राष्ट्रीय जनता दल के अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव की बेटी रोहिणी आचार्य को लेकर एक सोशल मीडिया पोस्ट इन दिनों चर्चा में है. यह पोस्ट बिरजू सिंह नाम के एक व्यक्ति ने की है, जिसमें उन्होंने रोहिणी आचार्य से अपनी पहली मुलाकात का जिक्र किया है. इसके साथ ही पोस्ट में रोहिणी के पिता को किडनी देने के फैसले और परिवार के प्रति उनके त्याग की कहानी ने लोगों का दिल छू लिया है. इस पोस्ट में बिरजू सिंह ने रोहिणी की जो तस्वीर पेश की, उसमें परिवार के प्रति उनका लगाव और अपने भाई को आगे बढ़ते देखने की इच्छा की भी चर्चा की गई है. इसके साथ ही उस पल की भी जीवंत प्रस्तुति है जिसमें साधु यादव के घर पर भगनि रोहिणी आचार्य का पदार्पण होने वाला था. इस पोस्ट में साधु यादव के उस पल की खुशी का वर्णन है जब वह अपनी भगिनी से मुलाकात को लेकर बेहद उत्साहित थे. अब जब सियासत और रिश्तों के उलझन के बीच आत्मीय संबंधों का पारिवारिक प्रसंग चर्चा का विषय बना है, तो सवाल यह है कि लालू परिवार में लंबे समय से चली आ रही खटास की चर्चाओं के बीच आत्मीय रिश्तों को लेकर क्या संकेत दे रही है?
अचानक साधु यादव का फोन आया
बिरजू सिंह ने अपने पोस्ट में लिखा है कि 5 दिन पहले अचानक साधु यादव जी का फोन आया, बिरजू भगिनी आ रही है. साधु जी की आवाज में खुशी साफ झलक रही थी. उन्होंने मुझे भी बुलाया था, इसलिए मैं भी वहां पहुंच गया. रोहिणी आचार्य जी से यह मेरी पहली मुलाकात थी और पहली मुलाकात में ही घंटों बातचीत हुई. बातचीत के दौरान बिरजू सिंह ने रोहिणी से एक सवाल पूछा, पिताजी को किडनी देने का फैसला क्या आपका खुद का था? इस पर रोहिणी ने जो जवाब दिया, उसने उन्हें भीतर तक छू लिया.
तेजस्वी को राजनीति में रहना है…
बिरजू सिंह के मुताबिक रोहिणी ने बताया कि जिस दिन डॉक्टरों ने किडनी ट्रांसप्लांट की बात कही, पूरा परिवार चिंता में पड़ गया था. भाई तेजस्वी समेत सभी परेशान थे. ऐसे समय में उन्होंने खुद फैसला लिया कि वह अपने पिता को अपनी किडनी देंगी. उनका कहना था कि तेजस्वी को राजनीति में सक्रिय रहना है, इसलिए उनके लिए यह संभव नहीं था.
पिताजी को किडनी देने का फैसला खुद लिया था, रोहिणी आचार्य से मिलकर बिरजू सिंह ने शेयर की दिल छू लेने वाली कहानी
महत्वाकांक्षा से ज्यादा परिवार…
बिरजू सिंह बताते हैं कि रोहिणी आचार्य से बातचीत के बाद उनके मन में रोहिणी की एक अलग ही तस्वीर बन गई है. उन्होंने लिखा कि “मुझे लगा कि वह महत्वाकांक्षा से ज्यादा परिवार की खुशियों को महत्व देने वाली महिला हैं. परिवार में उनके साथ चाहे जो कुछ हुआ हो, लेकिन उनके मन में आज भी परिवार के लिए अपनापन है. वह अपने भाई को आगे बढ़ते देखना चाहती हैं और अपने माता-पिता की खुशी को सबसे ऊपर रखती हैं.” अपने पोस्ट में बिरजू सिंह ने रोहिणी के हवाले से लिखा कि परिवार के कठिन दौर में उन्होंने खुद आगे बढ़कर यह फैसला लिया था.
वह विवाद, जिसने परिवार की दरार को सार्वजनिक किया
दरअसल, रोहिणी आचार्य और लालू परिवार के रिश्तों में तनाव की चर्चा खूब चर्चा रही है. नवंबर 2025 में बिहार विधानसभा चुनाव में राष्ट्रीय जनता दल की हार के बाद रोहिणी ने राजनीति छोड़ने और परिवार से नाता तोड़ने की घोषणा की थी. उन्होंने तेजस्वी यादव के करीबी संजय यादव और रमीज पर भी आरोप लगाए थे. इस घटनाक्रम ने परिवार के भीतर मतभेदों को सार्वजनिक बहस का विषय बना दिया था. लेकिन रिश्तों की कहानी वहीं ठहर नहीं गई. सितंबर 2026 के आखिर में रोहिणी आचार्य ने पिता से मिलने आने की बात कही. एक अक्टूबर को वह बिहार पहुंचीं तो पटना एयरपोर्ट पर पिता लालू प्रसाद, माता राबड़ी देवी और मीसा भारती ने उनका स्वागत किया. रोहिणी ने कहा था कि वह पिता के बुलावे पर उनसे मिलने आई हैं और इस यात्रा को राजनीतिक नजरिए से न देखा जाए.
