रांची. झारखंड की राजनीति के सबसे बड़े नामों में शुमार रहे शिबू सोरेन के संघर्ष की कहानी सिर्फ जंगल, आंदोलन और जेल तक सीमित नहीं है. इस कहानी का एक मजबूत किरदार उनकी पत्नी रूपी सोरेन भी रही हैं. आज रूपी सोरेन गंभीर रूप से बीमार हैं और पिछले 19 दिनों से रांची के हिल व्यू हॉस्पिटल में भर्ती हैं. उन्हें लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर रखा गया है. बुधवार को मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन अपनी मां का हाल जानने अस्पताल पहुंचे. उन्होंने डॉक्टरों से इलाज और स्वास्थ्य की जानकारी ली. इस दौरान जेएमएम (JMM) के कई नेता, मंत्री योगेंद्र प्रसाद और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता रामेश्वर उरांव भी अस्पताल पहुंचे. रांची के जाने-माने न्यूरो मेडिसिन विशेषज्ञ डॉ. उज्जवल राय को भी अस्पताल बुलाया गया.
रूपी सोरेन की तबीयत को लेकर परिवार और समर्थक चिंतित हैं. लेकिन अस्पताल के इस गंभीर माहौल के बीच उनकी जिंदगी के वे किस्से भी याद आते हैं, जब उन्होंने शिबू सोरेन की गैरमौजूदगी में परिवार और जमीन की लड़ाई खुद संभाली थी. वरिष्ठ पत्रकार अनुज कुमार सिन्हा से बातचीत में रूपी सोरेन ने अपने जीवन के ऐसे कई प्रसंग सुनाए थे, जो बताते हैं कि झारखंड आंदोलन के उस दौर में उनकी भूमिका कितनी जुझारू थी.
महाजन खेत जोतने पहुंचा तो हसुआ लेकर दौड़ा दिया
नेमरा में महाजनों के दबाव और जमीन को लेकर विवाद का जिक्र करते हुए रूपी सोरेन ने बताया था कि एक बार बिष्टु साव नाम का महाजन कुछ लोगों के साथ उनके खेत पर पहुंचा और जबरन जमीन जोतने लगा. उस समय शिबू सोरेन जेल में बंद थे. रूपी सोरेन ने विरोध किया, लेकिन जब वह नहीं माना तो उन्होंने धान काटने वाला हसुआ उठा लिया. वह गुस्से में महाजन के पीछे दौड़ पड़ीं. उन्होंने उसे पकड़ लिया और उसके कपड़े तक फाड़ दिए. इसके बाद उन्होंने अपनी ननद को आवाज लगाई. रूपी सोरेन ने कहा था कि उन्होंने ननद से कहा कि इसे पकड़ो, इसका बाल काटकर टकला करना है. इसके बाद दोनों ने मिलकर उसकी पिटाई की. इस घटना के बाद महाजन भाग गया और फिर उसने दोबारा उस जमीन पर कब्जा करने की कोशिश नहीं की. यह सिर्फ एक जमीन विवाद का किस्सा नहीं था. यह उस दौर की उस महिला की कहानी थी, जिसका पति आंदोलन और संघर्ष के कारण अक्सर घर से दूर रहता था और जिसे परिवार, जमीन और बच्चों की जिम्मेदारी खुद संभालनी पड़ती थी.
चाचा ने समझाया- ताकतवर लोगों से मत उलझो
रूपी सोरेन ने बताया था कि परिवार के एक चाचा ने उन्हें समझाया था कि सामने वाले लोग ताकतवर हैं, इसलिए उनसे उलझना ठीक नहीं होगा. लेकिन रूपी सोरेन ने उन्हें भी दो टूक जवाब दिया. उनका कहना था कि जब आपकी जमीन पर कोई कब्जा कर रहा है तो आप उसी का बचाव क्यों कर रहे हैं. उन्होंने चाचा से किनारे रहने को कहा और भरोसा दिलाया कि वह खुद इससे निपट लेंगी. यही तेवर आगे चलकर उनके जीवन की पहचान बने. शिबू सोरेन आंदोलन में थे, पुलिस उनके पीछे थी और परिवार पर भी दबाव था. ऐसे समय में घर की चौखट के भीतर रूपी सोरेन खुद एक मोर्चा संभाल रही थीं.
पुलिस पूछताछ करने आती थी तो कहती थीं- ये शिबू सोरेन का घर नहीं
शिबू सोरेन जब आंदोलन के दौर में पुलिस से बचते हुए फरारी में रहते थे, तब पुलिस का दबाव परिवार पर भी रहता था. रूपी सोरेन के मुताबिक 1970 के आसपास पुलिस अक्सर घर आती थी और उनसे पूछताछ करती थी. ऐसे ही एक मौके पर जब पुलिस ने उनसे लगातार सवाल किए तो उन्होंने पलटकर कहा था- यह शिबू सोरेन का घर नहीं है, रूपी सोरेन का घर है. शिबू सोरेन यहां नहीं आते. जहां होंगे, वहां जाकर खोजिए. उनकी यह बात उस दौर के दबाव के बीच उनके आत्मविश्वास और बेबाकी को दिखाती है.
