यूपी राज्यसभा चुनाव में अखिलेश यादव का मास्टर प्लान, BJP-NDA के कितने विधायक टूटे तो बदल जाएगा पूरा खेल?

यूपी राज्यसभा चुनाव में अखिलेश यादव का मास्टर प्लान, BJP-NDA के कितने विधायक टूटे तो बदल जाएगा पूरा खेल?


लखनऊ : उत्तर प्रदेश में राज्यसभा (UP Rajya Sabha Election 2026) की 10 सीटों के चुनाव ने सपा और भाजपा के बीच सियासी मुकाबले को दिलचस्प बना दिया है. 16 अक्टूबर को होने वाली वोटिंग से पहले सबसे बड़ा सवाल यह है कि अखिलेश यादव (Akhilesh Yadav) अपने ‘तीसरे प्रत्याशी’ को जिताने के लिए एक्‍स्‍ट्रा वोट कहां से जुटाएंगे? सपा के पास दो राज्यसभा सीटें जीतने के लिए जरूरी संख्या मौजूद है, लेकिन तीसरी सीट के लिए उसे अपने मौजूदा संख्या बल से आगे जाना होगा. यही वजह है कि अखिलेश यादव का पूरा फोकस अब बागी विधायकों की वापसी, भाजपा के असंतुष्ट विधायकों और एनडीए के सहयोगी दलों में संभावित सेंध पर दिखाई दे रहा है. अखिलेश यादव ने खुद दावा किया है कि भाजपा के कई विधायक उनके संपर्क में हैं. हालांकि उन्होंने यह भी कहा कि सभी को पार्टी में शामिल करना संभव नहीं है, क्योंकि बाद में उन्हें टिकट देने का सवाल खड़ा होगा.

37 वोट पर टिकी है पूरी लड़ाई
दरअसल, उत्तर प्रदेश में एक राज्यसभा सीट जीतने के लिए 37 प्रथम वरीयता वोट की जरूरत है. इस हिसाब से 10 सीटों के चुनाव में 370 वोटों का प्रभावी गणित बनता है. मौजूदा समीकरण में एनडीए के पास करीब 288 विधायक हैं, जबकि सपा-कांग्रेस खेमे के पास करीब 103 विधायक बताए जा रहे हैं. इनमें सपा के विधायक, कांग्रेस तथा अन्य समर्थक विधायक शामिल हैं. यानी भाजपा (BJP) अपने 7 उम्मीदवारों को जिताने की स्थिति में है. असली मुकाबला उसके बाद बचने वाली सीटों को लेकर है. यही वह जगह है, जहां एक-एक विधायक की भूमिका अचानक बड़ी हो जाती है.

भाजपा की 8वीं सीट बनाम सपा की तीसरी सीट
भाजपा के सामने चुनौती 8वीं सीट की है और सपा तीसरी सीट पर दावा कर रही है. सपा के दो उम्मीदवारों के लिए जरूरी 74 वोट निकाल लेने के बाद उसके पास एक्‍स्‍ट्रा वोटों का सवाल तीसरी सीट पर आकर खड़ा होता है. अलग-अलग रिपोर्टों में सपा के प्रभावी वोटों का आंकड़ा 95 से लेकर 103 तक बताया गया है, क्योंकि कुछ विधायक पार्टी से दूरी बनाए हुए हैं और कुछ के मतदान को लेकर परिस्थितियां अलग हैं. इसलिए अखिलेश के लिए तीसरी सीट का मतलब साफ है कि अपने वोट बचाना, पुराने बागियों को वापस लाना और दूसरे खेमे से अतिरिक्त वोट जुटाना.

पहला रास्ता: पुराने बागी विधायकों की ‘घर वापसी’
2024 के राज्यसभा चुनाव में सपा के कुछ विधायकों ने भाजपा प्रत्याशी संजय सेठ के पक्ष में क्रॉस वोटिंग की थी. इस बार इन्हीं में से कुछ विधायकों को वापस अपने पाले में लाने की कोशिश की जा सकती है. रिपोर्टों में राकेश पांडेय, विनोद चतुर्वेदी और आशुतोष मौर्य जैसे नामों का जिक्र है. वहीं पूजा पाल भाजपा से जुड़ चुकी हैं, इसलिए उनका सपा के पक्ष में लौटना अलग तरह का राजनीतिक सवाल है. सपा के लिए यहां सिर्फ एक वोट की वापसी भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि तीसरी सीट के लिए उसे कई एक्‍स्‍ट्रा वोटों की जरूरत है.

दूसरा रास्ता : भाजपा के उन विधायकों पर नजर, जिन्हें टिकट कटने का डर
अखिलेश की रणनीति का सबसे बड़ा दांव यही माना जा रहा है. रिपोर्टों के मुताबिक, सपा उन भाजपा विधायकों तक पहुंच बनाने की कोशिश कर रही है जिन्हें 2027 के विधानसभा चुनाव में टिकट कटने की आशंका है. सूत्रों के हवाले से यह भी दावा किया गया है कि राज्यसभा चुनाव में सपा का समर्थन करने वाले ऐसे विधायकों को भविष्य में सपा के टिकट का ऑप्‍शन दिया जा सकता है. यानी राज्यसभा का वोट सिर्फ आज की सरकार या विपक्ष का समर्थन नहीं रहेगा, बल्कि 2027 के विधानसभा चुनाव की टिकट राजनीति से भी जुड़ सकता है.

