Israel Plane Hijack News: इजरायल जाने वाली फ्लाइट्स के 5 खौफनाक किस्से, सिर पर तनी थीं बंदूकें, फिर भी पायलटों ने नहीं मानी हार

Israel Plane Hijack News: इजरायल जाने वाली फ्लाइट्स के 5 खौफनाक किस्से, सिर पर तनी थीं बंदूकें, फिर भी पायलटों ने नहीं मानी हार


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Dubai News: दुबई से तेल अवीव जा रही फ्लाईदुबई की उड़ान में भारतीय कैप्टन स्मिट मच्छार पर को-पायलट ने हमला कर दिया. खून से लथपथ होने के बावजूद कैप्टन ने हार नहीं मानी और यात्रियों की मदद से विमान को सुरक्षित संभालने में कामयाबी मिली. यह घटना इजरायल जाने वाली उड़ानों के खतरनाक इतिहास की याद दिलाती है. आइए जानें आतंकी हमलों और तकनीकी आपात स्थितियों में पायलटों की बहादुरी के कई किस्से सामने आए हैं.

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प्लेन हाईजैकिंग की कोशिशों को पहले भी पायलट की बहादुरी से नाकाम किया जा चुका है. (AI Image)

Israel Plane Hijack News: इजरायल जा रहे फ्लाईदुबई के प्लेन को हाईजैक और क्रैश होने से भारतीय पायलट स्मित मच्छार ने बचा लिया. दरअसल उनके को-पायलट ने हमला कर दिया था. खून से लथपथ होने के बाद भी पायलट लड़ते रहे और यात्रियों को बुलाने में कामयाब हो गए. बाद में बाकी यात्रियों ने प्लेन को अपने कंट्रोल में ले लिया. इस विमान में ज्यादातर पैसेंजर यहूती थे. हमला करने वाला को पायलट ओमान का रहने वाला था. लेकिन ऐसा पहली बार नहीं हुआ है कि इजरायली विमानों को टार्गेट किया गया हो. इजरायल जाने वाली और इजरायली एयरलाइंस की कई उड़ानों के इतिहास में ऐसे ही खतरनाक पल आए हैं. कभी पायलट ने आतंकियों के सामने विमान का रूट बदलने को मजबूर होकर यात्रियों को बचाए रखा, तो कभी कॉकपिट में बैठे कप्तान ने ऐसी चाल चली कि हाईजैकर्स खुद जमीन पर जा गिरे. इन घटनाओं में 1968 से लेकर 2023 तक की कई कहानियां शामिल हैं. आइए जानें इनके बारे में.

1968: इजरायली विमान का हाईजैक

23 जुलाई 1968 को रोम से तेल अवीव जा रही एल अल की बोइंग 707 को पॉपुलर फ्रंट ऑफ फिलिस्तीन लिबरेशन (PFLP) के तीन हमलावरों ने हाईजैक कर लिया. विमान का रूट बदलकर उसे अल्जीरिया ले जाया गया. कॉकपिट में कैप्टन ओडेड अबारबनेल थे. आतंकियों ने बंदूक की नोक पर विमान का रास्ता बदलवा दिया. विमान अल्जीरिया पहुंचा तो गैर-इजरायली यात्रियों को धीरे-धीरे छोड़ दिया गया, लेकिन इजरायली यात्रियों और क्रू को रोक लिया गया. पहले महिलाओं और बच्चों को छोड़ा गया. इजरायली पुरुष यात्रियों का एक हिस्सा कई हफ्तों तक हिरासत में रहा और करीब पांच हफ्ते बाद सितंबर की शुरुआत में उनकी रिहाई हुई. यह घटना इजरायल के लिए सिर्फ एक हाईजैक नहीं थी. इसने विमान सुरक्षा और आतंकियों से बातचीत की नीति पर बड़ा असर डाला. यात्रियों की रिहाई के लिए बातचीत करनी पड़ी और कुछ अरब कैदियों की रिहाई से इसका रास्ता निकला. इसके बाद इजरायली विमानों की सुरक्षा व्यवस्था और कड़ी की गई.

