Nepal Himalaya Lake Drain Mission : हिमालय के ‘टाइम बम’ का तार निकालेगा नेपाल, 415 करोड़ का ‘हाई-रिस्क’ मिशन, भारत को भी 3 फायदे

Nepal Himalaya Lake Drain Mission : हिमालय के ‘टाइम बम’ का तार निकालेगा नेपाल, 415 करोड़ का ‘हाई-रिस्क’ मिशन, भारत को भी 3 फायदे


नेपाल में अगस्त के महीने में आई कुदरती तबाही का दर्द दुनिया कभी नहीं भूल पाएगी. चीन सीमा से सटे हिमालयी इलाकों में ग्लेशियर टूटने से उठी सैलाब की खौफनाक लहरों और भीषण भूस्खलन ने कई हंसते-खेलते गांवों को देखते ही देखते नक्शे से मिटा दिया. इस दर्दनाक जलप्रलय में 1,400 से ज्यादा बेकसूर लोगों की जान चली गई और 5,000 से अधिक लोग अब भी लापता हैं. इस त्रासदी के बाद भी हिमालय में कई ‘टाइम बम’ फटने को तैयार हैं. इन्हीं बमों को डिफ्यूज करने के लिए नेपाल एक ‘हाई-रिस्क’ मिशन पर निकलने वाला है, जिसमें 415 करोड़ रुपए का तगड़ा बिल आने वाला है. इस मिशन से भारत को भी 3 फायदे होने वाले हैं.

18,000 फीट की ऊंचाई पर ‘मौत से मुकाबला’: नेपाल का रिस्की हिमायल मिशन

तकरीबन 415 करोड़ रुपये की लागत से नेपाल एक मिशन मेगा प्रोजेक्ट लॉन्च करने जा रहा है. जिसका मकसद 4 झीलों को फटने से रोकना है. अगर ये झीलें बिना किसी चेतावनी के फूटती हैं, तो नेपाल ही नहीं, बल्कि सीमा पार बसे भारत के मैदानी इलाकों तक में भारी तबाही मच सकती है.

जिन 4 बर्फीली झीलों का पानी सुरक्षित तरीके से निकालने की योजना तैयार की गई है, वो मध्य और पूर्वी नेपाल के दुर्गम इलाकों में स्थित हैं. इनके नाम हैं, ठुलागी, लोअर बारुण, लुमडिंग त्शो और होंगू II. ये झीलें समुद्र तल से 13,280 फीट से लेकर 18,000 फीट की जानलेवा ऊंचाई पर मौजूद हैं. 2020 में संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम और ICIMOD की रिपोर्ट ने इन झीलों को नेपाल के सिर पर मंडराता सबसे बड़ा खतरा करार दिया था.

  • हवा में ऑक्सीजन की भारी कमी: 18,000 फीट की ऊंचाई पर इंसानी फेफड़ों के लिए सांस लेना बिल्कुल आसान नहीं होता. वहां थोड़ी सी शारीरिक मेहनत करते ही तबीयत बिगड़ने का डर रहता है.
  • अचानक बाढ़ और भूस्खलन का साया: नेपाल के जल संसाधन अनुसंधान केंद्र के विशेषज्ञ सुभाष तुलाधर बताते हैं कि इस ऊंचाई पर काम करने वाले इंजीनियरों और मजदूरों को माइनस टेम्परेचर के साथ-साथ हर पल मंडराते एवलांच और फ्लैश फ्लड के बीच काम करना पड़ेगा.

415 करोड़ रुपए का ‘मास्टर प्लान’: कैसे खाली होगा अरबों लीटर पानी?

इस पूरे मिशन के लिए लगभग 415 करोड़ रुपए का बजट ‘ग्रीन क्लाइमेट फंड’, संयुक्त राष्ट्र और नेपाल सरकार मिलकर जुटा रहे हैं. तकनीकी रूप से इस मुश्किल काम को अंजाम देने के लिए एक खास रणनीति तैयार की गई है.

