खुद पर आफत तो भीख मांगने लगा US, फ्रांस-जर्मनी के खजाने पर ट्रंप की बुरी नजर!
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ईरान युद्ध से अमेरिका में महंगाई सातवें आसमान पर है. पेट्रोल-डीजल के दाम काफी बढ़ गए हैं. इस बीच मिड टर्म चुनाव की सरगर्मियां भी चरम पर है. महंगाई रोकने के लिए ट्रंप प्रशासन ने फ्रांस-जर्मनी से 120 मिलियन बैरल डीजल बाजार में जारी करने को कहा है. अगर वे ऐसा नहीं करते हैं तो निर्यात रोकने की धमकी दी है. ऐसे में सवाल यह है कि सबसे बड़ा डीजल निर्यातक अमेरिका क्यों अपनी की जाल में बुरी तरह उलझता दिख रहा है.
अमेरिका ने जर्मनी और फ्रांस रिजर्व डीजल जारी करने को कहा है. ऐसा नहीं करने पर बैन लगाने की धमकी दी है. फोटो- रायटर
ईरान के साथ जंग की कीमत अमेरिका भी चुका रहा है. जो लोग यह सोचते हैं कि इस जंग में केवल ईरान को नुकसान उठाना पड़ा है उनको अमेरिका में महंगाई की ताजा स्थिति से अवगत होना चाहिए. अमेरिका में इस वक्त पेट्रोल-डीजल के दाम आसमान पर हैं. अब सर्दियां शुरू होने वाली है. ऐसे में वहां ऊर्जा की डिमांड और बढ़ेगी. इस बीच पश्चिम एशिया संकट सुलझने के बजाय और उलझता हुआ दिख रहा है. हूतियों के हमले के बाद सऊदी अरब के तेल निर्यात पर बुरा असर पड़ा है. सऊदी अरब कच्चे तेल का सबसे बड़ा निर्यातक देश है. ऐसे में इस वक्त अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत 100 डॉलर प्रति बैरल के आसपास बना हुआ है. इस कारण अमेरिका में खुदरा बाजार में भी पेट्रोल-डीजल के दाम करीब 40-50 फीसदी तक बढ़ चुके हैं. दूसरी तरह अमेरिका में मिड टर्म इलेक्शन होने जा रहा है. ऐसे में डोनाल्ड ट्रंप की लोकप्रियता बुरी तरह प्रभावित हुई है. यानी डोनाल्ड ट्रंप के शासन में अमेरिका एक ऐसी आफत का सामना कर रहा है जिसका जनक वह खुद है. ऐसे में डोनाल्ड ट्रंप बौखलाए हुए हैं. उन्होंने इस संकट से उबरने के लिए अपने करीबी यूरोपीय देशों के खजाने पर बुरी नजर डालना शुरू कर दिया है. उन्होंने अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल कीमतों को नियंत्रित करने के लिए फ्रांस और जर्मनी से अपने रिजर्व डीजल बाजार में जारी करने को कहा है.
अमेरिका ने फ्रांस-जर्मनी को क्या कहा?
न्यूज एजेंसी रॉयटर्स की एक्सक्लूसिव रिपोर्ट के मुताबिक ट्रंप प्रशासन ने फ्रांस और जर्मनी से अपने आपातकालीन डीजल भंडार का एक हिस्सा बाजार में रिलीज करने को कहा है. मकसद वैश्विक स्तर पर ईंधन की बढ़ती कीमतों को कम करना है. लेकिन इस अपील के साथ अमेरिका ने दबाव भी बढ़ा दिया है. रॉयटर्स के मुताबिक अमेरिका ने संकेत दिया है कि अगर यूरोपीय देश सहयोग नहीं करते हैं तो अमेरिका उनके लिए डीजल निर्यात पर रोक लगाने जैसे कदम पर विचार कर सकता है. यानी अमेरिका खुद अपने डीजल निर्यात को सीमित करने की धमकी देकर यूरोप से उसके रणनीतिक भंडार खोलने को कह रहा है.
120 मिलियन बैरल डीजल की मांग
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा आंकड़ा 12 करोड़ बैरल का है. रॉयटर्स के एक यूरोपीय सूत्र के मुताबिक अमेरिका ने यूरोपीय संघ से अगले छह महीने में करीब 120 मिलियन बैरल डीजल बाजार में उपलब्ध कराने को कहा है. यह कोई मामूली मात्रा नहीं है. रॉयटर्स की दूसरी रिपोर्ट के मुताबिक यह यूरोपीय संघ के आपातकालीन डीजल और गैसोइल भंडार का 40 फीसदी से ज्यादा हिस्सा बैठता है. जर्मनी और फ्रांस के पास यूरोपीय आपातकालीन भंडार का बड़ा हिस्सा मौजूद है. दोनों देशों के पास क्रमशः करीब 56 लाख टन और 82 लाख टन का भंडार बताया गया है. यानी अमेरिका जिस संकट से अपने लोगों को बचाना चाहता है, उसके लिए वह यूरोप के रणनीतिक ईंधन भंडार को इस्तेमाल करने का रास्ता तलाश रहा है.
अमेरिका में डीजल की कीमत रिकॉर्ड पर क्यों?
अमेरिका की परेशानी सिर्फ राजनीतिक नहीं है. वहां डीजल की कीमत सचमुच बहुत ऊपर पहुंच चुकी है. अमेरिकी ऊर्जा सूचना प्रशासन यानी EIA के मुताबिक 28 सितंबर को खत्म हुए सप्ताह में अमेरिका में औसत खुदरा डीजल कीमत 6.382 डॉलर प्रति गैलन थी. इससे पहले 21 सितंबर को यह 6.529 डॉलर प्रति गैलन तक पहुंच गई थी. सितंबर में यह कीमत रिकॉर्ड स्तर के आसपास रही. EIA ने बताया है कि वैश्विक स्तर पर डीजल की आपूर्ति तंग होने के कारण अमेरिकी कीमतों पर दबाव बढ़ा है. रूस, चीन और पश्चिम एशिया में रिफाइनिंग और आपूर्ति में आई बाधाओं ने अंतरराष्ट्रीय बाजार को प्रभावित किया है. इसका असर अमेरिका के अपने भंडार पर भी पड़ा है.
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