बास्केटबॉल में बबिता तिग्गा का जलवा, अंतरराष्ट्रीय पहचान से रोशन हुआ बतौली

बास्केटबॉल में बबिता तिग्गा का जलवा, अंतरराष्ट्रीय पहचान से रोशन हुआ बतौली


Babita Tigga Basketball Player: छत्तीसगढ के सरगुजा जिले के बतौली के एक किसान कि बेटी जिसका परिवार छत्तीसगढ के बाहर आज़ तक नही गया लेकिन बेटी ने कमाल कर दिया दरसल हम बात कर रहे हैं बबिता तिग्गा कि जिन्होंने 4 बार अलग अलग देशों में में जाकर अपने प्रतिभा को एक अलग पहचान दिलाई और गोल्ड मेडल तक जीती. लेकिन अब बेटी कोच बनना चाहती और इसके लिए प्राइवेट जॉब करती है. इसके साथ में नई प्रतिभा तराशने का सपना है देखिए खेत खलिहान से निकली प्रतिभा आज देश ही नहीं दुनिया में भी अपना जलवा बिखेर चुकी है, देखिए ये रिपोर्ट…

छठवीं कक्षा से शुरू हुआ बास्केटबॉल का सफर
बबिता तिग्गा ने लोकल 18 से बातचीत में बताया कि बचपन में उन्होंने कभी नहीं सोचा था कि वह बास्केटबॉल खिलाड़ी बनेंगी. शुरुआत में वह फुटबॉल खेलती थीं. इसी दौरान खेल चयन प्रक्रिया के माध्यम से उनका परिचय बास्केटबॉल से हुआ. राजेश सर ने उन्हें खेल के बारे में बताया और भिलाई व दुर्ग में ले जाकर बास्केटबॉल से परिचित कराया. इसके बाद बेहतर प्रशिक्षण के लिए वह राजनांदगांव पहुंचीं, जहां प्रशिक्षकों के मार्गदर्शन में उन्होंने खेल की बारीकियां सीखीं.बबिता बताती हैं कि जब वह छठवीं कक्षा में थीं, तब उनका यह सफर शुरू हुआ देखते ही देखते बास्केटबॉल उनके जीवन का अहम हिस्सा बन गया और आज उन्हें इस खेल से जुड़े करीब 12 साल हो चुके हैं.

सुबह चार बजे उठकर करती थीं अभ्यास, फिर जाती थीं स्कूल
बबिता के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंचना आसान नहीं था. खेल के साथ पढ़ाई को संभालना उनके सामने बड़ी चुनौती थी. वह बताती हैं कि अभ्यास के लिए सुबह चार बजे उठना पड़ता था. कई बार इंडोर स्टेडियम में वह अकेले अभ्यास करती थीं, जबकि बाकी खिलाड़ी सो रहे होते थे. बबिता के मुताबिक, शुरुआती दौर में कई बार ऐसा लगता था कि वह अकेले ही इतनी मेहनत कर रही हैं, लेकिन उन्होंने हार मानने के बजाय खुद को आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया.सुबह अभ्यास के बाद वह स्कूल जाती थीं. दोपहर करीब ढाई बजे घर लौटने के बाद थोड़ा आराम करतीं और फिर तीन से साढ़े तीन बजे के बीच दोबारा अभ्यास के लिए निकल जाती थीं. उनकी दिनचर्या में खेल और पढ़ाई दोनों के लिए जगह थी. इसी अनुशासन और निरंतर मेहनत ने उन्हें आज इस मुकाम तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई.

