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Humanity Service: समाजसेवी अनिल डागर अब तक करीब 22 हजार लावारिस शवों का अंतिम संस्कार कर चुके हैं. इनमें हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदायों के शव शामिल हैं. हिंदू रीति से अंतिम संस्कार के बाद वे मृतकों की अस्थियां हरिद्वार ले जाकर गंगा नदी में विधि-विधान से विसर्जित करते हैं.
Humanity Service: उज्जैन.अपनों के ठुकराए और बेसहारा लोगों की मृत्यु के बाद उन्हें सम्मानपूर्वक अंतिम विदाई देने का संकल्प उज्जैन के समाजसेवी अनिल डागर ने वर्षों से निभा रखा है. शहर में कहीं भी लावारिस शव मिलने पर पुलिस उन्हें सूचना देकर शव सौंप देती है. अनिल मृतक के धर्म और रीति-रिवाज के अनुसार परिवार के सदस्य की तरह अंतिम संस्कार करते हैं. सालभर में करीब 350 से 400 लावारिस शवों का अंतिम संस्कार उनके माध्यम से किया जाता है.
हिंदू समाज के मृतकों की अस्थियां वे हरिद्वार ले जाकर गंगा में विसर्जित करते हैं. मृतकों की आत्मा की शांति और मोक्ष की कामना के लिए वे तीर्थ यात्राएं भी करते हैं. उनकी इस सेवा को भारत सरकार ने राष्ट्र विभूषण सम्मान से नवाजा है, जबकि विभिन्न समाजों ने भी उन्हें सम्मानित किया है.
शिप्रा में मिला मृतक आत्मा को मोक्ष
श्राद्ध पक्ष मे रामघाट स्थित शिप्रा तट पर समाजसेवी अनिल डागर ने उन मृतकों के लिए तर्पण और पिंडदान किया, जिनका अंतिम संस्कार लावारिस के रूप में किया गया था. 66 अज्ञात मृतकों की आत्मशांति और मोक्ष की कामना के लिए सामूहिक कर्मकांड कराया गया. उत्तम गुरु और उनकी मंडली ने विधि-विधान से अनुष्ठान संपन्न कराया.
15 साल की उम्र से शुरू हुआ सफर
मानव सेवा को अपना धर्म मानने वाले अनिल डागर आज भी जरूरतमंदों और लावारिस शवों के अंतिम संस्कार का कार्य कर रहे हैं. उन्होंने महज 15 वर्ष की उम्र में इस सेवा की शुरुआत की थी. 52 वर्ष की उम्र में भी उनका यह संकल्प लगातार जारी है. कोरोना महामारी के कठिन दौर में, जब लोग अपनों के शवों के अंतिम संस्कार तक से डर रहे थे, तब अनिल डागर ने आगे बढ़कर हजारों मृतकों का अंतिम संस्कार किया. उन्होंने जाति-धर्म की सीमाओं से ऊपर उठकर हिंदू और मुस्लिम समाज के लोगों को अंतिम विदाई दी. उनके इस कार्य ने उन्हें मानवता का सच्चा सेवक बना दिया.
कैसे हुई शुरुआत
अनिल बताते है कि, वर्षों पहले श्मशान में एक संत से उन्हें लावारिस मृतकों के लिए कर्म करने की प्रेरणा मिली थी. इसके बाद उन्होंने इस सेवा को अपने जीवन का हिस्सा बना लिया. उनका कहना है कि जिन मृतकों के लिए जल अर्पित करने वाला कोई नहीं है, उनके लिए तर्पण और पिंडदान करना मानवता का कार्य है.