Indian Students in Australia 2026, Abroad Study: ऑस्ट्रेलिया में पढ़ना हुआ महंगा, हॉस्टल फीस से वीजा तक बदले नियम

Indian Students in Australia 2026, Abroad Study: ऑस्ट्रेलिया में पढ़ना हुआ महंगा, हॉस्टल फीस से वीजा तक बदले नियम


Indian Students Australia Jobs: कई सालों से ऑस्ट्रेलिया भारतीय छात्रों के लिए विदेश में बेहतर पढ़ाई और सुरक्षित भविष्य का एक बड़ा विकल्प रहा है.सपना भी काफी सीधा था-अच्छी यूनिवर्सिटी में दाखिला लो, पढ़ाई के साथ पार्ट टाइम काम करो, ऑस्ट्रेलिया में काम का अनुभव हासिल करो और अगर मौका मिले तो उसी अनुभव के आधार पर करियर आगे बढ़ाओ लेकिन अब यह रास्ता पहले जैसा आसान नहीं रह गया है.अमेरिका, ब्रिटेन और कनाडा की तरह ऑस्ट्रेलिया ने भी अंतरराष्ट्रीय छात्रों को लेकर अपने नियम सख्त किए हैं.

वीजा नियमों और माइग्रेशन के रास्तों में बदलाव के कारण पढ़ाई से नौकरी और फिर ऑस्ट्रेलिया में आगे रहने का रास्ता अब पहले के मुकाबले ज्यादा जटिल हो गया है.नए नियमों का एक उद्देश्य यह भी है कि छात्र सिर्फ ऑस्ट्रेलिया में अपना ठहराव बढ़ाने के लिए एक कोर्स से दूसरे कोर्स में लगातार बदलाव न करते रहें.इसका असर उन भारतीय छात्रों पर भी पड़ रहा है जो पढ़ाई के साथ अपने रोजमर्रा के खर्च निकालने के लिए नौकरी पर निर्भर रहते हैं.मेलबर्न पहुंची दिल्ली की 23 साल की शाइनी (नाम बदला हुआ है) की कहानी इसी बदलती स्थिति की एक झलक देती है.

दिल्ली यूनिवर्सिटी से पढ़ाई के बाद मेलबर्न पहुंचीं शाइनी

इंडियन एक्‍सप्रेस में छपी रिपोर्ट के मुताबिक नई दिल्ली की रहने वाली 23 वर्षीय शाइनी कुछ महीने पहले ही मेलबर्न पहुंची हैं.उन्होंने दिल्ली यूनिवर्सिटी से लिबरल आर्ट्स की पढ़ाई की और इसके बाद सोशल साइंसेज की पढ़ाई के लिए ऑस्ट्रेलिया आईं लेकिन यहां पहुंचने के बाद उन्हें लगा कि मेलबर्न में रहना उम्मीद से काफी ज्यादा महंगा है.पढ़ाई के साथ कमाई करना अब उनकी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुका है.शाइनी के मुताबिक लोग ऑस्ट्रेलिया में आरामदायक जिंदगी की उम्मीद लेकर आते हैं, लेकिन यहां खुद बहुत ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है.उन्होंने बताया कि जिन गिग-वर्कर नौकरियों को कुछ साल पहले हासिल करना अपेक्षाकृत आसान था उनके लिए अब छात्रों को काफी संघर्ष करना पड़ता है.आर्थिक परिस्थितियों को देखते हुए इन नौकरियों में प्रतिस्पर्धा काफी बढ़ गई है.

