पश्चिम एशिया में जंग की वजह से पूरी दुनिया पर ईंधन का भयंकर संकट मंडरा रहा है. होर्मुज जलडमरूमध्य की नाकेबंदी और क्रूड ऑयल की सप्लाई ठप होने से पेट्रोल-डीजल के दाम आसमान छू रहे हैं. लेकिन इस ग्लोबल हाहाकार के बीच भारत समेत कई देशों के लिए एक राहत भरी खबर सामने आई है. दुनिया की सात देशों ने मिलकर अपने तेल भंडार खोल दिए हैं. ये वो सात देश हैं जिनके पास सबसे बड़े ऑयल रिजर्व मौजूद हैं. इन देशों ने 100 मिलियन बैरल कच्चा तेल अंतरराष्ट्रीय बाजार में जारी करने का बड़ा फैसला आखिरकार कर लिया है.
100 मिलियन बैरल तेल रिलीज: क्या है G7 का पूरा मास्टरप्लान?
फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों की अगुवाई में हुई G7 बैठक में इस बात पर मुहर लगी कि 100 मिलियन बैरल क्रूड ऑयल और डीजल को चरणबद्ध तरीके से बाजार में उतारा जाएगा.
इस पूरे ऑपरेशन को इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी (IEA) के जरिए अगले 4 महीनों में अंजाम दिया जाएगा. सबसे खास बात ये है कि शुरुआत के पहले 20 दिनों के भीतर ही एक भारी-भरकम ‘डीजल रिलीज’ किया जाएगा. इसका मकसद ये है कि जंग के कारण अचानक से थमे हुए ट्रांसपोर्ट, सप्लाई चेन और लॉजिस्टिक्स को तुरंत पटरी पर लाया जा सके.
भारत तक कैसे पहुंचेगा ये ‘तेल का खजाना’?
- ग्लोबल ऑयल पूल और कीमतों में गिरावट: अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार एक ही बड़े स्विमिंग पूल की तरह काम करता है. जब बाजार में अचानक 10 करोड़ बैरल की अतिरिक्त सप्लाई आएगी, तो तेल की किल्लत दूर होगी और कच्चे तेल के दाम नीचे गिरेंगे. भारत अपनी जरूरत का 85% से ज्यादा कच्चा तेल इंपोर्ट करता है. दाम कम होते ही भारत का आयात बिल घट जाएगा.
- सप्लाई में मिली बड़ी छूट: यूरोपीय देश अपने रिजर्व का इस्तेमाल करेंगे, जिससे वो पश्चिम एशिया के तेल पर अपनी निर्भरता घटाएंगे. इससे जो तेल टैंकर और शिपिंग रूट फ्री होंगे, वो भारत और एशियाई देशों के लिए आसानी से उपलब्ध हो सकेंगे.
- घरेलू पेट्रोल-डीजल के दाम पर असर: भारत में सरकारी तेल कंपनियां वैश्विक दरों के हिसाब से ही ईंधन के दाम तय करती हैं. G7 के इस कदम से कच्चे तेल की कीमतें स्थिर होंगी, जिसका सीधा फायदा भारतीय आम जनता को महंगे पेट्रोल-डीजल से राहत के रूप में मिलेगा.
ट्रंप का दावा और ‘डीजल बैन’ की खौफनाक धमकी
इस ऐतिहासिक फैसले के तुरंत बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘ट्रुथ सोशल’ पर जीत का ढिंढोरा पीटा. ट्रंप ने लिखा कि उनके भारी दबाव के बाद आखिरकार यूरोप अपने विशाल डीजल रिजर्व को खोलने के लिए राजी हो गया है.
दरअसल, इस समझौते के पीछे पर्दे के पीछे की एक बहुत बड़ी धमकी छिपी हुई थी. ट्रंप पिछले कई दिनों से जर्मनी और फ्रांस जैसे यूरोपीय देशों पर अपना इमरजेंसी स्टॉक इस्तेमाल करने की जिद कर रहे थे. जब यूरोपीय देशों ने इसका विरोध किया, तो ट्रंप ने धमकी दे डाली कि अमेरिका यूरोप को किए जाने वाले अपने डीजल एक्सपोर्ट पर पूरी तरह से बैन लगा देगा. यूरोप डीजल आयात पर बुरी तरह निर्भर है, लिहाजा अमेरिका की इस धमकी के बाद यूरोपीय संघ (EU) नरम पड़ा और G7 के मंच पर 10 करोड़ बैरल तेल रिलीज करने की सहमति बन गई.
अमेरिका में चुनाव की टेंशन और रिकॉर्ड महंगाई
डोनाल्ड ट्रंप की इस रणनीति के पीछे उनके देश के अंदर की सियासत भी एक बड़ी वजह है. नवंबर में अमेरिका में मिडटर्म चुनाव होने वाले हैं. युद्ध के कारण अमेरिका के भीतर डीजल की औसत कीमतें 6.37 डॉलर से लेकर 6.52 डॉलर प्रति गैलन के रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच गई हैं.
महंगाई से वहां की जनता बुरी तरह त्रस्त है और ट्रंप की अप्रूवल रेटिंग लगातार गिर रही है. अमेरिका में खेती-किसानी, कंस्ट्रक्शन और गुड्स ट्रांसपोर्ट पूरी तरह डीजल पर निर्भर है. 11 सितंबर 2026 तक अमेरिका का अपना डीजल स्टॉक घटकर महज 10.79 करोड़ बैरल के निचले स्तर पर आ गया था. यही कारण है कि ट्रंप किसी भी कीमत पर दुनिया भर के रिजर्व को खुलवाकर बाजार में ईंधन की भरमार करना चाहते हैं.
क्या 100 मिलियन बैरल से टल जाएगा संकट?
यूरोपीय संघ के आंकड़ों की मानें तो उनके पास करीब 3.8 करोड़ टन का इमरजेंसी ऑयल रिजर्व पड़ा हुआ है. यूरोपीय नियमों के तहत हर देश को कम से कम 90 दिनों का बैकअप रखना होता है, इसी वजह से वो इसे छूने से डर रहे थे कि कहीं ईरान युद्ध लंबा न खिंच जाए.
हालांकि, इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी (IEA) के जरिए बाजार में आ रहा ये 100 मिलियन बैरल का स्टॉक संकट के समय में एक ‘लाइफ-सेविंग ड्रग’ की तरह काम करेगा. मार्च में भी IEA ने 400 मिलियन बैरल रिलीज करने का ऐलान किया था. अब अतिरिक्त 10 करोड़ बैरल आने से कम से कम अगले तीन-चार महीनों के लिए ग्लोबल एनर्जी मार्केट को बड़ी सांस मिलेगी और भारत जैसे उभरते बाजारों को महंगे ईंधन के तगड़े झटके से सुरक्षा कवच मिल जाएगा.