तीसरा रास्ता: भाजपा के सहयोगी दलों में सेंध
अखिलेश की नजर सिर्फ भाजपा विधायकों पर हो, ऐसा नहीं है. एनडीए में शामिल छोटे दलों के विधायक तीसरी सीट के गणित में ज्यादा अहम हो सकते हैं. एनडीए में भाजपा के अलावा अपना दल एस, आरएलडी, सुभासपा और निषाद पार्टी के विधायक हैं. मौजूदा आंकड़ों के मुताबिक एनडीए के सहयोगी दलों के पास भी अच्छी-खासी संख्या है. यही वजह है कि चुनाव से पहले सुभासपा और आरएलडी के विधायकों को लेकर भी राजनीतिक चर्चाएं तेज हैं. कुछ रिपोर्टों में सुभासपा के चार-पांच विधायकों और आरएलडी के कुछ विधायकों के संभावित रुख को लेकर दावे किए गए हैं. लेकिन इन दावों को संबंधित विधायकों की अंतिम मतदान घोषणा के बराबर नहीं माना जा सकता.

सुभासपा क्यों बन सकती है अहम कड़ी?
एनडीए के सहयोगियों में सुभासपा के पास 6 विधायक बताए जा रहे हैं. अगर इनमें से कुछ विधायक अलग रुख अपनाते हैं तो भाजपा के आठवीं सीट के गणित पर असर पड़ सकता है. दिलचस्प बात यह है कि सुभासपा के कुछ विधायक पहले सपा के साथ रहे हैं. ऐसे में अखिलेश के लिए पुराने राजनीतिक रिश्ते भी उपयोगी हो सकते हैं. यानी मुकाबला सीधे भाजपा बनाम सपा नहीं रह गया है. असल लड़ाई एनडीए के भीतर वोटों की एकजुटता बनाए रखने और सपा के पक्ष में अतिरिक्त वोट जुटाने की है.

आरएलडी के पुराने रिश्ते भी चर्चा में
आरएलडी अब भाजपा के साथ है, लेकिन उसके कुछ विधायकों के पुराने राजनीतिक रिश्ते सपा से रहे हैं. इसी वजह से राज्यसभा चुनाव के दौरान आरएलडी के विधायकों के रुख को लेकर भी अटकलें लग रही हैं. हालांकि आखिरी तस्वीर तो वोटिंग के समय ही साफ होगी. सपा की कोशिश यही होगी कि एनडीए के सहयोगी दलों के भीतर अगर किसी विधायक की अपनी राजनीतिक गणना है तो उसे राज्यसभा चुनाव के वोट में बदला जाए.

अखिलेश क्यों उतार रहे तीसरा उम्मीदवार?
यह सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल यही है. अगर सपा सिर्फ 2 उम्मीदवार उतारती तो उसके सामने संख्या का दबाव नहीं होता. लेकिन तीसरा उम्मीदवार उतारकर अखिलेश यादव ने मुकाबले को सीधे वोट ट्रांसफर और क्रॉस वोटिंग के खेल में बदल दिया है. सपा ने दूसरे उम्मीदवार के तौर पर धनराज परिमल नथवानी को मैदान में उतारा है, जबकि प्रो. रामगोपाल यादव भी सपा के उम्मीदवार हैं. धनराज नथवानी भाजपा समर्थित राज्यसभा सांसद परिमल नथवानी के बेटे हैं. उनके नाम ने मुकाबले को और दिलचस्प बना दिया है. यही उम्मीदवार भाजपा खेमे के लिए राजनीतिक रूप से सबसे बड़ा संदेश माना जा रहा है, क्योंकि सपा ने ऐसा चेहरा मैदान में उतारा है जिसका बैकग्राउंड भाजपा समर्थित राज्यसभा सांसद के परिवार से जुड़ी है.

2024 के राज्यसभा चुनाव में भी सपा के पास तीसरी सीट जीतने का गणित बन रहा था. सपा ने आलोक रंजन को तीसरे उम्मीदवार के तौर पर मैदान में उतारा था. लेकिन चुनाव में क्रॉस वोटिंग हुई और भाजपा प्रत्याशी संजय सेठ जीत गए. उस चुनाव में सपा के 7 विधायकों के भाजपा के पक्ष में वोट करने की बात सामने आई थी. इस बार अखिलेश यादव उसी कहानी को उलटने की कोशिश कर रहे हैं. तब भाजपा ने सपा में सेंध लगाकर अपना उम्मीदवार जिताया था. अब सपा की कोशिश है कि भाजपा और उसके सहयोगी दलों के भीतर से एक्‍स्‍ट्रा वोट निकालकर अपना तीसरा उम्मीदवार जिताया जाए.



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