दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण नियंत्रण को लेकर विशेषज्ञ समिति ने व्यापक सिफारिशें दी हैं. अब केवल पुरानी बीएस-4 या उससे पहले की गाड़ियों तक सीमित नहीं रहकर बीएस-6 वाहनों को भी चरणबद्ध तरीके से सड़कों से हटाने का रोडमैप तैयार किया गया है. टू-व्हीलर को 2035 और कारों को 2040 तक चरणबद्ध रूप से बाहर करने का प्रस्ताव है. इसके बाद केवल इलेक्ट्रिक वाहनों का ही रजिस्ट्रेशन होगा.
समिति ने CAQM को अंतरिम रिपोर्ट सौंपी है जिसमें इस सर्दी से बीएस-4 गाड़ियों पर अस्थायी रोक लगाने की सलाह दी गई है. पायलट प्रोजेक्ट 2026 की सर्दी से शुरू हो सकता है और 2030 तक इन्हें पूरी तरह बाहर करने का सुझाव है. बीएस-1 से बीएस-3 गाड़ियों को तुरंत हटाने की सिफारिश की गई है. साथ ही 2027 से दिल्ली में केवल इलेक्ट्रिक ऑटो रजिस्टर होंगे.
BS-6 गाड़ियां भी होंगी बंद
विशेषज्ञ समिति ने स्पष्ट किया है कि प्रदूषण घटाने की तैयारी अब पुरानी गाड़ियों तक सीमित नहीं रहेगी. बीएस-6 टू-व्हीलर को 2035 और कारों को 2040 तक सड़कों से हटाने का प्रस्ताव रखा गया है. इसके बाद केवल इलेक्ट्रिक वाहनों का रजिस्ट्रेशन जारी रहेगा. समिति का मानना है कि बीएस-6 गाड़ियां वर्तमान में कुल सक्रिय वाहनों में बड़ी हिस्सेदारी रखती हैं, लेकिन पीएम उत्सर्जन में उनका योगदान अपेक्षाकृत कम है.
BS-4 और पुरानी गाड़ियों पर रोक
इस सर्दी से बीएस-4 गाड़ियों पर अस्थायी प्रतिबंध लगाने की सिफारिश की गई है. CAQM को सौंपी गई अंतरिम रिपोर्ट में 1 नवंबर से 31 जनवरी के बीच पायलट प्रोजेक्ट चलाने का सुझाव है. 2026 की सर्दी से इसे व्यापक रूप से लागू किया जा सकता है और 2030 तक बीएस-4 वाहनों को पूरी तरह बाहर कर दिया जाए. बीएस-1 से बीएस-3 श्रेणी की गाड़ियों को तुरंत हटाने की सलाह दी गई है.
एनसीआर में लगभग 2.21 करोड़ एक्टिव और फिटनेस-एग्जेम्प्ट वाहन हैं. इनमें बीएस-6 की हिस्सेदारी करीब 41 प्रतिशत है लेकिन पीएम उत्सर्जन में उनका योगदान मात्र 7 प्रतिशत बताया गया है. बीएस-1 से बीएस-3 वाहन संख्या में 19 प्रतिशत हैं पर उत्सर्जन में 30 प्रतिशत योगदान करते हैं. बीएस-4 गाड़ियां संख्या में करीब 30 प्रतिशत हैं जबकि उत्सर्जन में उनकी हिस्सेदारी 74 प्रतिशत है.
इलेक्ट्रिक वाहनों को खरीदने पर प्रोत्साहन
समिति ने ई-ऑटो पर 50 हजार, टू-व्हीलर पर 30 हजार और इलेक्ट्रिक टैक्सी या निजी कार पर एक लाख रुपये तक प्रोत्साहन का सुझाव दिया है. पुरानी गाड़ी स्क्रैप करने पर 10 हजार से एक लाख रुपये तक अतिरिक्त छूट प्रस्तावित है. पेट्रोल-डीजल गाड़ियों को ईवी में बदलने पर भी टू-व्हीलर के लिए 20 हजार और थ्री-व्हीलर के लिए 40 हजार रुपये तक इंसेंटिव का प्रावधान है. ‘राइट टू चार्ज’ कानून बनाने का भी सुझाव दिया गया है ताकि बिना आवंटित पार्किंग वाली सोसायटियों और ऑफिस कॉम्प्लेक्स में कम से कम 20 प्रतिशत पार्किंग पर साझा चार्जिंग की व्यवस्था हो.
