Black Death Vs Pneumonic Plague : समंदर के रास्ते आई थी ‘काली मौत’, खा गई थी आधी आबादी, न्यूमोनिक प्लेग तो उसके आगे कुछ नहीं

Black Death Vs Pneumonic Plague : समंदर के रास्ते आई थी ‘काली मौत’, खा गई थी आधी आबादी, न्यूमोनिक प्लेग तो उसके आगे कुछ नहीं


इतिहास के पन्नों में कुछ ऐसी काली तारीखें दर्ज हैं, जिनका नाम सुनते ही आज भी रूह कांप जाती है. 14वीं सदी में समंदर के रास्ते आई एक ऐसी ही अनाम खौफनाक बला ने पूरी दुनिया में मौत का वो नंगा नाच दिखाया था, जिसकी मिसाल इंसानी सभ्यता में दूसरी नहीं मिलती. आज जब रूस के साइबेरिया स्थित लैब में न्यूमोनिक प्लेग का मामला सामने आने पर 200 लोगों को निगरानी में रखा गया है और दुनिया में हड़कंप मचा है, तो इतिहास का वो काला पन्ना फिर से आंखों के सामने तैरने लगता है. लेकिन सच तो ये है कि आज का न्यूमोनिक प्लेग चाहे कितना भी घातक क्यों न हो, इतिहास की उस ‘काली मौत’ के आगे कुछ भी नहीं है.

इटली के मेसिना बंदरगाह पर पहुंची खुद ‘मौत’

ये खौफनाक कहानी शुरू होती है साल 1347 के आखिर में. भूमध्य सागर में इटैलियन व्यापारियों के 12 समुद्री जहाज काले सागर से सफर पूरा करके इटली के मेसिना बंदरगाह पर पहुंचे. जब स्थानीय लोग जहाजों का स्वागत करने और सामान उतारने के लिए बंदरगाह पर गए तो वहां का नजारा देखकर उनके पैरों तले जमीन खिसक गई.

जहाज पर सवार ज्यादातर नाविक मर चुके थे. जो चंद लोग जिंदा बचे थे, वो दर्द से तड़प रहे थे, उनके शरीर पर काले-बैंगनी रंग की बड़ी-बड़ी सूजी हुई गांठें निकल आई थीं और उनके मुंह से काला खून बह रहा था. मेसिना के अधिकारियों ने आनन-फानन में उन जहाजों को बंदरगाह से खदेड़ दिया, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी. समंदर के रास्ते आई वो ‘काली मौत’ इटली की जमीन पर कदम रख चुकी थी.

काले चूहों और पिसू ने खोला खा Black Death का दरवाजा

इस महा-विनाश की असली वजह वो इंसानी नाविक नहीं थे, बल्कि उन लकड़ी के जहाजों में छिपे काले चूहे और उनके शरीर पर चिपके पिसू थे. जब ये बीमारी पिसुओं के जरिए इंसानों के खून में पहुंची तो शरीर का इम्यूनिटी पूरी तरह खत्म हो गई थी.

इंसान को संभलने का मौका तक नहीं मिलता था. कोई इंसान अगर सुबह एकदम स्वस्थ उठकर अपने काम पर निकलता, तो दोपहर होते-होते उसके कांख और जांघों के बीच में सेब के आकार की दर्दनाक गिलटियां निकल आती थीं. शाम तक मरीज को तेज बुखार और खून की उल्टियां होने लगती थीं और रात होते-होते उसकी तड़प-तड़पकर मौत हो जाती थी. मरीज की सांसों और पसीने से इतनी भयानक सड़न की बदबू आती थी कि अपने भी पास जाने से कतराते थे.

यूरोप की आधी आबादी साफ, लाशों के ढेर से पटे शहर

1347 से 1353 के बीच, महज छह सालों के भीतर इस ‘काली मौत’ ने जो तबाही मचाई, उसकी कल्पना करना भी नामुमकिन है. इटली, फ्रांस, इंग्लैंड, जर्मनी और रूस तक कोई भी देश इस बला से नहीं बच सका. शहरों के शहर श्मशान में तब्दील हो गए.