किसान परिवार की बेटी, माता-पिता ने हमेशा बढ़ाया हौसला
बबिता तिग्गा एक किसान परिवार से आती हैं. उनके पिता खेती-किसानी करते हैं, जबकि उनकी मां गृहिणी हैं. परिवार खेती के जरिए अपनी आजीविका चलाता है. ऐसे माहौल में खेल के क्षेत्र में आगे बढ़ना उनके लिए एक बड़ी उपलब्धि रही है. बबिता बताती हैं कि उनके माता-पिता ने शुरू से ही उनका साथ दिया और आज भी उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करते हैं. जब वह पहली बार छत्तीसगढ़ से बाहर खेलने जाने वाली थीं, तब परिवार और गांव के लोगों के लिए यह गर्व का क्षण था.वह कहती हैं कि उनके गांव और बतौली ब्लॉक में लोगों ने उनकी उपलब्धि की सराहना की. परिवार को भी इस बात की खुशी थी कि उनकी बेटी खेल के माध्यम से बाहर जाकर अपने क्षेत्र का नाम रोशन करने जा रही है,

चार बार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर किया प्रतिनिधित्व
बबिता तिग्गा अब तक चार बार अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खेल चुकी हैं. उनके खेल सफर में फ्रांस, थाईलैंड और क्रोएशिया जैसे देशों में खेलने का अनुभव शामिल है. विदेश में खेलने के अनुभव ने उन्हें खेल के साथ-साथ वहां की जीवनशैली और व्यवस्थाओं को करीब से समझने का अवसर दिया.बबिता बताती हैं कि विदेश और भारत के माहौल में उन्हें कई अंतर नजर आए. वहां साफ-सफाई, खानपान और फिटनेस पर विशेष ध्यान दिया जाता है. उनके अनुसार, खिलाड़ियों की दिनचर्या और शारीरिक तैयारी में भी उन्हें अंतर महसूस हुआ. हालांकि, अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में उन्हें अलग-अलग स्थानों पर संतोष करना पड़ा, लेकिन उनके लिए विदेश में खेलना और अपने खेल को बेहतर बनाना भी एक महत्वपूर्ण अनुभव रहा है.

नौकरी के साथ बीपीएड की पढ़ाई, अब कोच बनने का सपना
अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंचने के बावजूद बबिता ने अपने भविष्य को लेकर साफ लक्ष्य तय किया है. फिलहाल वह श्री साईं बाबा स्कूल में पार्ट टाइम नौकरी कर रही हैं और साथ ही बीपीएड की पढ़ाई भी कर रही हैं. उनका सपना है कि वह आगे चलकर पीटीआई बनें और बास्केटबॉल कोच के रूप में बच्चों को प्रशिक्षण दें. वह चाहती हैं कि ग्रामीण क्षेत्रों के बच्चों को भी बेहतर सुविधाएं और मार्गदर्शन मिले, ताकि वे खेल में उनसे भी आगे निकल सकें और देश-प्रदेश का नाम रोशन करें.बबिता का मानना है कि उन्होंने जिस संघर्ष और मेहनत से अपना मुकाम हासिल किया है. उससे अगली पीढ़ी के खिलाड़ियों को सीख मिल सकती है. वह चाहती हैं कि बच्चों को सही प्रशिक्षण मिले और उन्हें आगे बढ़ने के लिए ज्यादा अवसर उपलब्ध हों.

बबिता की कहानी ग्रामीण बेटियों के लिए बनी प्रेरणा
बबिता तिग्गा की कहानी बताती है कि प्रतिभा केवल बड़े शहरों तक सीमित नहीं है. गांवों और छोटे कस्बों में भी ऐसे खिलाड़ी हैं, जो मेहनत और सही मार्गदर्शन के दम पर अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंच सकते हैं. एक ओर खेतों में मेहनत करने वाला परिवार है, तो दूसरी ओर सुबह चार बजे उठकर अभ्यास करने वाली बेटी. इसी संघर्ष ने बबिता को एक नई पहचान दी है. अब वह अपने अनुभव को आने वाली पीढ़ी के साथ साझा करना चाहती हैं, ताकि ग्रामीण क्षेत्र के और भी बच्चे खेल को अपना करियर बना सकें.बबिता के लिए यह सफर अभी खत्म नहीं हुआ है. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खेलने के बाद अब उनका लक्ष्य नई प्रतिभाओं को तैयार करना है, जिससे सरगुजा और छत्तीसगढ़ की और बेटियां खेल के मैदान में अपनी पहचान बना सकें.



Source link