सरकारी और नगर निगम वाहनों का इलेक्ट्रिफिकेशन
1 अप्रैल 2027 से सरकारी कार्यालयों में खरीदे या किराए पर लिए जाने वाले वाहन ज़ीरो एमीशन वाले रखने का सुझाव है. नगर निगम की सभी गाड़ियों को 2030 तक इलेक्ट्रिक करने का प्रस्ताव रखा गया है. कंस्ट्र्क्शन एक्विपमेंट्स 2028 और भारी खनन व अर्थ-मूविंग मशीनरी 2030 तक इलेक्ट्रिक करने की सिफारिश है. सड़क की धूल के लिए वैक्यूम क्लीनिंग और पानी के छिड़काव, कचरा जलाने पर रोक, निर्माण स्थलों की घेराबंदी तथा उद्योगों में इलेक्ट्रिक हीटिंग और पटाली प्रबंधन के लिए सीबीजी प्लांट्स को बढ़ावा देने की सलाह भी दी गई है.
2027 से केवल इलेक्ट्रिक ऑटो और एलजीवी का रजिस्ट्रेशन
दिल्ली में 1 जनवरी 2027 से ऑटो और 3.5 टन तक के हल्के मालवाहक वाहनों (LGV) का रजिस्ट्रेशन सिर्फ इलेक्ट्रिक किया जाए. ये नियम पूरे एनसीआर में भी लागू करने की सिफारिश है. गुरुग्राम, फरीदाबाद, सोनीपत, गाजियाबाद और गौतमबुद्ध नगर में 1 जनवरी 2028 से केवल इलेक्ट्रिक ऑटो रजिस्ट्रेशन का प्रस्ताव है. बाकी एनसीआर में ये व्यवस्था 1 जनवरी 2029 से लागू करने की सलाह दी गई है.
3.5 से 7.5 टन वाले LGV के लिए भी अलग समयसीमा तय की गई है. दिल्ली में इनके लिए 1 जनवरी 2028 से इलेक्ट्रिक रजिस्ट्रेशन का प्रस्ताव है. हाई व्हीकल डेंसिटी वाले जिलों में ये नियम 1 जुलाई 2028 और बाकी एनसीआर में 1 जनवरी 2029 से लागू करने की सिफारिश है.
CNG के बाद अब EV पर जोर
समिति का कहना है कि सीएनजी ने डीजल के मुकाबले प्रदूषण कम करने में मदद की, लेकिन सीएनजी ऑटो का रजिस्ट्रेशन जारी रखना लंबे समय में साफ परिवहन के लक्ष्य के अनुरूप नहीं है. ऑटो बाजार में इलेक्ट्रिक गाड़ियों की हिस्सेदारी तेजी से बढ़ रही है. नई बिक्री में इनकी हिस्सेदारी करीब 2.2 प्रतिशत है, इसके बावजूद नई बिक्री से होने वाले पीएम 2.5 उत्सर्जन में इनकी हिस्सेदारी करीब 19 प्रतिशत है.
दिल्ली में ये हिस्सेदारी करीब 37 प्रतिशत है. समिति का अनुमान है कि नए ऑटो को पूरी तरह इलेक्ट्रिक करने से हर साल करीब 5.5 टन पीएम 2.5 उत्सर्जन कम किया जा सकता है. हल्की मालवाहक गाड़ियों के मामले में पहले डीजल गाड़ियों को हटाने का सुझाव है. रिपोर्ट के मुताबिक डीजल एलजीवी, सीएनजी एलजीवी की तुलना में करीब दोगुना प्रदूषण करते हैं.