अयोध्या से अगर सच में चुनाव लड़ जाएं सीएम योगी और अखिलेश, तो कौन पड़ेगा भारी? क्या कहते हैं आंकड़े

अयोध्या से अगर सच में चुनाव लड़ जाएं सीएम योगी और अखिलेश, तो कौन पड़ेगा भारी? क्या कहते हैं आंकड़े


लखनऊः उत्तर प्रदेश में जैसे-जैसे विधानसभा चुनाव का समय नजदीक आता जा रहा है, वैसे-वैसे राजनीतिक पारा चढ़ता जा रहा है. आलम यह है कि अब खुले मंच से एक-दूसरे को चुनौती दी जा रही है. बड़ी-बड़ी पार्टियों के नेता एक-दूसरे को विधानसभा चुनाव में ललकार रहे हैं. हालांकि अभी इस ललकार का जवाब भविष्य के गर्भ में छिपा हुआ है. लेकिन इस राजनीतिक चैलेंज ने सूबे की सियासत को नई हवा दे दिया है. दरअसल, हम बात कर रहे हैं समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव और उत्तर प्रदेश के मुखिया यानी कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की. अखिलेश यादव ने अयोध्या में एक कार्यक्रम के दौरान सीएम योगी को चुनौती देते हुए कहा कि वह पवन पांडेय के खिलाफ चुनाव लड़ जाएं तो मानें. वहीं सीएम योगी ने काउंटर चैलेंज करते हुए कहा कि चेलों से क्या मुकाबला करना, आइए, हम और आप दोनों अयोध्या से नामांकन करते हैं, फिर देखते हैं.

अगर सच में अयोध्या विधानसभा सीट से चुनाव लड़ जाएं सीएम योगी-अखिलेश
इस सियासी चैलेंज के बाद अब हर किसी के मन में सवाल है कि अगर सच में अयोध्या विधानसभा सीट से अखिलेश यादव और सीएम योगी एक-दूसरे के खिलाफ चुनाव लड़ जाएं तो किसकी जीत होगी? हम आपके लिए कुछ अलग-अलग एंगल ढूंढ कर लाए हैं, जिससे आप बस अनुमान लगा सकते हैं कि किसकी जीत होगी, किसको हार मिलेगी. हालांकि असली नतीजे तो चुनाव के बाद ही सामने आएंगे. अभी हम और आप बस कुछ आंकड़ों के जरिए एक अनुमान ही लगा सकते हैं, जिसका सच्चाई से कोई नाता नहीं है. यह भी बात नोट कर लीजिए कि इस खबर में आपको जो भी फैक्ट्स यानी कि आंकड़े बताए जाएंगे, वो केवल अनुमानित हैं. हम इसकी सटीकता की पुष्टि नहीं करते हैं. असल में आंकड़ों में बदलाव हो सकते हैं. इसलिए इस खबर में दिए गए आंकड़ों को अंतिम सच न मानें…

अयोध्या सीट पर अखिलेश बनाम सीएम योगी
अगर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव अयोध्या विधानसभा सीट से चुनाव लड़ते हैं तो यह मुकाबला केवल दो नेताओं के बीच नहीं बल्कि भाजपा के हिंदुत्व और संगठन के आधार पर और सपा के सामाजिक समीकरण के परीक्षा के तौर पर होगा. हालांकि इस काल्पनिक मुकाबले में कौन जीतेगा या हारेगा, इसका निष्कर्ष जातीय आंकड़े, पिछले विधानसभा-लोकसभा चुनाव के नतीजों, प्रत्याशियों का लोकल प्रभाव, पार्टी के प्रभाव और लोकल मुद्दों के जरिए निकाला जा सकता है.

अयोध्या विधानसभा में कितनी अगड़ी और कितनी पिछड़ी जातियां
अयोध्या सीट के जातीय समीकरण पर छपे चुनाव रिपोर्टों में अलग-अलग आंकड़े हैं. द प्रिंट की 2022 की रिपोर्ट में ब्राह्मण मतदाताओं की हिस्सेदारी करीब 22 फीसदी, यादवों की 12 फीसदी और दलितों की 15 फीसदी बताई गई. वहीं इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में ब्राह्मण मतदाताओं की संख्या करीब 40000 और दलित मतदाता की संख्या करीब 65000 बताई गई थी. इन दोनों ही रिपोर्ट में अलग-अलग आंकड़े हैं. इसलिए इस आंकड़े को अनुमानित ही मानें.

अब सवाल है कि अयोध्या विधानसभा की अगड़ी जातियों में कौन-कौन
अयोध्या विधानसभा सीट पर अगड़ी जातियों में ब्राह्मण, ठाकपर, वैश्य, बनिया, अग्रवाल और कायस्थ शामिल हैं. ब्राह्मण मतदाता सपा और भाजपा दोनों के लिए अहम हैं. यह दोनों पार्टियों में अच्छा वर्चस्व रखते हैं और यहां ब्राह्मण मतदाता किसी भी तरफ जा सकता है. वहीं राजपूत मतदाता फिलहाल भाजपा के परंपरागत समर्थक वर्गों में गिने जा रहे हैं. वहीं वैश्य, बनिया और अग्रवाल एक व्यापारी वर्ग है, जो शहरी मतदाताओं के समीकरण में अहम भूमिका निभाते हैं. ऐसा माना जाता है कि व्यापारी वर्ग अधिकांश तौर पर भाजपा के साथ रहता है.

