मिडिल ईस्ट में जारी तनाव का असर अब सिर्फ तेल बाजार तक सीमित नहीं है, बल्कि दुनिया भर की सरकारों के बजट पर भी इसका दबाव बढ़ रहा है. कच्चे तेल की कीमतें करीब 100 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंचने के बीच कई देश पेट्रोल-डीजल और दूसरी जरूरी चीजों की कीमतों को काबू में रखने के लिए सब्सिडी, टैक्स में राहत और कीमतों पर सीमा जैसे कदम उठा रहे हैं. लेकिन लंबे समय तक ऐसा करना सरकारों के लिए आसान नहीं होगा. संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) की रिपोर्ट के मुताबिक, इस साल दुनिया में फ्यूल सब्सिडी पर होने वाला खर्च 1 ट्रिलियन डॉलर यानी करीब 9,61,03,02,24,00,000 रुपये तक जा सकता है.
रिपोर्ट के मुताबिक, अप्रैल से सितंबर के बीच महंगे फ्यूल और खाने-पीने की चीजों से लोगों को राहत देने वाले तरीके अपनाने वाले देशों की संख्या करीब दोगुनी हो गई. इन सरकारी कदमों का सीधा फायदा आम लोगों को मिला है. अनुमान है कि इस साल करीब 13 करोड़ लोग गरीबी रेखा से नीचे जाने से बच सके. लेकिन अब सरकारों के सामने दूसरी चुनौती खड़ी हो रही है.
महंगा तेल सरकारों की बढ़ा रहा परेशानी
पश्चिम एशिया का तनाव लंबा खिंचने से ऊर्जा बाजार पर दबाव बना हुआ है. तेल की कीमतों में बढ़ोतरी का असर पेट्रोल, डीजल, गैस और परिवहन लागत पर पड़ता है. इसका असर आगे चलकर खाने-पीने और रोजमर्रा की दूसरी चीजों की कीमतों पर भी दिखाई दे सकता है. इसी वजह से कई सरकारें लोगों पर तुरंत पड़ने वाले बोझ को कम करने के लिए अलग-अलग तरीके अपना रही हैं. कहीं फ्यूल पर सब्सिडी दी जा रही है, तो कहीं कीमतों की अधिकतम सीमा तय की गई है. कुछ देशों ने टैक्स में भी राहत दी है. लेकिन तेल महंगा रहने पर इन उपायों का खर्च लगातार बढ़ता जाएगा.
सरकारों के बजट पर बढ़ रहा दबाव
समस्या सिर्फ तेल की कीमतों तक सीमित नहीं है. दुनिया के कई देशों में कर्ज लेना पहले के मुकाबले महंगा हो गया है. ऐसे में सरकारों के लिए अतिरिक्त पैसा जुटाना मुश्किल हो रहा है. एक तरफ लोगों को महंगाई से बचाने की जरूरत है और दूसरी तरफ सरकारी खजाने पर बोझ बढ़ रहा है. UNDP के मुताबिक, जियो-पॉलिटिकल टेंशन, महंगी फाइनेंसिंग और मौसम से जुड़े झटकों का संयुक्त असर 2027 की शुरुआत में सबसे ज्यादा दिखाई दे सकता है. यानी आने वाले महीनों में सरकारों के लिए यह चुनौती और बढ़ सकती है.
अल नीनो से खाने-पीने की चीजें हो सकती हैं महंगी
एनर्जी संकट के साथ मौसम भी चिंता बढ़ा रहा है. इस समय मजबूत अल नीनो की स्थिति बन रही है. इससे कई इलाकों में सामान्य से ज्यादा गर्मी, सूखा या बाढ़ जैसी स्थिति पैदा हो सकती है. इसका सीधा असर खेती और खाद्य के प्रोडक्शन पर पड़ सकता है.
अगर फसल प्रभावित होती है तो अनाज और दूसरी खाद्य वस्तुओं की सप्लाई पर दबाव बढ़ सकता है. इससे पहले से महंगाई झेल रहे परिवारों का खर्च और बढ़ने का खतरा रहेगा. UNDP ने भी चेताया है कि अल नीनो का असर 2027 तक खाद्य सुरक्षा की समस्या को और गंभीर कर सकता है.
आम लोगों पर असर
महंगे ईंधन का असर सिर्फ पेट्रोल पंप तक नहीं रहता. ट्रक, बस और दूसरे वाहनों का खर्च बढ़ने पर सामान को एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाना महंगा हो जाता है. इसका असर सब्जियों, अनाज और रोजमर्रा की दूसरी चीजों की कीमतों पर पड़ सकता है. भारत जैसे तेल आयात करने वाले देशों के लिए भी लंबे समय तक महंगा कच्चा तेल चुनौती बन सकता है. सरकारें कीमतों पर राहत देने के अलग तरीके भी निकाल सकती है, लेकिन इसका असर सरकारी वित्त पर पड़ सकता है. UNDP के मुताबिक, सितंबर में कम से कम 10 देशों में महंगी एनर्जी से जुड़ी सामाजिक अशांति और परफॉर्मेंस भी देखने को मिले. रिपोर्ट का कहना है कि आने वाले कुछ हफ्ते और महीने काफी अहम होंगे, क्योंकि मौजूदा संकट से निकलने का रास्ता अभी साफ नजर नहीं आ रहा है.