रिश्ते राजनीति से ऊपर
बिरजू सिंह ने पोस्ट के अंत में लिखा कि सोचिए, एक बेटी जो अपने पिता की जिंदगी बचाने के लिए अपना इतना बड़ा त्याग कर दे और बदले में किसी अपेक्षा के बिना परिवार की खुशी चाहे, यह सिर्फ एक राजनीतिक कहानी नहीं, बल्कि रिश्तों, त्याग और भावनाओं की कहानी है. रोहिणी जी से मिलकर एक बात जरूर महसूस हुई कि कुछ रिश्ते राजनीति से बहुत ऊपर होते हैं और एक बेटी का त्याग उन रिश्तों की सबसे खूबसूरत मिसाल है.
मामा भगिनी की मुलाकात के मायने क्या?
इसी बीच लालू प्रसाद यादव की बेटी रोहिणी आचार्य के करीब एक साल बाद सिंगापुर से बिहार लौटने के बाद रोहिणी अपने मामा और पूर्व सांसद साधु यादव से मिलने उनके पटना स्थित घर पहुंचीं. बीते 5 अक्टूबर को हुई इस मुलाकात के दौरान रोहिणी ने मामा-मामी से आशीर्वाद लिया. रोहिणी के पहुंचने पर साधु यादव के घर उनका स्वागत किया गया. उन्होंने मामी को गले लगाया और मामा के पैर छूकर आशीर्वाद लिया और बाद में परिवार के साथ घर के अंदर चली गईं.रोहिणी आचार्य और साधु यादव इस मुलाकात को लेकर राजनीतिक चर्चाएं शुरू हो गई हैं, वहीं साधु यादव ने इसे पूरी तरह पारिवारिक बताया है. लेकिन, इतना तो साफ है कि साधु यादव अपनी भगिनी के घर आने से बेहद खुश थे और उत्साहित भी.
क्या परिवार में सुलह की जमीन तैयार हो रही है?
रोहिणी का अपने माता-पिता से मिलना और अब मामा साधु यादव के यहां उनका आत्मीय स्वागत, दोनों घटनाएं रिश्तों के लिहाज से महत्वपूर्ण हैं. खासकर इसलिए कि सार्वजनिक विवाद के दौरान परिवार के भीतर दूरियां खुलकर सामने आई थीं. ऐसे में परिवार के दूसरे सदस्यों से सहज मुलाकातों को रिश्तों में संवाद की गुंजाइश के रूप में देखा जा सकता है. हालांकि, इससे यह कहना जल्दबाजी होगी कि रोहिणी और तेजस्वी के बीच विवाद खत्म हो गया है या परिवार में पूरी तरह सुलह हो गई है. साधु यादव के यहां हुई मुलाकात से तेजस्वी के साथ रिश्तों के राजनीतिक निहितार्थ भी तभी स्पष्ट होंगे, जब रोहिणी खुद अपनी आगे की भूमिका या परिवार के साथ संबंधों को लेकर कोई साफ बात कहेंगी.
रोहिणी आचार्य से मुलाकात पर साधु यादव बेहद खुश और उत्साहित थे, क्या लालू परिवार के रिश्तों की नई कहानी लिखी जा रही?
कौन हैं बिरजू सिंह?
बिरजू सिंह बिहार के चर्चित सामाजिक कार्यकर्ता माने जाते हैं. वह लंबे समय से लालू परिवार और बिहार की राजनीति पर बेबाकी से लिखते रहे हैं. सोशल मीडिया पर वह अपने विश्लेषण और अंदर की बातों के लिए जाने जाते हैं. साधु यादव और लालू परिवार से उनकी नजदीकी रही है. इसलिए उनकी पोस्ट को सिर्फ एक मुलाकात नहीं, बल्कि बिहार की राजनीति में पारिवारिक रिश्तों के नए एंगल के तौर पर देखा जा रहा है.
रिश्ते और राजनीति, दोनों की अपनी जमीन
लालू परिवार बिहार की राजनीति का एक प्रमुख राजनीतिक परिवार है. यहां रिश्तों में होने वाली हलचल का राजनीतिक चर्चा में बदल जाना स्वाभाविक है. रोहिणी का अपने पिता के प्रति लगाव, परिवार के साथ उनके मतभेद और तेजस्वी के साथ उनके रिश्ते- तीनों पहलुओं को अलग-अलग समझने की जरूरत है. साधु यादव के शब्दों में झलकी खुशी कम से कम इतना जरूर बताती है कि परिवार के भीतर आत्मीयता के रिश्तों की अपनी अहमियत है. लेकिन क्या यह अपनापन लालू परिवार की राजनीतिक और पारिवारिक दरार को पाटने में भी मदद करेगा, इसका जवाब अभी भविष्य के गर्भ में है.