायम सिंह यादव ने लोहिया जी के कदमों पर चलकर जमीन पर संघर्ष किया. वह गरीबों, पिछड़ों और किसानों की मजबूत आवाज बनकर उभरे.
मीडिया में छपी खबरों के मुताबिक, लोहिया जी के दिए इसी वैचारिक धरातल के दम पर मुलायम सिंह यादव आगे चलकर तीन बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बने और देश के रक्षा मंत्री के पद तक पहुंचे. लोहिया जी का समाजवाद महलों से नहीं, बल्कि गांवों की पगडंडियों से चलता था. आज उनकी पुण्यतिथि पर यह किस्सा गवाही देता है कि अगर लोहिया स्वार्थी होते तो यूपी की सियासत का इतिहास कुछ और ही होता.



Source link