1969: ज्यूरिख एयरपोर्ट पर गोलियों की बौछार

इसके ठीक एक साल बाद 18 फरवरी 1969 को एक और बड़ा हमला हुआ. एम्स्टर्डम से ज्यूरिख होते हुए तेल अवीव जा रही एल अल की फ्लाइट उड़ान भरने के लिए तैयार थी. विमान में 17 यात्री और 11 क्रू सदस्य थे. तभी PFLP के चार हमलावरों ने विमान पर मशीनगनों से गोलियां बरसानी शुरू कर दीं. गोलियां कॉकपिट और विमान के ढांचे में लगीं. को-पायलट योरम पेरेस गंभीर रूप से घायल हुए और करीब एक महीने बाद उनकी मौत हो गई. लेकिन इसी दौरान विमान में तैनात इजरायली सुरक्षा एजेंट मोर्दचाई राहमिम ने हमलावरों पर गोली चला दी. यह घटना इसलिए भी महत्वपूर्ण रही क्योंकि इसके बाद स्विट्जरलैंड में राहमिम और बचे हुए हमलावरों पर मुकदमा चला. इजरायल ने अपने सरकारी वकील गेब्रियल बाख को उनके बचाव के लिए भेजा. इसी मामले में पहली बार यह सामने आया कि इजरायली फ्लाइट्स में मार्शल तैनात रहते हैं.

1970: पायलट ने जानबूझकर प्लेन को ‘गिराया’

6 सितंबर 1970 को एम्स्टर्डम से न्यूयॉर्क जा रही एल अल की बोइंग 707 में हाईजैक की कोशिश हुई. इस घटना में PFLP की लैला खालिद और निकारागुआ के पैट्रिक अरगुएलो शामिल थे. यह वही दौर था जब एक ही दिन कई विमानों को हाईजैक किया गया था और इसे बाद में डॉसन फील्ड हाईजैकिंग के नाम से जाना गया. जब हमलावर कॉकपिट की ओर बढ़े तो कैप्टन उरी बार-लेव ने एक बेहद जोखिम भरा फैसला लिया. उन्होंने विमान को अचानक तेज गोता लगवा दिया. विमान के अचानक नीचे जाने से हाईजैकर्स अपना संतुलन खो बैठे और फर्श पर गिर गए. इसी मौके का फायदा उठाकर सुरक्षा गार्ड और यात्रियों ने उन्हें पकड़ लिया. अरगुएलो गोली लगने से मारा गया, जबकि लैला खालिद को पकड़ लिया गया. विमान बाद में लंदन के हीथ्रो एयरपोर्ट पर सुरक्षित उतरा. इस घटना में भी पायलट की सूझबूझ ने हादसे को टाल दिया. कैप्टन बार-लेव ने विमान को सामान्य तरीके से उड़ाते रहने के बजाय उसकी ही गति और झटके को हमलावरों के खिलाफ इस्तेमाल किया.

1972: विमान में कमांडो ऑपरेशन

8 मई 1972 को वियना से तेल अवीव जा रहा बेल्जियम की एयरलाइन सबेना का बोइंग 707 हाईजैक कर लिया गया. विमान इजरायली नहीं था, लेकिन उसकी मंजिल तेल अवीव थी. ब्लैक सेप्टेंबर के चार हमलावरों ने विमान को इजरायल के लोद एयरपोर्ट पर उतारने के लिए मजबूर किया. उनकी मांग थी कि इजरायली जेलों में बंद कैदियों को छोड़ा जाए. इस पूरी स्थिति में कप्तान रेजिनाल्ड लेवी ने यात्रियों और क्रू को संभालकर रखा. इसी दौरान इजरायली कमांडोज ने टेक्नीशियन का भेष बनाया और विमान तक पहुंचे. ऑपरेशन की अगुआई इहूद बराक कर रहे थे. इस टीम में बेंजामिन नेतन्याहू भी शामिल थे. कमांडोज ने विमान पर कार्रवाई की. दो हमलावर मारे गए और बाकी पकड़े गए. एक यात्री की बाद में मौत हुई. यह घटना आगे चलकर इजरायल के विमान हाईजैक से निपटने के तरीके की एक बड़ी मिसाल बनी.

