अमेरिका और चीन के बीच कारोबारी जंग अब विमानों तक पहुंचती दिख रही है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ऐसा खेल कर दिया है, जिससे चीन के जेट इंजन में ज़ंग लगना तय माना जा रहा है. दरअसल चीन ने अपना पहला मेड इन चाइना यात्री विमान C919 तैयार किया है और इसे देश की विमानन आत्मनिर्भरता का बड़ा प्रतीक करार दे रहा है. हालांकि इसके इंजन को लेकर चीन अभी भी अमेरिकी कल पुर्जों पर निर्भर है. यही निर्भरता अब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की सरकार के लिए चीन पर दबाव बनाने का नया हथियार बनती दिख रही है.
हालांकि यह मामला सिर्फ कुछ विमान के पुर्जों तक सीमित नहीं है. इसके पीछे अमेरिका और चीन के बीच रेअर अर्थ मिनिरल्स और रणनीतिक सप्लाई चेन को लेकर चल रही बड़ी सौदेबाजी भी दिखाई दे रही है.
C919 की कमजोर नस पर अमेरिका की नजर
चीन का C919 संकरी बॉडी वाला यात्री विमान है, जिसे बोइंग 737 (Boeing 737) और एयरबस ए 320 (Airbus A320) का मुकाबला करने के लिए तैयार किया गया है. COMAC के मुताबिक, इसमें 158 से 192 यात्रियों के बैठने की क्षमता है. इस विमान को सितंबर 2022 में चीन ने सर्टिफिकेट दे दिया था और मई 2023 में इसे उड़ान भरनी शुरू कर दी थी.
हालांकि इस ‘मेड इन चाइना’ विमान की राह में एक बड़ा अड़ंगा है. दरअसल C919 विमान पूरी तरह घरेलू तकनीक पर आधारित नहीं है. इसका सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा यानी इंजन अभी विदेशी तकनीक पर निर्भर है. दरअसल C919 में LEAP-1C इंजन इस्तेमाल होता है. इसे सीएफएम इंटरनेशनल बनाती है, जो अमेरिकी कंपनी जीई एयरोस्पेस और फ्रांस की सैफ्रान का संयुक्त उपक्रम है. यही इंजन अब चीन के लिए सबसे बड़ी चिंता बनता जा रहा है.
ट्रंप ने पुर्जों को बना दिया सौदेबाजी का हथियार
रॉयटर्स के अनुसार, अमेरिकी वाणिज्य विभाग ने चीन जाने वाले विमान के पुर्जों की एक्सपोर्ट लाइसेंसिंग धीमी कर दी है. इसके अलावा अमेरिका ऐसे नियम पर भी विचार कर रहा है, जिससे चीन को लैंडिंग गियर और दूसरे पुर्जों की सप्लाई सीमित करना आसान हो सके.
एक ड्राफ्ट में विमानन क्षेत्र में इस्तेमाल होने वाले हाइड्रोलिक फ्लूइड के लिए भी लाइसेंस की जरूरत का प्रस्ताव रखा गया है. COMAC को दिए जाने वाले पुर्जों के लाइसेंस की संख्या सीमित करने का कदम भी इसी रणनीति का हिस्सा बताया जा रहा है.
अमेरिका की इन सारी कोशिशों चीन की तरफ से दुर्लभ खनिजों (Rare Earth Minerals) और मैग्नेट के निर्यात पर कंट्रोल से जुड़ा है. ये खनिज अमेरिकी ऑटोमोबाइल, सेमीकंडक्टर, एयरोस्पेस और रक्षा उद्योगों के लिए महत्वपूर्ण हैं. ऐसे में वॉशिंगटन चीन के ही इस कंट्रोल वाले हथियार का इस्तेमाल बीजिंग पर दवाब बनाने के लिए कर रहा है.
असली डर LEAP-1C इंजन को लेकर
हालांकि C919 के मामले में स्थिति अलग है. चीन अभी अपने यात्री विमानों के लिए अमेरिकी और पश्चिमी तकनीक पर निर्भर है. अगर अमेरिका ने भविष्य में LEAP-1C इंजन या उससे जुड़े जरूरी पुर्जों की सप्लाई पर कड़ा प्रतिबंध लगाया, तो C919 के बड़े पैमाने पर उत्पादन पर असर पड़ सकता है.
यही वजह है कि चीनी विशेषज्ञों के बीच इस बात को लेकर चिंता है कि C919 की उत्पादन योजना कुछ वर्षों तक प्रभावित हो सकती है.
चीन का जवाब क्या होगा?