मौत का आंकड़ा इतना भयावह था कि लोगों को दफनाने के लिए कब्रिस्तानों में जगह कम पड़ गई. सड़कों पर लाशों के ढेर लगे रहते थे. इटली और फ्रांस के कई बड़े शहरों में विशालकाय गड्ढे खोदे गए, जिनमें सैकड़ों लावारिस लाशों को एक के ऊपर एक कचरे की तरह फेंककर मिट्टी से ढक दिया जाता था. इस महामारी ने यूरोप की 50% से अधिक आबादी को खत्म कर दिया. यानी हर दो में से एक इंसान की मौत तय थी. खेती-बारी ठप्प हो गई, बाजार वीरान हो गए और सामंती ढांचा पूरी तरह ताश के पत्तों की तरह ढह गया.

चूहों की वजह से फैली थी महामारी (रॉयटर्स)

आज का न्यूमोनिक प्लेग Vs 14वीं सदी की ‘ब्लैक डेथ’

अब सवाल उठता है कि साइबेरिया में जिस न्यूमोनिक प्लेग की वजह से दहशत फैली है, उसकी तुलना में ‘ब्लैक डेथ’ कितनी बड़ी तबाही थी?

न्यूमोनिक प्लेग सीधे फेफड़ों पर असर करता है और हवा के जरिए फैलता है. बिना इलाज के इसमें मृत्यु दर 100% होती है, जो इसे ब्यूबोनिक प्लेग से भी ज्यादा खतरनाक बनाती है. लेकिन अगर ऐतिहासिक नजरिए से तुलना करें, तो ब्लैक डेथ के आगे आज का न्यूमोनिक प्लेग कुछ भी नहीं है. इसके पीछे 3 बड़े कारण हैं.

  1. आधुनिक चिकित्सा और एंटीबायोटिक्स: 14वीं सदी में जब ‘ब्लैक डेथ’ फैली, तब इंसानों को ये भी नहीं पता था कि बीमारी बैक्टीरिया से फैलती है या हवा के किसी सराप से. लोग इसे ईश्वर का प्रकोप मान रहे थे. लेकिन आज हमारे पास ‘स्ट्रेप्टोमाइसिन’ और ‘डॉक्सीसाइक्लिन’ जैसी असरदार एंटीबायोटिक दवाएं मौजूद हैं. अगर न्यूमोनिक प्लेग के मरीज को शुरुआती 24 घंटे में ये दवा मिल जाए, तो उसकी जान सौ फीसदी बचाई जा सकती है.
  2. संक्रमण रोकने का आधुनिक ढांचा: 14वीं सदी में जहाजों के जरिए चूहे और पिसू बेरोक-टोक पूरी दुनिया में घूमते रहे और बीमारी फैलती गई. आज साइबेरिया की घटना सामने आते ही तुरंत 200 से ज्यादा लोगों को क्वारंटाइन कर दिया गया और कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग शुरू हो गई. आधुनिक साइंस के पास इस बीमारी को महामारी बनने से रोकने का पूरा रोडमैप है.
  3. तबाही का पैमाना: ‘ब्लैक डेथ’ ने दुनिया की कुल आबादी में से करोड़ों लोगों को मिटा दिया था. उस जमाने में बिना किसी मेडिकल साइंस के जिस तरह ‘काली मौत’ ने महाद्वीपों को वीरान किया, वैसा खौफ आज के दौर में मुमकिन नहीं है.

इतिहास की सबसे बड़ी सीख

समंदर के रास्तों से आई उस ‘काली मौत’ ने इंसानी इतिहास का रुख हमेशा-हमेशा के लिए बदल दिया था. उसने पूरी दुनिया को ये सिखाया कि कुदरत और सूक्ष्मजीवों के आगे इंसान कितना लाचार है.

साइबेरिया में न्यूमोनिक प्लेग से हुई हालिया मौत हमें ये चेतावनी जरूर देती है कि भले ही हमने आधुनिक दवाएं बना ली हों, लेकिन सदियों पुराना ये बैक्टीरिया आज भी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है. फर्क सिर्फ इतना है कि 14वीं सदी में इंसान बेबस होकर मौत का इंतजार करता था और आज साइंस की ढाल हमारे पास मौजूद है, जिसकी वजह से ‘ब्लैक डेथ’ जैसा महा-विनाश अब सिर्फ इतिहास के पन्नों तक ही सीमित रहेगा.



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