1976: जब पायलट ने यात्रियों को छोड़ने से इनकार कर दिया

27 जून 1976 को तेल अवीव से पेरिस जा रही एयर फ्रांस की उड़ान 139 को हाईजैक कर लिया गया. विमान एथेंस से उड़ान भरने के बाद हमलावरों के कब्जे में आया. इसे पहले लीबिया के बेनगाजी और फिर युगांडा के एंटेबे एयरपोर्ट ले जाया गया. एंटेबे पहुंचने के बाद हाईजैकर्स ने यात्रियों को अलग करना शुरू किया. गैर-इजरायली यात्रियों को छोड़ दिया गया, जबकि इजरायली और यहूदी यात्रियों को अलग रखा गया. क्रू के पास भी जाने का विकल्प था. लेकिन एयर फ्रांस के कप्तान मिशेल बेकोस ने जाने से इनकार कर दिया. उन्होंने अपने क्रू के साथ यात्रियों के साथ ही रहने का फैसला किया. वह जानते थे कि स्थिति कितनी खतरनाक है, फिर भी उन्होंने अपनी जिम्मेदारी से पीछे हटना स्वीकार नहीं किया. बेकोस और उनके क्रू की यही भूमिका इस घटना की सबसे चर्चित कहानियों में से एक बन गई.

इसके बाद 4 जुलाई 1976 को इजरायली कमांडो एंटेबे पहुंचे. बंधकों को छुड़ाने के लिए एक अभियान चलाया गया, जिसे ऑपरेशन थंडरबोल्ट के नाम से जाना गया. करीब 102 बंधकों को बचाया गया. लेकिन ऑपरेशन के दौरान कमांडो टीम का नेतृत्व कर रहे योनातन नेतन्याहू, जो बेंजामिन नेतन्याहू के भाई थे, मारे गए. एंटेबे की घटना में पायलट मिशेल बेकोस की भूमिका अलग तरह की थी. उन्होंने विमान में फंसे यात्रियों को अकेला छोड़कर जाने के बजाय उनके साथ रहना चुना. बाद में उन्होंने करीब दो हफ्ते की छुट्टी ली और अपनी वापसी की पहली उड़ान इजरायल की रखने की मांग की.

हाईजैक के अलावा भी पायलटों ने दिखाई बहादुरी

इजरायली विमानों और इजरायल जाने वाली उड़ानों की कहानियों से आगे देखें तो एविएशन इतिहास में कई ऐसी घटनाएं हैं, जहां पायलटों ने लगभग खत्म हो चुकी उम्मीद को वापस जिंदा किया.

