TET Compulsory Supreme Court: TET पास करना जरूरी या नहीं? 3 राज्यों के शिक्षक फिर पहुंचे सुप्रीम कोर्ट

TET Compulsory Supreme Court: TET पास करना जरूरी या नहीं? 3 राज्यों के शिक्षक फिर पहुंचे सुप्रीम कोर्ट


TET Compulsory Supreme Court: देशभर के प्राथमिक स्कूलों में पढ़ा रहे शिक्षकों के लिए टीईटी यानी शिक्षक पात्रता परीक्षा की अनिवार्यता का मामला अब एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है.सर्वोच्च न्यायालय के एक सितंबर 2025 के फैसले के बाद तीन राज्यों के शिक्षकों ने इस मामले में क्यूरेटिव याचिका का रास्ता अपनाया है.इन शिक्षकों की मांग है कि आरटीई अधिनियम लागू होने से पहले नियुक्त शिक्षकों को सेवा में बने रहने के लिए टीईटी पास करने की अनिवार्यता से छूट दी जाए. जम्मू-कश्मीर, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश से शिक्षकों ने इस मामले में कदम उठाया है.जम्मू-कश्मीर के प्रियंव सिंह धीमान, उत्तर प्रदेश के मेघराज सिंह और मध्य प्रदेश की ट्राइबल वेलफेयर टीचर्स एसोसिएशन की ओर से क्यूरेटिव याचिका दायर की गई है.वहीं दूसरे राज्यों के शिक्षक भी इसी दिशा में आगे बढ़ने की तैयारी कर रहे हैं.

एक सितंबर 2025 के फैसले के बाद विवाद

टीईटी की अनिवार्यता को लेकर सुप्रीम कोर्ट की दो जजों की पीठ ने एक सितंबर 2025 को फैसला दिया था.इस फैसले में कहा गया था कि आरटीई लागू होने से पहले नियुक्त किए गए शिक्षकों को भी सेवा में बने रहने के लिए टीईटी पास करना जरूरी होगा.इस फैसले के बाद उन शिक्षकों के बीच चिंता बढ़ी जो आरटीई लागू होने से पहले ही प्राथमिक स्कूलों में नियुक्त हो चुके थे.अब इस फैसले के खिलाफ क्यूरेटिव याचिकाओं का सिलसिला शुरू हुआ है.क्यूरेटिव याचिका के जरिए याचिकाकर्ता सर्वोच्च न्यायालय से अपने पहले के फैसले पर दोबारा विचार करने की मांग कर रहे हैं.

तीन राज्यों के शिक्षकों ने उठाया कदम

इस मामले में अब तक जम्मू-कश्मीर, उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश से याचिका दायर किए जाने की जानकारी सामने आई है.जम्मू-कश्मीर के प्रियंव सिंह धीमान ने क्यूरेटिव याचिका दायर की है.उत्तर प्रदेश से मेघराज सिंह ने यह कदम उठाया है.वहीं मध्य प्रदेश की ट्राइबल वेलफेयर टीचर्स एसोसिएशन ने भी क्यूरेटिव याचिका दाखिल की है.इनके अलावा दूसरे राज्यों के शिक्षक भी इसी दिशा में तैयारी कर रहे हैं यानी टीईटी की अनिवार्यता का मुद्दा अब सिर्फ एक राज्य तक सीमित नहीं रह गया है और दूसरे राज्यों के शिक्षक भी इस कानूनी रास्ते पर आगे बढ़ने की तैयारी में हैं.

शिक्षकों का क्या है तर्क?

क्यूरेटिव याचिकाकर्ताओं का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट की दो सदस्यीय पीठ ने आरटीई के दो प्रावधानों की गलत व्याख्या की है.शिक्षकों का मुख्य तर्क है कि आरटीई यानी शिक्षा का अधिकार अधिनियम लागू होने से पहले जिन शिक्षकों की नियुक्ति हो चुकी थी उन पर सेवा में बने रहने के लिए बाद में टीईटी पास करने की शर्त लागू नहीं होनी चाहिए.याचिकाकर्ता इसी आधार पर चाहते हैं कि पहले दिए गए फैसले पर उच्चतर पीठ दोबारा विचार करे और आरटीई लागू होने से पहले नियुक्त शिक्षकों को टीईटी की अनिवार्यता से राहत मिले.