ऑस्ट्रेलिया में भारतीय छात्र बड़ी संख्या में

ऑस्ट्रेलिया में भारतीय छात्र आज भी अंतरराष्ट्रीय छात्रों के सबसे बड़े समूहों में शामिल हैं.जून 2026 तक के साल के आंकड़ों के मुताबिक ऑस्ट्रेलिया में पढ़ने वाले अंतरराष्ट्रीय छात्रों में भारत की हिस्सेदारी 16 फीसदी थी.भारत इस मामले में चीन के बाद दूसरे नंबर पर था जबकि चीन की हिस्सेदारी 23 फीसदी थी.इस अवधि में कुल 6,87,810 अंतरराष्ट्रीय छात्रों ने ऑस्ट्रेलिया में पढ़ाई की हालांकि यह संख्या 2025 की इसी अवधि के मुकाबले 7 फीसदी कम थी यानी भारतीय छात्रों की मौजूदगी ऑस्ट्रेलिया में अभी भी काफी बड़ी है लेकिन कुल अंतरराष्ट्रीय छात्र संख्या में कमी आई है और छात्रों के लिए पढ़ाई के साथ काम तथा भविष्य की योजना बनाना पहले के मुकाबले आसान नहीं रह गया है.

करीब ₹1,760 प्रति घंटे की न्यूनतम मजदूरी

ऑस्ट्रेलिया में 1 जुलाई 2026 से राष्ट्रीय न्यूनतम मजदूरी A$26.44 प्रति घंटे है. भारतीय रुपये में देखें तो यह करीब ₹1,760 प्रति घंटे बैठती है यानी अगर सिर्फ प्रति घंटे मिलने वाली मजदूरी को देखें तो यह रकम काफी अच्छी लग सकती है हालांकि मेलबर्न जैसे महंगे शहर में रहने वाले अंतरराष्ट्रीय छात्रों के लिए इतनी कमाई के बावजूद आर्थिक दबाव कम नहीं होता.सामान्य स्टूडेंट वीजा पर पढ़ाई के दौरान अंतरराष्ट्रीय छात्र आम तौर पर एक पखवाड़े में अधिकतम 48 घंटे काम कर सकते हैं.वहीं आधिकारिक कोर्स ब्रेक के दौरान काम के घंटों पर यह सीमा नहीं रहती और छात्र अनलिमिटेड घंटे काम कर सकते हैं.शाइनी बताती हैं कि महीने में करीब A$1,000 यानी लगभग ₹66,600 का आवास खर्च अच्छा माना जाता है लेकिन वह खुद इससे ज्यादा किराया देती हैं और उनका कहना है कि उन्होंने किसी तरह शहर के अंदर रहने की जगह हासिल की है.उनकी एक दोस्त एक छोटे से अपार्टमेंट में रहती हैं जहां ब्लैक मोल्ड की समस्या है. इसके बावजूद वह वहां रहना पसंद करती हैं क्योंकि उसका कैंपस पास है यानी ऑस्ट्रेलिया में न्यूनतम मजदूरी भारतीय रुपये में करीब ₹1,760 प्रति घंटे होने के बावजूद छात्रों के लिए असली चुनौती पर्याप्त काम के घंटे मिलना और उस कमाई से किराया व रोजमर्रा के दूसरे खर्च पूरे करना है.

माता-पिता से पैसे मांगने की मजबूरी

कुछ देशों में अंतरराष्ट्रीय छात्रों के लिए आर्थिक मदद के अलग-अलग विकल्प मौजूद होते हैं लेकिन ऑस्ट्रेलिया में ऐसे अवसर सीमित हैं.ऐसे में कई छात्रों के पास अपने खर्च पूरे करने के लिए माता-पिता से पैसे मांगने के अलावा दूसरा रास्ता नहीं बचता.शाइनी के मुताबिक खर्च कम करने का कोई आसान शॉर्टकट नहीं है.पढ़ाई, किराया, खाने-पीने और दूसरी जरूरतों को पूरा करने के लिए छात्रों को अपनी कमाई और परिवार से मिलने वाली आर्थिक मदद के बीच संतुलन बनाना पड़ता है.

