जिन पत्तियों को पशु भी नहीं खाते, उन्हीं से बनता है ऐसे ब्रह्मास्त्र
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Homemade Brahmastra: युवा किसान लक्ष्मीकांत प्रधान जैविक खेती में कम लागत वाले ‘ब्रह्मास्त्र’ का इस्तेमाल करते हैं. बेल, नीम, करंज, सीताफल, अरंडी व आक जैसी 5-10 पत्तियों को 10 लीटर गौमूत्र में उबालकर इसे तैयार किया जाता है. किसान के अनुसार, प्रिवेंटिव उपयोग से तना छेदक, माहू, माइट्स और कुछ रोगों से बचाव में मदद मिलती है. प्रति एकड़ 1-1.5 लीटर उपयोग किया जाता है.
Homemade Brahmastra: जैविक खेती में किसान रासायनिक दवाओं का विकल्प तलाश रहे हैं. ऐसे में प्राकृतिक संसाधनों से तैयार किया जाने वाला ‘ब्रह्मास्त्र’ कम लागत वाला उपाय माना जा रहा है. छत्तीसगढ़ के मिलाराबद गांव के युवा किसान लक्ष्मीकांत प्रधान के अनुसार, ब्रह्मास्त्र का इस्तेमाल मुख्य रूप से प्रिवेंटिव यानी फसल में कीट और रोगों के प्रकोप से पहले बचाव के लिए किया जाता है. वे अपनी जैविक खेती में इसका 2 से 3 बार इस्तेमाल करते हैं.
लक्ष्मीकांत प्रधान ने बताया कि ब्रह्मास्त्र का नियमित रूप से प्रिवेंटिव के तौर पर उपयोग करने से तना छेदक, नेक ब्लास्ट, शीथ ब्लाइट, माहू और माइट्स जैसे कीट एवं रोगों से फसल के बचाव में मदद मिल सकती है. इसकी क्षमता बढ़ाने के लिए इसमें वाटर-सॉल्युबल नीम तेल भी मिलाया जाता है. उनके अनुसार, इससे खेत में बेहतर परिणाम देखने को मिलते हैं.
ब्रह्मास्त्र तैयार करने के लिए ऐसी 5 से 10 प्रकार की पत्तियों का इस्तेमाल किया जाता है, जिन्हें सामान्य तौर पर गाय, बकरी या अन्य पशु नहीं खाते. इसमें बेल पत्ता, नीम पत्ता, करंज पत्ता, सीताफल पत्ता, अरंडी पत्ता और आक का पत्ता शामिल किया जा सकता है. इनमें नीम की पत्तियों की मात्रा अधिक रखी जाती है.
ऐसे तैयार करें ब्रह्मास्त्र
सबसे पहले सभी ताजी पत्तियों को अच्छी तरह कूट लें या छोटे-छोटे टुकड़ों में काट लें. इसके बाद इन्हें मिट्टी के बर्तन में डालकर करीब 10 लीटर गौमूत्र के साथ गर्म किया जाता है. मिश्रण में लगभग चार उबाल आने के बाद इसे ठंडा होने के लिए छोड़ दिया जाता है. ठंडा होने के बाद मिश्रण को अच्छी तरह छानकर उपयोग किया जा सकता है.
किसान लक्ष्मीकांत प्रधान के अनुसार, एक स्प्रे टैंक में करीब 100 मिलीलीटर ब्रह्मास्त्र पर्याप्त रहता है. वहीं, प्रति एकड़ लगभग 1 से 1.5 लीटर ब्रह्मास्त्र का इस्तेमाल किया जा सकता है. इसे तैयार करने में लागत भी काफी कम आती है और सामग्री आसानी से उपलब्ध हो जाती है.