7 या 8 अक्टूबर? गुरु प्रदोष की सही डेट पर ज्योतिषाचार्य ने दूर किया कन्फ्यूजन
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Pradosh Vrat Date: आश्विन माह के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि 7 अक्टूबर को रात में 11 बजकर 16 मिनट पर शुरू होगी. इस तिथि का समापन 8 अक्टूबर को रात में 10 बजकर 15 मिनट होगा. ऐसे में प्रदोष मुहूर्त के आधार पर अक्टूबर का पहला प्रदोष 8 अक्टूबर गुरुवार को रखा जाएगा.
Pradosh Vrat Date: हिंदू धर्म में प्रदोष व्रत को अत्यंत पवित्र और फलदायी माना जाता है. यह व्रत भगवान शिव और माता पार्वती को समर्पित होता है, जिसे श्रद्धा और विधि-विधान से करने पर भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं. मान्यता है कि इस दिन सच्चे मन से की गई पूजा से जीवन में सुख, समृद्धि और सफलता का मार्ग खुलता है. हर महीने त्रयोदशी तिथि को आने वाला प्रदोष व्रत दो बार किया जाता है. एक शुक्ल पक्ष में और दूसरा कृष्ण पक्ष में व्रती सुबह से लेकर संध्या काल तक उपवास रखते हैं और शाम के समय शिव परिवार की विशेष पूजा-अर्चना करते हैं. पूजा के बाद विधिवत पारण किया जाता है. ऐसे में इस बार जो आश्विन माह का प्रदोष आ रहा है, उसमें तिथि को लेकर असमंजस की स्थिति बन रही है. उज्जैन के ज्योतिषाचार्य आनंद भारद्वाज से जानते हैं प्रदोष व्रत की सही तिथि, शुभ मुहूर्त और महत्व.
वैदिक पंचांग के अनुसार, आश्विन माह के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि 7 अक्टूबर को रात में 11 बजकर 16 मिनट पर शुरू होगी. इस तिथि का समापन 8 अक्टूबर को रात में 10 बजकर 15 मिनट होगा. ऐसे में प्रदोष मुहूर्त के आधार पर अक्टूबर का पहला प्रदोष 8 अक्टूबर गुरुवार को रखा जाएगा और इस दिन गुरुवार होने से यह गुरु प्रदोष कहलाएगा.
गुरु प्रदोष व्रत करने के लाभ
त्रयोदशी तिथि भगवान शिव का सबसे प्रिय दिन है. इस दिन जो व्यक्ति पूरे विधि विधान से प्रदोष व्रत करता है. उसे शत्रुओं से कोई हानि नहीं होती है. व्यक्ति को अपने शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है. साथ ही भगवान विष्णु का आशीर्वाद भी मिलता है. जिन लोगों के विवाह में अड़चनें आ रही हों या फिर वैवाहिक जीवन में शांति चाहते हैं, तो उन्हें प्रदोष व्रत जरूर करना चाहिए.
जरूर करें इन नियमों का पालन
1. प्रदोष व्रत के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि के बाद सूर्यदेव को अर्घ्य देकर व्रत का संकल्प लें.
2. इसके बाद पूजा स्थल की अच्छे से सफाई करके भगवान शिव का पंचामृत से अभिषेक करें.
3. इसके बाद शिव परिवार का पूजन करें और भगवान शिव पर बेल पत्र, फूल, धूप, दीप आदि अर्पित करें. प्रदोष व्रत की कथा का पाठ करें.
4. शिव चालीसा का पाठ करें और पूजा के अंत में भगवान शिव की आरती करें. इसके बाद अपना उपवास खोलें.