अंटार्कटिका में ही क्यों बनाई गई वो लैब, जहां रिसर्च ने दिला दिया फिजिक्स का नोबेल

अंटार्कटिका में ही क्यों बनाई गई वो लैब, जहां रिसर्च ने दिला दिया फिजिक्स का नोबेल


फिजिक्स का नोबेल पुरस्कार 2026 जिस खोज के लिए फ्रांसिस हैल्जेन को दिया गया उसकी लैब अंटार्कटिका में बर्फ के कई मीटर नीचे बनाई गई थी. आइसक्यूब न्यूट्रिनो ऑब्जर्वेटरी नाम की इस लैब और इसमें की गई हाई एनर्जी न्यूट्रिनो की खोज के लिए ही उन्हें फिजिक्स का नोबेल दिया गया है.

अंटार्कटिका धरती का सबसे बड़ा महाद्वीप है, जिसका 98 प्रतिशत हिस्सा बर्फ की मोटी चादर से ढंका है. 140 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले इस महाद्वीप की अपनी कोई आबादी नहीं है. यहां किसी भी तरह का खनन और अन्य सैन्य गतिविधियां प्रतिबंधित हैं. इसीलिए इस इलाके में सिर्फ रिसर्च की जाती हैं. न्यूट्रिनो की खोज के लिए इस इलाके को चुनने की वजह भी यहां की बर्फ थी.

क्या होते हैं न्यूट्रिनो

हमारे आसपास जो भी चीज मौजूद है वह न्यूट्रिनो से ही बनी होती है. यह एक सब अटॉमिक कण होता है, जिसे देखा नहीं जा सकता. न तो इसमें इलेक्ट्रिकल वेव्स होती हैं और न ही इसका कोई भार या आकार होता है. इसीलिए न्यूट्रिनो को ब्रह्मांड का सबसे शर्मीला कण भी कहा जा सकता है. खास बात ये है कि इस कण को न तो हमारा शरीर रोक सकता है और न ही पत्थर की दीवार. ये इतना हल्का होता है कि किसी के भी आर-पार निकल सकता है. वैज्ञानिकों के मुताबिक सूर्य की ओर से आने वाले अरबों न्यूट्रिनो हर सेकेंड हमारे शरीर के आर पार होते हैं, लेकिन हम इसे महसूस भी नहीं कर पाते.

रिसर्च में क्यों है ये महत्वपूर्ण

न्यूट्रिनो ब्रह्मांड के दूरस्थ और रहस्यमय हिस्सों से आते हैं. वैज्ञानिकों के मुताबिक इनमें ऐसी जानकारियां छिपी हैं, जो ये बता सकती हैं कि इनका निर्माण कैसे हुआ. इन्हीं की मदद से ये ब्लैक होल, सुपरनोवा विस्फोट, सक्रिय आकाशगंगाओं और अन्य रहस्यमय खगोलीय घटनाओं को बेहतर तरीके से समझा जा सकता है. हालांकि वैज्ञानिकों के सामने ये समस्या थी कि आखिर इन्हें पकड़ा कैसे जाए. अरबों-खरबों न्यूट्रिनो धरती तक आते हैं मगर किसी के टकराते ही नहीं है. ऐसे में फ्रांसिस हैल्जेन के मन में ख्याल आया कि क्यों न इन्हें बर्फ में पकड़ने की कोशिश की जाए.

नोबल प्राइज

कैसे आया ये आइडिया

1980 में पहली बार हैल्जेन ने इसकी योजना बनाई. उन्होंने एक पैटर्न का विश्लेषण किया, जिसमें पता चला कि न्यूट्रिनो पारदर्शी बर्फ के साथ प्रतिक्रिया कर रहा है. 1988 में उन्होंने और जॉन जी लर्नेड ने इस विचार को वैज्ञानिक समुदाय के सामने रखा. उन्होंने बताया कि अगर बर्फ पर्याप्त पारदर्शी हो और उसमें सेंसर लगाए जाएं तो रोशनी को रिकॉर्ड किया जा सकता है. इससे ये पता चल सकता है कि न्यूट्रिनो किस दिशा से आया था.

अंटार्कटिका में कैसे बनाई गई लैब?

बर्फ के लिए अंटार्कटिका से बेहतर जगह नहीं मिल सकती थी. यहां बर्फ की गहराई में हमेशा अंधेरा रहता है. जमीन के अंदर गहराई में बर्फ इतनी पारदर्शी है कि उसमें हल्की रोशनी भी पकड़ी जा सकती है. बर्फ स्थिर रहने की वजह से सेंसर भी अच्छी तरह काम कर सकते थे. आखिरकार काम शुरू हुआ. गर्म पानी की मदद से बर्फ के नीचे सैकड़ों मीटर तक गहरे होल बनाए गए जिसमें सेंसर की लंबी-लंबी तार डाली गईं.

हैल्जेन इन सेंसरों को उल्टा बल्ब की तरह कहते हैं. क्योंकि ये रोशनी पैदा नहीं करते बल्कि उसे पकड़कर इलेक्ट्रिक वेव्स में बदल देते हैं. इसके लिए पहला डिटेक्टर AMANDA था, लेकिन उसका आकार छोटा था. इसके बाद आइसक्यूब न्यूट्रिनो ऑब्जर्वेटरी बनाया गया.

कितनी बड़ी है ये ऑब्जर्वेटरी

अंटार्कटिका में बनी यह ऑब्जर्वेटरी 1 घर किलोमीटर बर्फ को डिटेक्टर के तौर पर प्रयोग करती है. इसमें 5 हजार से ज्यादा सेंसर लगाए गए हैं जो 86 केबल्स पर अटके हैं. 2011 में इसका काम पूरा हुआ था. हैल्जेन ने शुरुआत से लेकर वैज्ञानिक परिणाम मिलने पर इस पूरे प्रोजेक्ट को लीड किया.

न्यूट्रिनो से वैज्ञानिकों ने क्या खोजा?

2013 में ऑब्जर्वेटरी ने पहली बार उच्च-ऊर्जा न्यूट्रिनो को समझा. इससे ये पता चला कि सूर्य के भीतर ऊर्जा कैसे बनती है. सुपरनोवा विस्फोटों में क्या होता है और ब्रह्मांड की सबसे शक्तिशाली घटनाएं कैसे काम करती हैं. अब वैज्ञानिक ये पता लगा रहे हैं कि धूल के बादल की वजह से सब सामान्य प्रकाश धरती तक नहीं पहुंचता तो न्यूट्रिनो कैसे इन बाधाओं को पार कर लेते हैं.

आगे क्या खोजा जाएगा?

वैज्ञानिक अब ये पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि आखिर ये न्यूट्रिनो आते कहां से हैं. वैज्ञानिकों ने ऐसी संभावना जताई है कि शायद ये NGC 1068 (M77) नामक आकाशगंगा से आ रहे हैं. हालांकि वैज्ञानिकों के पास अभी तक ऐसा कोई प्रमाण नहीं है जो निश्चित तौर पर इसे न्यूट्रिनो का सोर्स बता सके..



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