Parent Child Bonding : घर में बेटा चोट लगने पर सबसे पहले मां को आवाज लगाता है, तो बेटी अपनी छोटी-बड़ी फरमाइशें लेकर पापा के पास पहुंच जाती है. मां की गोद में बेटे को सुकून मिलता है, तो पिता के कंधे पर सिर रखकर बेटी अपनी दुनिया की बातें साझा करती है. आपने भी अपने आसपास ऐसे कई परिवार देखे होंगे, जहां बेटा मां के बेहद करीब होता है और बेटी पापा की लाडली कहलाती है. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि ऐसा क्यों होता है? क्या बेटों का मां से और बेटियों का पिता से ज्यादा जुड़ाव होने के पीछे कोई मनोवैज्ञानिक वजह है? या फिर यह हमारे परिवारों की परवरिश और सामाजिक सोच का असर है?
दिलचस्प बात यह है कि मनोविज्ञान इस रिश्ते को केवल लड़का या लड़की होने से जोड़कर नहीं देखता. इसके पीछे भावनात्मक सुरक्षा, माता-पिता का व्यवहार, बच्चों की जरूरतों को समझने का तरीका और परिवार का माहौल जैसे कई पहलू काम करते हैं. आइए, समझते हैं कि मां-बेटे और पिता-बेटी का रिश्ता खास क्यों दिखाई देता है और इस बारे में साइकोलॉजी क्या कहती है.
मां के लाडले क्यों होते हैं बेटे?
बच्चे के जन्म के बाद उसकी हर छोटी-रोटी जरूरत का ध्यान रखना, उसे चुप कराना और उसके रोने की वजह समझना—इन सब प्रक्रियाओं से मां और बच्चे के बीच एक अटूट भावनात्मक रिश्ता बन जाता है. जब बच्चे को बार-बार यह अहसास होता है कि तकलीफ या डर के समय मां ही सबसे पहले दौड़ी चली आएगी, तो उसके मन में एक गहरा भरोसा पैदा हो जाता है.
मनोविज्ञान में इसे ‘सिक्योर अटैचमेंट’ (Secure Attachment) कहा जाता है. इसका मतलब सिर्फ प्यार जताना नहीं, बल्कि बच्चे की जरूरत के वक्त भावनात्मक रूप से वहां मौजूद रहना है. हालांकि, इसका यह बिल्कुल मतलब नहीं है कि यह रिश्ता जन्मजात या तयशुदा है. अगर पिता भी बच्चे की देखभाल में बराबर की हिस्सेदारी निभाएं और उसकी भावनाओं को समझें, तो बच्चे का जुड़ाव पिता से भी उतना ही गहरा हो सकता है.
बेटियां क्यों होती हैं पापा की प्रिंसेस?
एक बेटी के लिए उसके पिता का साथ, तारीफ और प्रोत्साहन बहुत मायने रखता है. जब पिता अपनी बेटी की बात को गौर से सुनते हैं, उसकी छोटी-छोटी सफलताओं पर दिल से खुश होते हैं और मुश्किल वक्त में उसका हौसला बढ़ाते हैं, तो बेटी का आत्मविश्वास सातवें आसमान पर पहुंच जाता है.
क्या माता-पिता अपने जैसे बच्चे से ज्यादा जुड़ाव महसूस करते हैं?
शोधकर्ताओं का मानना है कि ऐसा इसलिए होता है क्योंकि माता-पिता अपने जैसे (समान लिंग वाले) बच्चे के साथ खुद को ज्यादा जुड़ा हुआ महसूस करते हैं. यह शोध केवल कुछ विशेष स्थितियों (जैसे खर्च करने के तरीके या चुनावों) पर आधारित था. इसका यह बिल्कुल मतलब नहीं है कि हर घर में ऐसा ही होता है या माता-पिता प्यार बांटने में भेदभाव करते हैं.
इसका सीधा सा मतलब यह है कि माता-पिता भी इंसान होते हैं. अनजाने में ही सही, कई बार उनकी अपनी सोच, आदतें और खुद से मिलती-जुलती खूबियां बच्चों के साथ उनके जुड़ाव को थोड़ा बहुत प्रभावित जरूर कर सकती हैं.
जरूरी नहीं कि हर रिश्ते में ऐसा हो
हर परिवार की कहानी अलग और अनूठी होती है. कुछ घरों में बेटियां अपने पिता की सबसे अच्छी दोस्त होती हैं, तो कुछ बेटे अपनी मां के बजाय पिता से अपने दिल की हर बात साझा करते हैं. 1997 में आई एक शोध-समीक्षा से भी यह साबित नहीं हुआ कि इन रिश्तों में कोई पत्थर की लकीर वाला अंतर होता है. असल बात यह है कि बच्चा उसी के सबसे करीब महसूस करता है, जो उसे बिना टोके उसकी बात सुने, उसकी भावनाओं का मजाक न उड़ाए और गलतियों पर उसे डांटने के बजाय समझाए.
क्या ये लाड़-प्यार नुकसानदायक है?
बच्चों पर प्यार लुटाना बहुत अच्छी बात है, लेकिन किसी एक बच्चे को हमेशा प्राथमिकता देना घर का माहौल खराब कर सकता है. अगर बेटे की हर गलती को यह कहकर नजरअंदाज कर दिया जाए कि “लड़के तो ऐसे ही होते हैं” और बेटी से हर वक्त परिपक्वता की उम्मीद की जाए, तो बच्चों के मन में हीन भावना या आपसी जलन पैदा हो सकती है. इसलिए जरूरी है कि माता-पिता बिना किसी भेदभाव के सभी बच्चों को समान रूप से समझें और प्यार दें.
बच्चे को मां और पिता दोनों का भरपूर प्यार मिले, ताकि उसे किसी एक को चुनने की जरूरत न पड़े. बचपन में मिला यह सुरक्षित भरोसा ही आगे चलकर बच्चे को एक आत्मविश्वासी इंसान और बेहतरीन रिश्ते निभाने वाला नागरिक बनाता है.