300 जॉब्‍स के लिए आवेदन, सिर्फ 2-3 जगह से आया जवाब

सबसे बड़ी परेशानी सिर्फ किराया नहीं है.छात्रों के लिए पर्याप्त पार्ट टाइम काम ढूंढना भी चुनौती बनता जा रहा है.शाइनी बताती हैं कि उन्होंने करीब 300 नौकरियों के लिए आवेदन किया लेकिन सिर्फ दो या तीन जगह से उन्हें जवाब मिला.उन्होंने नौकरी पाने के लिए कंपनियों को सीधे ईमेल भी किए, लेकिन इसका भी कोई खास फायदा नहीं हुआ.वह बताती हैं कि कई अंतरराष्ट्रीय छात्र खुद दुकानों में जाकर रिज्यूमे बांटते हैं.रिटेल की नौकरी तलाशते हुए उन्होंने एक समय करीब 50 रिज्यूमे तक बांटे यानी ऑस्ट्रेलिया में न्यूनतम मजदूरी भले ही अपेक्षाकृत ज्यादा हो लेकिन छात्रों के लिए असली चुनौती यह है कि वीजा की तय सीमा के भीतर उन्हें पर्याप्त काम के घंटे मिलें.अगर काम ही नहीं मिलेगा तो प्रति घंटे मिलने वाली मजदूरी भी उनके बढ़ते खर्च को संभालने में ज्यादा मदद नहीं कर पाएगी.

पढ़ाई के बाद ऑस्ट्रेलिया में रुकना भी आसान नहीं

छात्रों की चिंता सिर्फ पढ़ाई पूरी करने और वर्तमान खर्चों तक सीमित नहीं है.जो छात्र पढ़ाई के बाद ऑस्ट्रेलिया में रहकर काम करना चाहते हैं उनके लिए भी माइग्रेशन सिस्टम ज्यादा प्रतिस्पर्धी हो गया है.शाइनी के मुताबिक आगे के रास्ते में योग्यता, संबंधित पेशा, काम का अनुभव, अंग्रेजी भाषा की क्षमता और दूसरे कारक महत्वपूर्ण हो सकते हैं यानी छात्र जब ऑस्ट्रेलिया आते हैं तो उनके सामने सिर्फ यूनिवर्सिटी की फीस और किराया नहीं होता बल्कि यह सवाल भी रहता है कि डिग्री पूरी होने के बाद उनके लिए आगे का रास्ता क्या होगा.

अंतरराष्ट्रीय छात्रों को लेकर ऑस्ट्रेलिया में बहस

इसी बीच ऑस्ट्रेलिया में अंतरराष्ट्रीय छात्रों को लेकर राजनीतिक दबाव भी बढ़ रहा है.14 सितंबर को वन नेशन पार्टी ने अंतरराष्ट्रीय छात्रों की संख्या और ग्रेजुएट माइग्रेशन में बड़ी कटौती की योजना का ऐलान किया.इस प्रस्ताव का यूनिवर्सिटीज ऑस्ट्रेलिया ने विरोध किया है.यह संगठन देश की प्रमुख यूनिवर्सिटीज का प्रतिनिधित्व करता है.संगठन का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय छात्रों की संख्या कम करने से यूनिवर्सिटीज की वित्तीय स्थिति, नौकरियों, आर्थिक गतिविधियों और कुशल कर्मचारियों की आपूर्ति पर असर पड़ सकता है.यूनिवर्सिटीज ऑस्ट्रेलिया के चीफ एग्जीक्यूटिव ल्यूक शीही ने कहा है कि अंतरराष्ट्रीय शिक्षा ऑस्ट्रेलिया के प्रमुख निर्यातों में से एक है और इससे नौकरियों, यूनिवर्सिटीज और देश के कुशल कार्यबल को समर्थन मिलता है.संगठन का तर्क है कि ऑस्ट्रेलिया को नर्स, इंजीनियर, शिक्षक और टेक्नोलॉजी से जुड़े कर्मचारियों की जरूरत है और अंतरराष्ट्रीय शिक्षा इस कुशल कार्यबल को तैयार करने में योगदान देती है.शीही ने यह भी चेतावनी दी है कि अगर अंतरराष्ट्रीय छात्रों की संख्या घटती है तो यूनिवर्सिटीज के सामने यह सवाल खड़ा होगा कि खोई हुई आय की भरपाई कैसे होगी और पढ़ाई रिसर्च और इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए पैसा कहां से आएगा.



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