मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार फिलहाल विपक्ष के निशाने पर हैं. उन्हें हटाने के लिए अलग-अलग तरीके से विपक्षी पार्टियां आंदोलन कर रही हैं. दिल्ली में तो सम्मिलित रूप से धरना-प्रदर्शन का सिलसिला ही चल रहा है. काग्रेस नेता राहुल गांधी विपक्षी आंदोलन के अगुआ बने हैं. मुख्य चुनाव आयुक्त का इस्तीफा होने तक आंदोलन जारी रखने की उन्होंने ठान ली है. कभी मुख्य चुनाव आयुक्त बने टीएन शेषन के खिलाफ भी इसी तरह की आवाज बुलंद हुई थी. तब भले किसी ने उनका इस्तीफा नहीं मांगा, लेकिन उनके कार्यों को असंवैधानिक ठहराने की भरपूर कोशिश हुई.
शेषन के खिलाफ संभवतः इसलिए भी आंदोलन की स्थिति नहीं उत्पन्न हुई होगी, क्योंकि तब सोशल मीडिया का जमाना नहीं था. आज रील्स, मीम और डीप फेक कंटेंट की वजह से भी सोशल मीडिया अधिक प्रभावकारी हो गया है. आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस (AI) ने तो इसमें कैटेलिटिक का काम किया है. बहरहाल, इतना तो तय है कि जब भी चुनाव आयोग या इसके अधिकारियों ने निर्वाचन नियमों में क्रांतिकारी बदलवा किए, उसका पुरजोर विरोध उन दलों ने जरूरों किया, जिन्हें उनसे नुकसान का खतरा महसूस होता था.
फैसलों के विरोध की परिपाटी
कभी चुनाव आयोग के सलाहकार रहे केजे राव और मुख्य चुनाव आयुक्त की भूमिका में अपने फैसलों के लिए मशहूर टीएन शेषन से ज्ञानेश कुमार तक ने चुनाव प्रक्रिया में क्रांतिकारी बदलाव किए. इसकी वजह से वे राजनीतिक दलों का निशाना बनते रहे हैं.
चुनाव आयोग को स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने वाली संवैधानिक संस्था का दर्जा प्राप्त है. लेकिन, जब भी चुनाव प्रक्रिया में बड़े बदलाव या सख्ती लागू की गई, मुख्य चुनाव आयुक्त या संबंधित अधिकारी राजनीतिक दलों के निशाने पर आते रहे. यह पैटर्न बार-बार दोहराया गया है. बदलाव को एक पक्ष सुधार मानता है तो दूसरा पक्ष पक्षपात. मौजूदा मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के साथ भी यही हो रहा है. उन्होंने जबसे गहन मतदाता पुनरीक्षण (SIR) की प्रक्रिया शुरू की है, तब से वे विपक्षी पार्टियों के निशाने पर आ गए हैं.
केजे राव ने क्या बदलाव किए
केजे राव के रूप में विख्यात कोम्माजोसयुला जगन्नाथ राव चुनाव आयोग के जब सलाहकार और पर्यवेक्षक बने तो उनके कार्यकाल में पहला चुनाव 2005 में बिहार में हुआ. उन दिनों चुनावी हिंसा और बूथ लूट की घटनाओं के लिए बिहार बदनाम था. बाहुबली नेताओं का आतंक था. बिहार विधानसभा चुनाव में उनकी भूमिका ऐतिहासिक रही. राव विशेष पर्यवेक्षक बनाए गए. उन्होंने संवेदनशील बूथों की पहचान कराई. सुरक्षा व्यवस्था मजबूत ऐसी कि पैरा मिलिट्री फोर्स को बैरकों में रखने के बजाय उन्होंने मतदान केंद्रों के आसपास तैनात किया.
ईवीएम वितरण तभी होने दिया, जब पेट्रोलिंग अधिकारी संतुष्ट होते. मतदान प्रतिशत में घट-बढ़ की जांच का उन्होंने प्रावधान किया. बाहुबली नेताओं को जेलों में शिफ्ट किया गया. चुनाव आचार संहिता (मॉडल कोड ऑफ कंडक्ट) का सख्ती से पालन कराया. वे खुद मोटरसाइकिल पर सवार होकर दूर-दराज के बूथों का निरीक्षण करते रहे. इसका नतीजा यह हुआ कि 2005 का चुनाव अपेक्षाकृत शांतिपूर्ण और निष्पक्ष माना गया.
मतदाता सूची की सफाई हुई
केजे राव के कार्यकाल में ही मतदाता सूची की भी सफाई भी हुई. यानी सर्वे हुआ. तब सत्ता में रहे राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) और कुछ अन्य पार्टियों ने उनका विरोध किया था. उनके प्रयासों से ही बिहार में बूथ कैप्चरिंग और बैलट बाक्स लूट की घटनाएं बंद हुईं. राव ने पश्चिम बंगाल में भी फर्जी मतदाताओं की पहचान में योगदान दिया था. चुनाव सुधार के लिए केजे राव के कामों को लोग आज भी याद भी करते हैं.
उनकी सख्ती का आलम यह रहा कि बिहार में लगातार 15 साल तक रही राजद की सत्ता चली गई और नीतीश कुमार भाजपा के सहयोग से मुख्यमंत्री बने. आज जिस तरह मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की विपक्ष आलोचना कर रहा है और उनके कामों को वोट चोरी बता कर इस्तीफे की मांग कर रहा है, ठीक वैसा ही विरोध केजे राव को भी बिहार में झेलना पड़ा था.
