पितरों को प्रसन्न करने के मंत्र! मिलेगा आशीर्वाद, पितृ दोष से भी छुटकारा!

पितरों को प्रसन्न करने के मंत्र! मिलेगा आशीर्वाद, पितृ दोष से भी छुटकारा!


उज्जैन. हिंदू परंपरा में पितृपक्ष को पूर्वजों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने का विशेष अवसर माना जाता है. वैदिक पंचांग के अनुसार, इसकी शुरुआत भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा से होती है और आश्विन अमावस्या के साथ यह अवधि संपन्न होती है. इन 16 दिनों में लोग अपने दिवंगत पूर्वजों का स्मरण करते हुए विधि-विधान से श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान करते हैं. मान्यता है कि इन धार्मिक कर्मों के माध्यम से पितरों के प्रति सम्मान प्रकट किया जाता है और उनका आशीर्वाद प्राप्त होता है.

मान्यता है कि पितृपक्ष के दौरान पितृ धरती पर आते हैं. यदि ऐसे में कोई चूक हो जाए, तो पितृ नाराज भी हो जाते हैं. यदि पितृ नाराज हो जाएं, तो जीवन में उथल-पुथल मचा सकते हैं. खुशहाल जीवन के लिए पितरों का खुश होना जरूरी है. अगर पितृ पक्ष में कोई जातक पिंडदान और तर्पण नहीं कर पाए, तो इसके लिए निराश होने की जरूरत नहीं है. शास्त्रों में इसके लिए भी उपाय बताया गया है. उज्जैन के आचार्य आनंद भारद्वाज के अनुसार, पितरों को प्रसन्न करना चाहते हैं, तो कुछ चमत्कारी मंत्र का जरूर जाप करना चाहिए.

पितृपक्ष का महत्व
पितृपक्ष में लोग अपने पूर्वजों की आत्मिक शांति के लिए श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान जैसे धार्मिक कर्म करते हैं. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इन अनुष्ठानों से पितरों का आशीर्वाद प्राप्त होता है और पितृ दोष से मुक्ति मिलने की संभावना रहती है. कहा जाता है कि पितृपक्ष में पूर्वज अपने वंशजों के करीब आते हैं. इस दौरान श्रद्धापूर्वक किए गए कर्मों से परिवार में सुख, शांति और समृद्धि बनी रहती है.

पितरों को प्रसन्न करने के मंत्र
– ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् ।
उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् ॥

– ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय च धीमहि तन्नो रुद्र: प्रचोदयात।

– ॐ पितृ देवतायै नम:।

– ॐ पितृगणाय विद्महे जगत धारिणी धीमहि तन्नो पितृो प्रचोदयात्।

– ॐ देवताभ्य: पितृभ्यश्च महायोगिभ्य एव च
नम: स्वाहायै स्वधायै नित्यमेव नमो नम:

– ॐ देवताभ्य: पितृभ्यश्च महायोगिभ्य एव च। नम: स्वाहायै स्वधायै नित्यमेव नमो नम:।

– ॐ पितृगणाय विद्महे जगत धारिणी धीमहि तन्नो पितृो प्रचोदयात्।

–ॐ आद्य-भूताय विद्महे सर्व-सेव्याय धीमहि। शिव-शक्ति-स्वरूपेण पितृ-देव प्रचोदयात्।



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