जब जंगल में शिबू सोरेन को खोजने निकल पड़ी थीं
शिबू सोरेन फरारी के दिनों में टुंडी के आसपास के जंगल-पहाड़ों में रहते थे. परिवार को उनकी कोई खबर नहीं मिलती थी. रूपी सोरेन ने बताया था कि एक समय वह इतनी परेशान हो गई थीं कि उन्होंने खुद जंगल में जाकर गुरुजी को खोजने का फैसला किया. उनकी सास, ननद और वह खुद जंगल की ओर निकल पड़ीं. उस समय उनकी गोद में उनका बेटा दुर्गा था. तीनों को जंगल-पहाड़ों में काफी भटकना पड़ा. यह उनके जीवन का बेहद कठिन दौर था. पति आंदोलन में थे, पुलिस की नजर थी और घर-परिवार की जिम्मेदारी उनके कंधों पर थी. लेकिन मुश्किल वक्त में उनकी ननद हमेशा उनके साथ खड़ी रहीं.
शादी के तुरंत बाद जेल चले गए थे शिबू सोरेन
रूपी सोरेन के संघर्ष की शुरुआत शादी के कुछ समय बाद ही हो गई थी. उन्होंने बताया था कि शादी के तुरंत बाद शिबू सोरेन को गिरफ्तार कर हजारीबाग जेल में बंद कर दिया गया था. उस वक्त वह नई-नई शादी हुई महिला थीं. कोई बच्चा भी नहीं था और उनके पास इतनी आर्थिक क्षमता नहीं थी कि पति को जेल से बाहर निकालने का इंतजाम कर सकें. वह गांव में अकेली पड़ गई थीं. काफी सोचने के बाद उन्होंने गांव के ही एक व्यक्ति से मदद मांगी. उनसे कहा कि आपके बेटे के जेल में होने पर आप भी समझ सकते हैं कि परिवार पर क्या गुजरती है. या तो कुछ पैसे उधार दे दीजिए या फिर चांडिल जाने का टिकट कटवा दीजिए. इसके बाद वह अपने मायके चांडिल पहुंचीं और अपने पिता से शिबू सोरेन को जेल से छुड़ाने की गुहार लगाई.
पिता ने पैसे जुटाए, हजारीबाग जाकर छुड़ाया
रूपी सोरेन ने बताया था कि उनके पिता ने पैसे की व्यवस्था करने में कुछ समय लिया. इसके बाद वह अपने पिता के साथ हजारीबाग गईं. वहां से शिबू सोरेन को जेल से बाहर निकालकर नेमरा लाया गया. जेल से बाहर आने के समय शिबू सोरेन की हालत काफी खराब थी. नेमरा में उनकी देखभाल की गई और धीरे-धीरे उन्हें स्वस्थ किया गया. रूपी सोरेन ने उस घटना को याद करते हुए कहा था कि आज भी उस दौर को याद करने पर उनका मन कांप उठता है.
आज वही रूपी सोरेन लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर
एक दौर वह था जब रूपी सोरेन हसुआ लेकर जमीन पर कब्जा करने पहुंचे महाजन के पीछे दौड़ रही थीं. कभी जंगलों में पति को खोज रही थीं, तो कभी पुलिस के सवालों का सामना कर रही थीं. कभी पति को जेल से छुड़ाने के लिए मायके से मदद मांग रही थीं. आज वक्त बदल चुका है. वही रूपी सोरेन रांची के हिल व्यू हॉस्पिटल में जिंदगी की जंग लड़ रही हैं. पिछले 19 दिनों से उनका इलाज चल रहा है और उन्हें लाइफ सपोर्ट सिस्टम पर रखा गया है. बुधवार को मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन अपनी मां का हाल जानने अस्पताल पहुंचे. डॉक्टरों से इलाज की जानकारी ली और उनकी स्थिति की लगातार निगरानी करने को कहा. झामुमो के नेता और सरकार के मंत्री भी अस्पताल पहुंच रहे हैं.
संघर्ष भरा रहा रूपी सोरेन का जीवन
रूपी सोरेन के जीवन की ये यादें बताती हैं कि झारखंड आंदोलन के इतिहास में जिन संघर्षों का जिक्र अक्सर शिबू सोरेन के नाम के साथ होता है, उन संघर्षों की एक दूसरी कहानी उनके घर की चौखट के भीतर भी लिखी जा रही थी. उस कहानी में एक महिला थी, जो जरूरत पड़ने पर हसुआ लेकर भी खड़ी हो जाती थी और अपने परिवार की लड़ाई खुद लड़ती थी.