टीएन शेषन क्यों चर्चा में रहे
टीएन शेषन 1990 से 1996 तक मुख्य चुनाव आयुक्त थे. उन्हें नए दौर के चुनाव आयोग का निर्माता माना जाता है. उन्होंने आदर्श आचार संहिता को सिर्फ कागजों तक ही सीमित नहीं रहने दिया, बल्कि उस पर सख्ती से अमल भी कराया. दीवार लेखन और लाउड स्पीकर का दुरुपयोग रोकने का श्रेय उन्हें ही जाता है. सरकारी मशीनरी के दुरुपयोग रोका तो हिंसा पर सख्ती भी बरती. चुनाव खर्च की निगरानी बढ़ाई और कई जगहों पर चुनाव स्थगित या दोबारा करवाए.
उनका सबसे महत्वपूर्ण काम फोटो युक्त वोटर आईडी कार्ड रहा. उन्होंने सरकार से साफ-साफ कहा कि अगर कार्ड जारी नहीं किए गए तो चुनाव नहीं कराएंगे. कई मुख्यमंत्रियों ने इसका विरोध किया. शेषन ने चुनाव आयोग के दस्तावेजों से ‘भारत सरकार’ शब्द भी हटवाया और संस्था की स्वतंत्रता पर जोर दिया. पहली बार 1993 में सरकार ने आयोग को 3 सदस्यीय बनाया तो उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी. हालांकि कोर्ट ने बहुसदस्यीय व्यवस्था बरकरार रखा. उनके सख्त रवैए ने उन्हें राजनीतिक दलों का निशाना बना दिया था.
वोटर आईडी से लालू खफा
टीएन शेषन जब फोटो युक्त वोटर आईडी अनिवार्य करने पर अड़े थे, तब बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव ने तीखा विरोध किया था. लालू ने चेतावनी दी कि अगर शेषन फोटो आईडी के आधार पर चुनाव स्थगित करते हैं तो गंभीर परिणाम भुगतने होंगे. उनका कहना कि ऐसा होने पर लोकतंत्र हाथ से निकल जाएगा. लालू ने आरोप लगाया कि शेषन जनता दल शासित बिहार और ओडिशा के साथ भेदभाव कर रहे हैं. तब दोनों राज्यों में जनता दल की सरकारें थीं.
उन्होंने पूछा कि अगर आईडी के बिना चुनाव बेमानी हैं तो आंध्र प्रदेश, कर्नाटक जैसे राज्यों के चुनाव क्यों रद्द नहीं किए गए. लालू का तर्क था कि संविधान में आईडी अनिवार्य नहीं है और आयोग को चुनाव टालने का अधिकार नहीं. बाद में अदालती हस्तक्षेप के बाद प्रक्रिया आगे बढ़ी, लेकिन यह विवाद यादगार रहा. शेषन से लालू को नफरत ऐसी कि वे उन्हें ‘शेषनवा’ कह कर आलोचना करते थे.
अब ज्ञानेश कुमार निशाने पर
ज्ञानेश कुमार फरवरी 2025 में मुख्य चुनाव आयुक्त बने. वे 2023 के नए कानून के तहत नियुक्त पहले सीईसी हैं, जिसमें चयन समिति में प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और प्रधानमंत्री की ओर से नामित कैबिनेट मंत्री शामिल हैं. सुप्रीम कोर्ट ने पहले सीजेआई को शामिल करने का सुझाव दिया था, जिसे संशोधन कर सरकार ने बदल दिया. इस पर विपक्ष को आपत्ति थी. यही वजह है कि शुरू से ही ज्ञानेश कुमार विपक्ष के निशाने पर हैं. विपक्ष को SIR के बहाने ज्ञानेश कुमार पर हमलावर होने का मौका मिल गया है. SIR की ड्राफ्ट मतदाता सूची से करोड़ों नाम हटाए गए हैं.
विपक्ष आरोप लगाता है कि इससे योग्य मतदाता प्रभावित हो रहे हैं और यह ‘वोट चोरी’ है. सितंबर 2026 में इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के बाद तो विवाद चरम पर पहुंच गया है. रिपोर्ट में कहा गया था कि 2 चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने 10 महीनों में कम से कम 14 बार लिखित आपत्ति दर्ज की. फिर भी ज्ञानेश कुमार ने मनमानी फैसले लिए. विपक्ष ने ज्ञानेश कुमार को ‘डिक्टेटर’ बताते हुए उनके इस्तीफे की मांग शुरू की है. उनके खिलाफ महाभियोग की भी तैयारी विपक्ष कर रहा है.
CEC और BJP निशाने पर
कांग्रेस ने ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग की है. इसमें तृणमूल कांग्रेस, समाजवादी पार्टी समेत अन्य विपक्षी दल उनके साथ खड़े हो गए हैं. 2 अक्टूबर से ही आंदोलन चल रहा है. विपक्षी पार्टियों ने ज्ञानेश कुमार को बीजेपी का कठपुतली करार दिया है. हालांकि इतिहास गवाह है कि सत्ता पक्ष भी पहले आयोग पर सवाल खड़ा करता रहा है. शेषन के समय नरसिम्हा राव सरकार ने आयोग को 3 सदस्यीय बना कर उनकी शक्ति सीमित करने की कोशिश की थी. कांग्रेस के साथ रहते और बिहार में सत्ता संभालते लालू प्रसाद यादव ने शेषन और केजे राव पर हमला बोला था. 2005 में आरजेडी ने राव के सख्त रवैए का विरोध किया था. हालांकि ज्ञानेश कुमार के मामले में इस बार सत्ता पक्ष उनका बचाव करता रहा है. सत्ताधारी विपक्ष के आरोपों को निराधार बताते हैं.