  • कंट्रोल्ड कैनाल और गेट सिस्टम: झीलों से वाटर लेवल नॉर्मल करने के लिए पानी निकाला जाएगी और इस पानी के सुरक्षित निकास करने के लिए पक्की रेगुलेटेड नहरें और गेट्स वाला ढांचा बनाया जाएगा. इसके जरिए धीरे-धीरे पानी को आसपास की मुख्य नदियों में मोड़ा जाएगा.
  • 10 फीट पानी घटाने का टारगेट: पर्यावरण विशेषज्ञों के अनुसार, अगर झीलों के जलस्तर को केवल 3 मीटर यानी 10 फीट तक घटा दिया जाए, तो पानी के भारी दबाव के कारण प्राकृतिक बांध टूटने का खतरा 70 से 80 फीसदी तक घट जाता है.
  • 6 साल की लंबी टाइमलाइन: सेंटर फॉर हाइड्रोलॉजी के एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर संजीब बराल के मुताबिक, पूरी भौगोलिक स्टडी के बाद ड्रेनेज का काम शुरू होगा, जिसे पूरा करने में लगभग 6 साल का समय लगेगा.
  • सेंसर व अर्ली वार्निंग नेटवर्क: झीलों पर हाई-टेक सेंसर लगाए जाएंगे, जो जलस्तर और पानी के दबाव की 24 घंटे ट्रैकिंग करेंगे. किसी भी आपात स्थिति के लिए निचले इलाकों में अर्ली वार्निंग सिस्टम (EWS) एक्टिव किया जाएगा.

भारत को होंगे ये 3 फायदे

  1. बिहार और यूपी में अचानक आने वाली बाढ़ टलेगी : नेपाल की ये बर्फीली झीलें जिन नदियों के कैचमेंट एरिया में आती हैं, उनका पानी आगे चलकर भारत में बहने वाली कोशी और गंडक जैसी बड़ी नदियों में मिलता है. अगर 18,000 फीट की ऊंचाई पर ये कुदरती बांध टूटता, तो इसका सीधा असर बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के सीमावर्ती जिलों पर पड़ता. झीलों का जलस्तर 10 फीट कम होने से भारत के सिर पर मंडराती तबाही की तलवार हमेशा के लिए हट जाएगी.
  2. नेपाल के साथ ‘अर्ली वार्निंग सिस्टम’ का रियल-टाइम डेटा शेयरिंग : प्रोजेक्ट के तहत झीलों पर जो हाई-टेक सेंसर और अर्ली वार्निंग नेटवर्क बिछाया जा रहा है, उसका सीधा फायदा भारत को भी मिलेगा. झीलों में पानी की हलचल का रियल-टाइम डेटा भारतीय मौसम विभाग और जल आयोग के साथ साझा किया जाएगा. इससे अगर कभी कोई आपात स्थिति बनती भी है तो भारत को निचले इलाकों को समय रहते खाली कराने के लिए पर्याप्त समय मिल जाएगा.
  3. भारत-नेपाल सीमा पर स्थित अरबों के इंफ्रास्ट्रक्चर की सुरक्षा : कोशी और गंडक नदियों पर भारत और नेपाल के सीमावर्ती इलाकों में कई बड़े बैराज, हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट्स, पुल और सड़कें बनी हुई हैं. अचानक आने वाली बाढ़ इन बहुमूल्य संपत्तियों को पलक झपकते ही तबाह कर सकती थी. नेपाल के इस मिशन से भारत के अरबों रुपए के बॉर्डर इंफ्रास्ट्रक्चर को सुरक्षा कवच मिल जाएगा.

नेपाल के पास पुराना अनुभव: त्शो रोल्पा और इम्जा लेक का इतिहास

विशालकाय बर्फीली झीलों का पानी सुरक्षित तरीके से कम करना भले ही कितना भी कठिन काम क्यों न हो, लेकिन नेपाल पहले भी दो बार ये कारनामा सफलतापूर्वक कर चुका है:

  • त्शो रोल्पा : साल 2000 में नेपाल ने मध्य हिमालय में स्थित त्शो रोल्पा झील का पानी सफलतापूर्वक 3 मीटर नीचे किया था.
  • इम्जा लेक : माउंट एवरेस्ट के पास स्थित इम्जा झील में भी लगभग 10 साल पहले इसी तकनीक से जलस्तर कम करके निचले इलाकों को सुरक्षित किया गया था.

ग्लोबल वार्मिंग का ‘टाइम बम’ और नेपाल की लड़ाई

वैज्ञानिकों का मानना है कि ग्लोबल वार्मिंग के कारण हिमालय के विशाल ग्लेशियर बेहद तेजी से पिघल रहे हैं. पिघलते पानी से बनी इन झीलों के किनारे कोई कंक्रीट की मजबूत दीवार नहीं होती, बल्कि ये सिर्फ ढीली मिट्टी, पत्थरों और बर्फ के कुदरती मलबे के सहारे टिकी होती हैं.

ये एक ऐसा ‘टाइम बम’ है जो हल्का सा भूकंप आने, हिमस्खलन होने या भारी बारिश होने पर किसी भी वक्त फट सकता है. नेपाल का ये 415 करोड़ रुपए का मिशन सिर्फ एक इंजीनियरिंग प्रोजेक्ट नहीं है, बल्कि ये हिमालय में टिक-टिक कर रहे एक बड़े कुदरती खतरे को खत्म करने की कोशिश है.



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