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Who is Abhi Ram Almora : अल्मोड़ा के अभि राम हुड़के की थाप को अपनी जिंदगी का हिस्सा बना चुके हैं. उम्र बढ़ने के साथ जहां कई लोग इस पारंपरिक वाद्य से दूर होते चले गए, अभि राम दूसरी मिट्टी के बने हैं. लोकल 18 से अभि राम बताते हैं कि उन्होंने बचपन से ही हुड़का बजाना शुरू कर दिया था. धीरे-धीरे यह शौक उनकी पहचान और फिर आजीविका का साधन बन गया. उन्होंने हुड़के के साथ अपनी जिंदगी का बड़ा हिस्सा बिताया है. उनकी थाप में केवल संगीत नहीं, बल्कि कुमाऊं की लोक संस्कृति, परंपरा और पहाड़ के पुराने दौर की यादें भी सुनाई देती हैं.
कुमाऊं. उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में आज भी कई ऐसे कलाकार मौजूद हैं, जिन्होंने अपनी पारंपरिक कला को आधुनिक दौर में भी जीवित रखा है. इन्हीं कलाकारों में अल्मोड़ा निवासी अभि राम भी शामिल हैं. वह बचपन से हुड़का बजाते आ रहे हैं. उम्र बढ़ने के साथ जहां कई लोग इस पारंपरिक वाद्य से दूर होते चले गए, अभि राम ने हुड़के की थाप को अपनी जिंदगी का हिस्सा बना लिया. आज वह कुमाऊं के अलग-अलग मेलों, त्योहारों और सांस्कृतिक आयोजनों में हुड़का बजाकर अपने परिवार का भरण-पोषण कर रहे हैं. हुड़का उत्तराखंड के कुमाऊं और गढ़वाल अंचल का पारंपरिक ताल वाद्य है. इसका आकार छोटा होता है. इसे हाथ में पकड़कर बजाया जाता है. हुड़के की आवाज पहाड़ की लोकधुनों और पारंपरिक गीतों के साथ अलग पहचान बनाती है. पुराने समय में लोक कलाकार, जागर गायक और अन्य सांस्कृतिक प्रस्तुतियों से जुड़े लोग इसका इस्तेमाल करते थे. धार्मिक अनुष्ठानों, मेलों और लोक आयोजनों में भी हुड़के की विशेष भूमिका रही है.
कैसे बनाते हैं
पारंपरिक रूप से हुड़का लकड़ी और प्राकृतिक चमड़े की मदद से तैयार किया जाता है. लकड़ी को आकार देकर इसके बीच का हिस्सा खोखला किया जाता है. इसके दोनों सिरों पर चमड़े की झिल्ली लगाई जाती है. रस्सी या डोरी की व्यवस्था से इसे कसकर आवाज को नियंत्रित किया जाता है. हाथ और उंगलियों की विशेष थाप से कलाकार अलग-अलग ताल और धुन निकालता है. यही कारण है कि हुड़का बजाना केवल वाद्य को हाथ में पकड़कर थपथपाना नहीं, बल्कि वर्षों के अभ्यास से विकसित होने वाला हुनर है.
सिर्फ एक वाद्य यंत्र नहीं
लोकल 18 से अभि राम बताते हैं कि उन्होंने बचपन से ही हुड़का बजाना शुरू कर दिया था. धीरे-धीरे यह शौक उनकी पहचान और फिर आजीविका का साधन बन गया. वह उत्तराखंड के विभिन्न मेलों और त्योहारों में पहुंचकर अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं. लोकगीतों और पारंपरिक कार्यक्रमों में उनकी हुड़के की थाप माहौल को पहाड़ी रंग दे देती है. बदलते समय के साथ हुड़के और पारंपरिक लोक कलाकारों की मांग पहले की अपेक्षा कम हुई है, लेकिन पहाड़ के कई आयोजनों में आज भी इसकी जरूरत महसूस होती है. उनके लिए हुड़का सिर्फ एक वाद्य यंत्र नहीं, बल्कि उनकी जिंदगी और परिवार की रोजी-रोटी से जुड़ा हुआ है.
धीरे-धीरे कम
आधुनिक संगीत और बदलती मनोरंजन संस्कृति के बीच पारंपरिक वाद्य यंत्रों का चलन धीरे-धीरे कम हो रहा है. ऐसे में अभि राम जैसे कलाकार पहाड़ की लोक संस्कृति और परंपराओं को आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं. उन्होंने हुड़के के साथ अपनी जिंदगी का बड़ा हिस्सा बिताया है. उनकी थाप में केवल संगीत नहीं, बल्कि कुमाऊं की लोक संस्कृति, परंपरा और पहाड़ के पुराने दौर की यादें भी सुनाई देती हैं.