जजों की पीठ कर सकती है सुनवाई

क्यूरेटिव याचिकाओं के बाद अब इस मामले की सुनवाई की संभावना एक बड़ी पीठ के सामने है.उपलब्ध जानकारी के अनुसार मामले की सुनवाई सर्वोच्च न्यायालय के तीन वरिष्ठतम न्यायाधीशों और मौजूदा दो न्यायाधीशों की पीठ द्वारा किए जाने की संभावना है यानी अब यह मामला पहले की दो सदस्यीय पीठ से आगे बढ़कर बड़ी पीठ के सामने पहुंचने की संभावना में है हालांकि अंतिम रूप से सुनवाई किस पीठ के सामने होगी.यह न्यायालय की प्रक्रिया के अनुसार तय होगा.

पुनर्विचार याचिकाएं पहले ही हो चुकी हैं खारिज

टीईटी अनिवार्यता के मूल फैसले के खिलाफ उत्तर प्रदेश समेत कई राज्य सरकारों ने सुप्रीम कोर्ट में पुनर्विचार याचिकाएं दाखिल की थीं.इन पुनर्विचार याचिकाओं को 29 मई 2026 को खारिज कर दिया गया था.इसके बाद अब क्यूरेटिव याचिकाओं का दौर शुरू हुआ है.शिक्षक संगठन इस पूरे मामले को संवैधानिक महत्व का बता रहे हैं और उच्चतर पीठ से इस मुद्दे पर दोबारा विचार करने की मांग कर रहे हैं यानी पहले मूल फैसले के बाद पुनर्विचार याचिकाएं दाखिल हुईं और उनके खारिज होने के बाद अब शिक्षक क्यूरेटिव याचिका के जरिए आगे की कानूनी राह अपना रहे हैं.

प्रवक्ता भर्ती का मामला भी सामने आया

इसी बीच उत्तर प्रदेश में शिक्षक भर्ती से जुड़ा एक दूसरा मामला भी सामने आया है.अशासकीय सहायता प्राप्त माध्यमिक विद्यालयों में प्रवक्ता भर्ती में संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय से आचार्य की डिग्री हासिल करने वाले अभ्यर्थियों को अवसर नहीं मिलने से अभ्यर्थियों में आक्रोश है.इस मामले में संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति की ओर से पत्र मिलने के बाद उत्तर प्रदेश शिक्षा सेवा चयन आयोग ने अपर मुख्य सचिव, माध्यमिक शिक्षा को पत्र लिखकर मार्गदर्शन मांगा है यानी आयोग अब शासन से यह स्पष्टता चाहता है कि संबंधित अभ्यर्थियों की योग्यता को भर्ती प्रक्रिया में किस तरह माना जाए.

विज्ञापन में पोस्ट ग्रेजुएशन और B.Ed की योग्यता

उत्तर प्रदेश शिक्षा सेवा चयन आयोग की ओर से जारी भर्ती विज्ञापन में प्रवक्ता पद के लिए जो अर्हता दर्ज है उसके अनुसार अभ्यर्थी के पास किसी विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर उपाधि और बीएड होना चाहिए.इस अर्हता में समकक्ष योग्यता का उल्लेख नहीं किया गया है. इसी वजह से संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय से आचार्य की डिग्री प्राप्त करने वाले अभ्यर्थियों के सामने आवेदन को लेकर समस्या पैदा हुई है.अभ्यर्थियों का कहना है कि उन्हें प्रवक्ता भर्ती में अवसर नहीं मिल पा रहा है जिसके कारण उनमें आक्रोश है.

शासन की मंजूरी के बाद पोर्टल में हो सकता है बदलाव

संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलपति का पत्र मिलने के बाद चयन आयोग ने अपर मुख्य सचिव माध्यमिक शिक्षा से इस मामले में मार्गदर्शन मांगा है.यदि शासन स्तर से योग्यता से जुड़ी शब्दावली में संशोधन को मंजूरी मिलती है तो भर्ती के ऑनलाइन पोर्टल में भी जरूरी बदलाव किए जाएंगे.इस तरह एक तरफ प्राथमिक शिक्षकों की टीईटी अनिवार्यता का मामला क्यूरेटिव याचिका के जरिए सुप्रीम कोर्ट के सामने पहुंचा है वहीं दूसरी तरफ उत्तर प्रदेश में प्रवक्ता भर्ती के दौरान संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के आचार्य डिग्रीधारियों की योग्यता को लेकर शासन से मार्गदर्शन मांगा गया है.



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