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Russian Researcher Darya Shipilova Death: रूस के साइबेरिया स्थित एंटी-प्लेग इंस्टीट्यूट में एक महिला रिसर्चर की संदेहास्पद मौत से हड़कंप मच गया है. अत्यधिक ठंडे तापमान वाले इस क्षेत्र में रूस प्राचीन और खतरनाक बीमारियों पर गुप्त रिसर्च कर रहा है. यह भविष्य के लिए बड़ा सवाल है.
Darya Shipilova Death: रूस की महिला रिसर्चर की मौत सवालों के घेरे में है
नई दिल्ली (Darya Shipilova Death). इतिहास के पन्नों में दर्ज ‘ब्लैक डेथ’ यानी प्लेग का नाम आते ही रूह कांप जाती है. 14वीं सदी में इस भयानक बीमारी ने दुनिया की एक तिहाई आबादी को मौत की नींद सुला दिया था. वैज्ञानिक तरक्की के दम पर इस बीमारी पर काबू पाया गया. आज इसे इतिहास का काला अध्याय माना जाता है. लेकिन हाल ही में रूस के साइबेरिया क्षेत्र से आई एक खबर ने दुनियाभर के वैज्ञानिकों और रिसर्चर्स के कान खड़े कर दिए हैं. साइबेरिया के प्रमुख एंटी-प्लेग रिसर्च इंस्टीट्यूट में काम करने वाली महिला रिसर्चर डारया शिपिलोवा की संदेहास्पद और अचानक मौत ने हर किसी को हैरान कर दिया है.
साइबेरिया की कड़ाके की ठंड में छिपा एंटी-प्लेग संस्थान का रहस्य
साइबेरिया का नाम सुनते ही बर्फ की सफेद चादर और हड्डियों को जमा देने वाली ठंड का ख्याल आता है. यहां का तापमान अक्सर माइनस में रहता है. क्या आप जानते हैं कि रूस ने इसी ठंडे और वीरान इलाके में सीक्रेट और हाई-सिक्योरिटी रिसर्च इंस्टीट्यूट बनाया है? यहां दुनिया की सबसे खतरनाक और जानलेवा बीमारियों पर रिसर्च होती है. इसका नाम ‘एंटी-प्लेग इंस्टीट्यूट’ है. रूस का यह इलाका इतना अलग है कि यहां कोई खतरनाक वायरस या बैक्टीरिया लीक भी हो जाए तो वह तुरंत आबादी तक नहीं पहुंच सकता. सोवियत संघ के समय से ही साइबेरिया को खतरनाक बायोलॉजिकल रिसर्च का गढ़ माना जाता रहा है.
जब प्लेग खत्म हो चुका है तो रूस वहां कर क्या रहा है?
यह सबसे बड़ा और पेचीदा सवाल है. मॉडर्न मेडिकल साइंस ने प्लेग जैसी बीमारी का इलाज ढूंढ लिया है और यह दुनिया के ज्यादातर हिस्सों से मिट चुकी है तो रूस इस पर करोड़ों रुपये खर्च क्यों कर रहा है? इसका वैज्ञानिक और रणनीतिक जवाब है कि प्लेग फैलाने वाले बैक्टीरिया (Yersinia pestis) वक्त के साथ खुद को बदल सकते हैं (Mutate). इसके अलावा, जैविक हथियारों (Biological Weapons) की रेस और भविष्य में किसी अज्ञात महामारी के खतरे से निपटने के लिए रूस अपनी तैयारियों को पुख्ता रखना चाहता है.
क्या वायरस से डरने की जरूरत है?
वैज्ञानिकों का मानना है कि ग्लोबल वॉर्मिंग के कारण साइबेरिया की जमी हुई बर्फ (Permafrost) पिघल रही है. बर्फ के अंदर सदियों पुराने दबे हुए बैक्टीरिया और वायरस फिर से जीवित हो सकते हैं. इसलिए रूसी वैज्ञानिक समझने की कोशिश कर रहे हैं कि अगर प्राचीन प्लेग या कोई नया म्यूटेंट वायरस पर्यावरण में वापस आया तो इंसानी शरीर पर उसका क्या असर होगा. इसी कड़ी में साइबेरिया की उस लैब में रिसर्च चल रही थी, जो अब हादसे या लापरवाही की भेंट चढ़ गई है.
कई विषयों का मेल है यह मामला
प्रतियोगिता परीक्षाओं (यूपीएससी स्टेट पीसीएस और सामान्य ज्ञान) की तैयारी कर रहे अभ्यर्थियों के लिए यह घटना विज्ञान, इतिहास और भूगोल का बेहतरीन मेल है. प्रतियोगी परीक्षाओं में ‘ब्लैक डेथ’ से जुड़े सवाल पूछे जाते हैं. इसलिए आपको पता होना चाहिए कि प्लेग एक तरह का बैक्टीरियल इन्फेक्शन है, जो चूहों और पिल्सू (Fleas) के जरिए इंसानों में फैलता है. साइबेरिया का भूगोल और वहां की अत्यधिक ठंडी जलवायु रूस के लिए वैज्ञानिक प्रयोगों का मुख्य केंद्र क्यों बनती है, यह जनरल स्टडीज का अहम हिस्सा है.
यह घटना सिखाती है कि मॉडर्न साइंस इंसानों की जितनी जानें बचा रही है, उतना ही बड़ा खतरा ये लैब्स बनती जा रही हैं. सुरक्षा मानकों में जरा सी चूक पूरी दुनिया को नई महामारी की आग में झोंक सकती है.