अयोध्या विधानसभा सीट पर पिछड़ी जातियां कौन-कौन
अयोध्या विधानसभा सीट पर पिछड़ी जातियों में यादव, कुर्मी, मौर्य, कुशवाहा, निषाद, केवट, अन्य मछुआरा समुदाय, राजभर, लोध और अन्य पिछड़ी जातियां हैं. यादव सपा का प्रमुख पारंपरिक समर्थक वर्ग है. वहीं कुर्मी स्थानीय समीकरण में ओबीसी का अहम वर्ग है. जो भाजपा के लिए फायदेमंद हो सकता है. यही वजह है कि केशव प्रसाद मौर्य को बीजेपी ने बड़ा पद दे रखा है. अब बात करते हैं राजभर समाज की. राजभर समाज के नेता ओपी राजभर फिलहाल भाजपा के साथ हैं, तो यहां बीजेपी को फायदा मिल सकता है. इसके अलावा निषाद समाज भी बीजेपी की तरफ जा सकता है. क्योंकि निषादों के नेता संजय निषाद भी फिलहाल बीजेपी के नाव पर सवार हैं.

किस जाति के कितने प्रतिशत मतदाता
अयोध्या विधानसभा सीट पर 2022 में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक ब्राह्मण मतदाता करीब 45000 थे. वहीं  अनुसूचित जातियों की 43 हजार और यादवों की 36 हजार बताई गई थी. यानी कि अयोध्या विधानसभा सीट पर 2022 में ब्राह्मण 11.8 फीसदी, यादव 9.4 फीसदी, दलित और अनुसूचित जातियां 11.3 फीसदी मतदाता थे.

सीएम योगी आदित्यनाथ बनाम अखिलेश यादव के मुकाबले के प्रमुख पहलू

पहला- योगी आदित्यनाथ के लिए भाजपा का हिंदुत्व और शासन का एजेंडा फायदेमंद
अगर सीएम योगी अयोध्या विधानसभा सीट से चुनाव लड़ते हैं तो उनके लिए राम मंदिर, अयोध्या का विकास, धार्मिक पर्यटन, कानून व्यवस्था और भाजपा के संगठन की भूमिका अहम हो सकती है. हालांकि इसके अलावा अगड़ी व पिछड़ी जातियों के साथ-साथ दलित समुदाय कितना समर्थन देता है, यह भी बहुत जरूरी होगा.

अखिलेश यादव का पीडीए और सामाजिक न्याय का एजेंडा
अखिलेश यादव की राजनीति में पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक का एक सामाजिक गठजोड़ है, जिसका फायदा उन्हें 2024 के लोकसभा चुनाव में मिला था. अयोध्या विधानसभा सीट पर इसका असर इस बात पर तय करेगा कि यादवों के साथ-साथ दूसरे ओबीसी मतदाता और दलित मतदाता कितना साथ देते हैं. यानी कि ब्राह्मण और दूसरे गैर यादव मतदाताओं का रुख भी असर डाल सकता है.

अयोध्या विधानसभा के पिछले तीन चुनावों में भाजपा और सपा के बीच मुकाबले का रुख बदला है.

विधानसभा चुनाव विजेता पार्टी जीत का अंतर
2012 तेज नारायण पांडेय (पवन पांडेय) सपा 5,405
2017 वेद प्रकाश गुप्ता भाजपा 50,440
2022 वेद प्रकाश गुप्ता भाजपा 19,990

इन नतीजों से यह बात साफ है कि अयोध्या विधानसभा सीट पर सपा बीजेपी के पहले हरा चुकी है. लेकिन साल 2017 और 2022 के चुनाव में बीजेपी ने अपना कब्जा जमाए रखा. लेकिन 2022 में उसकी जीत का अंतर 2017 के मुकाबले कम था. अब वहीं 2024 के लोकसभा चुनाव के नतीजे की बात करें तो सपा के अवधेश प्रसाद भले ही चुनाव जीत गए. लेकिन अयोध्या विधानसभा में भाजपा को करीब 4667 मतों की बढ़त मिली थी.

अब सवाल यह है कि आखिर जीत किसकी होगी
जब से सीएम योगी आदित्यनाथ और अखिलेश यादव ने एक-दूसरे को चैलेंज दिया है, तब से हर किसी के मन में यह सवाल है कि जीत किसकी होगी. हालांकि यह एक काल्पनिक मुकाबला है. इसमें हार-जीत तय करने के लिए कई फैक्टर निकालने होंगे. केवल जातीय समीकरण के जरिए हार-जीत नहीं तय की जा सकती है.



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