यहीं से चीन के अपने CJ-1000A इंजन की कहानी महत्वपूर्ण हो जाती है. चीन लंबे समय से इस इंजन को विकसित कर रहा है, ताकि भविष्य में उसे विदेशी इंजन पर निर्भर न रहना पड़े. कुछ चीनी विशेषज्ञों को उम्मीद है कि CJ-1000A को 2027 के आसपास प्रमाणन मिल सकता है और इसके बाद इसका उत्पादन बढ़ाया जा सकता है. अगर ऐसा हुआ तो लंबे समय में चीन अमेरिकी इंजन पर अपनी निर्भरता कम कर सकता है.
हालांकि फिलहाल इसमें कई अड़चनें हैं. चीनी विश्लेषकों के मुताबिक, किसी इंजन का परीक्षण पूरा कर लेना और उसे यात्रियों को लेकर नियमित व्यावसायिक उड़ानों के लिए इस्तेमाल करना दो अलग-अलग बातें हैं. इंजन को पहले तकनीकी और सुरक्षा प्रमाणन हासिल करना होगा, फिर बड़े पैमाने पर उत्पादन की क्षमता साबित करनी होगी और अंत में C919 में इसे लगाने के लिए विमान के डिजाइन में बदलाव का प्रमाणन भी कराना होगा.
2030 से पहले पूरी तरह घरेलू इंजन मुश्किल?
यही वजह है कि निकट भविष्य में C919 में अमेरिकी LEAP-1C और चीन के घरेलू इंजन के बीच संक्रमण का दौर लंबा चल सकता है. कुछ विश्लेषकों का मानना है कि C919 में पूरी तरह घरेलू इंजन का इस्तेमाल 2030 से पहले मुश्किल हो सकता है.
दूसरी तरफ, चीन के लिए यही अमेरिकी दबाव उसकी विमानन आत्मनिर्भरता की रफ्तार बढ़ाने का कारण भी बन सकता है. अगर पश्चिमी सप्लाई पर भरोसा जोखिम बनता है, तो बीजिंग अपने इंजन, एवियोनिक्स और दूसरे विमानन सिस्टम को तेजी से घरेलू बनाने पर और ज्यादा पैसा लगा सकता है.
दुर्लभ खनिज बनाम जेट इंजन… दोनों तरफ दबाव
अमेरिका और चीन की यह खींचतान एकतरफा नहीं है. जहां अमेरिका विमानन तकनीक और पुर्जों में अपनी मजबूत स्थिति का इस्तेमाल कर रहा है, वहीं चीन के पास दुर्लभ खनिजों की सप्लाई का बड़ा प्रभाव है.
Reuters के मुताबिक, अमेरिका इस बात से नाराज है कि चीन ने पिछले व्यापार समझौते में महत्वपूर्ण खनिजों की सप्लाई को लेकर जो वादे किए थे, उनकी पूरी तरह बहाली नहीं हुई है. अगस्त में अमेरिका जाने वाले चीन के दुर्लभ खनिज मैग्नेट के शिपमेंट में भी पिछले महीने की तुलना में गिरावट दर्ज की गई थी.
यानी अमेरिका C919 के पुर्जों पर दबाव बढ़ाकर चीन को संकेत दे रहा है कि अगर बीजिंग दुर्लभ खनिजों की सप्लाई को लेकर रियायत नहीं देता, तो वॉशिंगटन के पास भी दबाव बनाने के विकल्प मौजूद हैं.
चीन के सामने दो रास्ते
अब चीन के सामने दो रास्ते दिखाई दे रहे हैं. पहला, अमेरिका के साथ बातचीत के जरिए C919 के लिए जरूरी इंजन और पुर्जों की सप्लाई बनाए रखना. दूसरा, अपनी घरेलू विमानन तकनीक को इतनी तेजी से विकसित करना कि भविष्य में अमेरिका या किसी दूसरे पश्चिमी देश के प्रतिबंध का असर कम से कम हो.
2025 में भी अमेरिका ने COMAC के लिए GE के LEAP-1C इंजन की सप्लाई पर अस्थायी रोक लगाई थी. बाद में जुलाई 2025 में GE को फिर से चीन को इंजन भेजने की अनुमति मिल गई थी. उस समय भी यह कदम दुर्लभ खनिजों को लेकर अमेरिका-चीन व्यापार तनाव के बीच उठाया गया था.
इस बार अमेरिका का दबाव फिर बढ़ता दिख रहा है. ऐसे में C919 के लिए असली परीक्षा सिर्फ आसमान में उड़ान भरने की नहीं, बल्कि अपने इंजन और सप्लाई चेन को बाहरी दबाव से सुरक्षित करने की है.
यही वजह है कि ‘मेड इन चाइना’ C919 की कहानी अब सिर्फ एक विमान बनाने की कहानी नहीं रह गई है. यह अमेरिका और चीन के बीच तकनीक, व्यापार, दुर्लभ खनिजों और आत्मनिर्भरता की बड़ी लड़ाई का नया मोर्चा बनती जा रही है.