मुख्यमंत्री ने आरोप लगाया कि पिछली YSRCP सरकार ने आरक्षण को फिर से 24 प्रतिशत कर दिया था. उनके अनुसार इससे करीब 16,800 लोगों के स्थानीय चुनावों में नेतृत्व के अवसर प्रभावित हो सकते थे. यह आंकड़ा नायडू का दावा है. इसे स्वतंत्र रूप से प्रमाणित आंकड़े के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए.
अगस्त 2026 में राज्य सरकार ने स्थानीय निकायों में BC आरक्षण को 34 प्रतिशत पर बहाल करने के लिए नए सरकारी आदेश जारी किए. इनमें ग्रामीण स्थानीय निकायों के साथ शहरी निकायों के लिए भी आरक्षण का प्रावधान किया गया. सरकार का उद्देश्य BC समुदायों को स्थानीय शासन में अधिक प्रतिनिधित्व देना था.
लेकिन इस फैसले को अदालत में चुनौती दी गई. विवाद का मुख्य सवाल यह था कि क्या राज्य सरकार पर्याप्त सामाजिक और अनुभवजन्य आंकड़ों के बिना आरक्षण की सीमा बढ़ा सकती है. इसके साथ ही अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और BC के लिए कुल आरक्षण 50 प्रतिशत की सीमा से ऊपर जाने का मुद्दा भी उठा.
पिछड़ी जातियों को 34% से ज्यादा टिकट देगी टीडीपी, चंद्रबाबू नायडू का वादा.
आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट ने 34 प्रतिशत BC आरक्षण पर रोक क्यों लगाई?
आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट ने 1 अक्टूबर 2026 को राज्य सरकार के उन आदेशों को रद्द कर दिया जिनके जरिए स्थानीय निकायों में BC आरक्षण को 34 प्रतिशत किया गया था. अदालत ने कहा कि इस फैसले को उचित ठहराने के लिए जरूरी अनुभवजन्य आंकड़े पर्याप्त रूप से पेश नहीं किए गए थे. अदालत ने कुल आरक्षण के 50 प्रतिशत की सीमा से जुड़े सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का भी उल्लेख किया.
आरक्षण से संबंधित कानूनी व्यवस्था में केवल किसी समुदाय की आबादी का उल्लेख करना पर्याप्त नहीं माना जाता. संबंधित आरक्षण को उचित ठहराने के लिए जरूरी आंकड़ों और कानूनी मानकों का पालन भी महत्वपूर्ण होता है. इसी आधार पर हाई कोर्ट ने राज्य सरकार के फैसले की वैधता पर सवाल उठाए.
हाई कोर्ट ने सरकार और राज्य निर्वाचन आयोग को स्थानीय निकाय चुनावों की प्रक्रिया जल्द शुरू करने का निर्देश भी दिया. अदालत ने कहा कि चुनाव की प्रक्रिया छह सप्ताह के भीतर शुरू करने का प्रयास किया जाए. इस निर्देश के बाद मामला केवल आरक्षण की सीमा तक सीमित नहीं रहा. चुनाव कराने की समयसीमा भी अहम मुद्दा बन गई.
सुप्रीम कोर्ट ने 34 प्रतिशत आरक्षण पर राज्य सरकार की याचिका क्यों खारिज की?
9 अक्टूबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने आंध्र प्रदेश सरकार की उस अपील को खारिज कर दिया जिसमें हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती दी गई थी. जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ ने हाई कोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया.
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से दलील दी गई कि 34 प्रतिशत आरक्षण के फैसले के समर्थन में जनसांख्यिकीय और अनुभवजन्य सामग्री मौजूद है. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के निष्कर्षों में हस्तक्षेप करने का आधार नहीं पाया. हाई कोर्ट ने पहले ही यह माना था कि उपलब्ध आंकड़े आरक्षण को 50 प्रतिशत की सीमा से आगे ले जाने के लिए पर्याप्त नहीं थे.
इस फैसले का तत्काल असर यह है कि राज्य सरकार के अगस्त में जारी किए गए 34 प्रतिशत BC आरक्षण संबंधी आदेश बहाल नहीं हो सके. स्थानीय निकाय चुनावों में आरक्षण का निर्धारण अब लागू कानूनी प्रावधानों और अदालतों के निर्देशों के अनुसार करना होगा.
क्या SIR के कारण आंध्र प्रदेश में स्थानीय निकाय चुनाव टाले जा सकते हैं?
स्थानीय निकाय चुनावों से जुड़ा दूसरा महत्वपूर्ण मुद्दा मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) का है. राज्य में मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण की प्रक्रिया चल रही है. इसी वजह से यह सवाल उठा कि क्या अंतिम संशोधित मतदाता सूची जारी होने तक स्थानीय निकाय चुनावों को रोका जाना चाहिए.
9 अक्टूबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि SIR की प्रक्रिया स्थानीय निकाय चुनावों को टालने का आधार नहीं बन सकती. मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि यदि चुनाव की अधिसूचना जारी होने से पहले संशोधित मतदाता सूची प्रकाशित नहीं होती है तो चुनाव मौजूदा मतदाता सूची के आधार पर कराए जा सकते हैं.
यह मामला हाई कोर्ट के उस निर्देश से जुड़ा था जिसमें राज्य सरकार और राज्य निर्वाचन आयोग को चुनाव प्रक्रिया शुरू करने के लिए कहा गया था. YSRCP की ओर से इस प्रक्रिया को चुनौती दी गई थी. सुप्रीम कोर्ट के स्पष्टीकरण ने चुनाव प्रक्रिया और मतदाता सूची के पुनरीक्षण को अलग-अलग कानूनी पहलुओं के रूप में देखने की स्थिति स्पष्ट की.
BC समुदायों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर इस फैसले का क्या असर पड़ेगा?
आंध्र प्रदेश में आगामी स्थानीय निकाय चुनावों के दौरान BC प्रतिनिधित्व दो अलग-अलग स्तरों पर चर्चा का विषय रहेगा. पहला स्तर कानूनी रूप से आरक्षित सीटों का है. दूसरा स्तर राजनीतिक दलों की ओर से BC उम्मीदवारों को दिए जाने वाले टिकट का है.
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद राज्य सरकार की 34 प्रतिशत आरक्षण बहाल करने की कोशिश को फिलहाल राहत नहीं मिली है. इसलिए आरक्षित सीटों की संख्या और वितरण पर लागू कानूनी व्यवस्था महत्वपूर्ण बनी रहेगी. वहीं TDP ने 34 प्रतिशत से अधिक टिकट देने का वादा किया है. पार्टी के लिए इस घोषणा को उम्मीदवारों की सूची में लागू करना अलग जिम्मेदारी होगी.
नायडू ने अपने संबोधन में कहा कि कानूनी अड़चनों के बावजूद उनकी पार्टी BC समुदायों के साथ खड़ी रहेगी. उन्होंने यह भी कहा कि सरकार आरक्षण बढ़ाने के प्रयास जारी रखेगी. लेकिन 34 प्रतिशत आरक्षण के मामले में सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले के बाद सरकार के सामने कानूनी सीमाओं के भीतर आगे बढ़ने की चुनौती है.