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उत्तर प्रदेश राज्यसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी (सपा) द्वारा तीसरा उम्मीदवार न उतारने का फैसला राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बना हुआ है. पिछले कई दिनों से सपा के बड़े नेता तीसरा प्रत्याशी खड़ा करने की जोरों से हवाबाजी कर रहे थे. लेकिन अंतिम समय में संख्या बल की भारी कमी और संभावित क्रॉस वोटिंग के कारण होने वाली फजीहत को भांपते हुए पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने कदम पीछे खींच लिए. अपनी इस रणनीतिक शिकस्त को छिपाने के लिए अब वे 2027 के विधानसभा चुनाव की 403 सीटों पर ध्यान केंद्रित करने का नया नैरेटिव लेकर सामने आए हैं.
तीसरी राज्यसभा सीट की हवा से 403 के मैदान तक कैसे पहुंचे अखिलेश? अंतिम वक्त में सपा की बदली रणनीति समझिए
उत्तर प्रदेश के राज्यसभा चुनाव (16 अक्टूबर 2026) का सियासी घटनाक्रम पल-पल रंग बदल रहा है. बीते कल तक जो समाजवादी पार्टी राजनीतिक गलियारों में तीसरा उम्मीदवार उतारने का माहौल बनाकर भाजपा खेमे में खलबली मचाने का दावा कर रही थी. आज नामांकन के अंतिम दिन उसने पूरी तरह से अपने कदम पीछे खींच लिए हैं. सपा मुखिया अखिलेश यादव के एक सोशल मीडिया पोस्ट ने यूपी की राजनीति में नया बवंडर खड़ा कर दिया है, जिसमें उन्होंने लिखा कि उनकी नजर अब ‘तीन पर नहीं, बल्कि 403 विधानसभा सीटों पर है.’ विरोधी दल जहां इसे संख्या बल की कमी के कारण नाक कटने और फजीहत से बचने का बहाना बता रहे हैं, वहीं सोशल मीडिया पर आम जनता और राजनीतिक विश्लेषक भी इस फैसले को लेकर दोफाड़ नजर आ रहे हैं. कुछ लोग इसे अखिलेश की परिपक्व रणनीति मान रहे हैं तो कुछ इसे ‘रणछोड़’ नीति. आखिर ऐसा क्या हुआ कि ऐन वक्त पर अखिलेश को 403 सीटों का यह नया नैरेटिव लाना पड़ा? जानिए इस सियासी ड्रामे की पूरी कहानी.
राज्यसभा की तीसरी सीट की हवाबाजी से सरेंडर तक का सफर
चुनाव की घोषणा के बाद से ही समाजवादी पार्टी की ओर से यह माहौल बनाया जा रहा था कि पार्टी हर हाल में तीसरी सीट पर अपना दावा ठोकेगी. सपा विधायक रविदास मेहरोत्रा सहित कई शीर्ष नेताओं ने तो यहां तक दावा कर दिया था कि प्रस्तावक विधायकों के हस्ताक्षर भी जुटा लिए गए हैं और मंगलवार सुबह 11 बजे विधानभवन में नामांकन दाखिल किया जाएगा. लेकिन जैसे ही भाजपा ने अपने 8 उम्मीदवारों की बेहद मजबूत सूची जारी की, सपा खेमे में खलबली मच गई. नामांकन के आखिरी घंटों से ठीक पहले अखिलेश यादव ने घुटने टेक दिए, जिससे सपा की रणनीतिक हवा पूरी तरह फुस्स हो गई.
नंबर गेम का खौफ और अखिलेश यादव को नाक कटने का डर
राजनीतिक विश्लेषकों का स्पष्ट मानना है कि अखिलेश यादव का यह कदम कोई सोची-समझी रणनीति नहीं, बल्कि आंकड़ों के खेल में पिछड़ने की मजबूरी है. उत्तर प्रदेश में राज्यसभा की एक सीट पर जीत दर्ज करने के लिए 37 प्रथम वरीयता के वोटों की दरकार होती है.
सपा के पास अपने दो घोषित उम्मीदवारों जिसमें डॉ. रामगोपाल यादव और धनराज परिमल नथवानी को आसानी से संसद भेजने के लिए पर्याप्त विधायक (101 विधायक) मौजूद हैं. लेकिन तीसरे उम्मीदवार की नैया पार लगाने के लिए पार्टी को 8 अतिरिक्त वोटों की सख्त आवश्यकता थी. यदि सपा तीसरा प्रत्याशी उतारती तो उसे एनडीए खेमे में (जिसके पास 288 विधायकों का मजबूत सुरक्षा कवच है) बड़ी सेंधमारी करनी पड़ती. वर्तमान परिस्थितियों में यह असंभव लग रहा था. उल्टा जोखिम यह था कि चुनाव में हार के साथ-साथ सपा के अपने विधायकों में भी क्रॉस वोटिंग का खतरा बढ़ जाता, जो कि छह महीने बाद होने वाले उपचुनावों और आगामी विधानसभा चुनावों से पहले पार्टी के लिए आत्मघाती साबित होता. इसी फजीहत से अपनी नाक बचाने के लिए अखिलेश ने मैदान छोड़ना बेहतर समझा.
‘403 सीटों’ का नैरेटिव: सिर्फ एक फेस-सेविंग एक्ट?
जब सपा का पीछे हटना तय हो गया, तब अखिलेश यादव ने अपनी कमजोरी को छिपाने के लिए एक नया पासा फेंका. उन्होंने एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर पोस्ट किया, “अब हमारी निगाह तीन पर नहीं, चार सौ तीन पर है.” राजनीतिक गलियारों में इस बयान को सपा प्रमुख का ‘फेस-सेविंग नैरेटिव’ (लाज बचाने की कोशिश) कहा जा रहा है. आलोचकों के अनुसार, जब राज्यसभा की एक सीट जीतने की हैसियत नहीं बन पाई, तो कार्यकर्ताओं का मनोबल बनाए रखने के लिए 2027 के महासमर की दुहाई दी जा रही है.
निर्विरोध चुनाव का रास्ता साफ
अखिलेश यादव के इस व्यावहारिक सरेंडर का सीधा परिणाम यह हुआ है कि उत्तर प्रदेश की सभी 10 राज्यसभा सीटों पर अब मुकाबला खत्म हो गया है. सपा के मैदान छोड़ने के साथ ही भारतीय जनता पार्टी के 8 और समाजवादी पार्टी के 2 उम्मीदवारों का निर्विरोध (Unopposed) चुना जाना पूरी तरह तय हो गया है. विपक्ष का आरोप है कि सपा केवल दबाव की राजनीति (Pressure Politics) कर रही थी, लेकिन जब बात हकीकत की आई तो वह रण छोड़कर भाग खड़ी हुई.