  • इंजन बंद, फिर भी विमान उतरा: 23 जुलाई 1983 को एयर कनाडा की बोइंग 767 मॉन्ट्रियल से एडमॉन्टन जा रही थी. ईंधन भरते समय किलोग्राम और पाउंड की गणना में गलती हो गई और विमान में जरूरत से काफी कम ईंधन भरा गया. करीब 41,000 फीट की ऊंचाई पर दोनों इंजन बंद हो गए. अब विमान के पास इंजन की ताकत नहीं थी. कैप्टन बॉब पियर्सन के पास ग्लाइडर उड़ाने का अनुभव था, जबकि को-पायलट मौरिस क्विंटल को गिम्ली की पुरानी एयरफोर्स पट्टी के बारे में जानकारी थी. दोनों ने विमान को ग्लाइड करते हुए उसी पट्टी की तरफ मोड़ा. वहां उस वक्त ड्रैग रेसिंग चल रही थी. विमान जमीन पर उतरा और सभी 69 लोग बच गए. इसी वजह से इस विमान को बाद में ‘गिम्ली ग्लाइडर’ के नाम से जाना गया.
  • विमान की छत उड़ गई, फिर भी लैंडिंग: 28 अप्रैल 1988 को एयर अलोहा की बोइंग 737 हिलो से होनोलुलु जा रही थी. करीब 24,000 फीट की ऊंचाई पर विमान के ऊपरी हिस्से का बड़ा हिस्सा अचानक टूटकर अलग हो गया. एक फ्लाइट अटेंडेंट, क्लाराबेल लैंसिंग, विमान से बाहर खिंच गईं और उनकी मौत हो गई. लेकिन कैप्टन रॉबर्ट शॉर्नस्टाइमर और को-पायलट मैडलीन ‘मिमी’ टॉम्पकिन्स ने बुरी तरह क्षतिग्रस्त विमान को संभाला और माउई के कहुलुई एयरपोर्ट पर उतार दिया. करीब 65 लोग घायल हुए, लेकिन बाकी यात्रियों की जान बच गई.
  • जब विमान के कंट्रोल ही जवाब दे गए: 19 जुलाई 1989 को यूनाइटेड एयरलाइंस की DC-10 डेनवर से शिकागो जा रही थी. उड़ान के दौरान पीछे वाले इंजन का फैन डिस्क टूट गया. इससे विमान के तीनों हाइड्रोलिक सिस्टम खराब हो गए. सीधी भाषा में समझें तो पायलट के पास विमान को सामान्य तरीके से मोड़ने और नियंत्रित करने के साधन लगभग खत्म हो चुके थे. कैप्टन अल हेन्स, को-पायलट विलियम रिकॉर्ड्स और फ्लाइट इंजीनियर डडली ड्वोरक ने विमान को बचाने की कोशिश शुरू की. इसी दौरान विमान में मौजूद DC-10 इंस्ट्रक्टर डेनिस फिच भी कॉकपिट में पहुंचे. फिच ने दोनों इंजनों की ताकत को अलग-अलग बढ़ाकर और घटाकर विमान की दिशा बदलने में मदद की. आखिरकार विमान सियोक्स सिटी में क्रैश-लैंड हुआ. विमान टूट गया और आग लग गई. करीब 111 लोगों की मौत हुई, लेकिन लगभग 185 लोग बच गए.
  • दोनों इंजन बंद, फिर 120 किलोमीटर की ग्लाइड: 24 अगस्त 2001 को एयर ट्रांसैट की एयरबस A330 टोरंटो से लिस्बन जा रही थी. अटलांटिक महासागर के ऊपर ईंधन लीक होने लगा और आखिरकार दोनों इंजन बंद हो गए. कैप्टन रॉबर्ट पिशे और को-पायलट डिर्क डी याजेर के सामने अब सिर्फ ग्लाइड करके विमान को जमीन तक पहुंचाने का रास्ता था. उन्होंने विमान को करीब 120 किलोमीटर तक बिना इंजन के उड़ाया और अजोरेस के लाजेस एयरबेस पर उतार दिया. लैंडिंग के दौरान विमान को नुकसान हुआ और कुछ लोग घायल हुए, लेकिन सभी 306 लोग बच गए.
  • पानी में उतार दिया प्लेन: 15 जनवरी 2009 को US Airways की फ्लाइट 1549 ने न्यूयॉर्क के लागार्डिया एयरपोर्ट से उड़ान भरी. कुछ ही मिनट बाद विमान पक्षियों के झुंड से टकरा गया. दोनों इंजन बंद हो गए. कैप्टन चेस्ली सली सलेनबर्गर और को-पायलट जेफ स्काइल्स के पास बहुत कम समय था. आगे न्यूयॉर्क का घना इलाका था. ऐसे में किसी एयरपोर्ट तक पहुंचना संभव नहीं था. कप्तान ने हडसन नदी को चुना. विमान नदी में उतरा और सभी 155 लोग बच गए. यात्रियों को विमान से निकालकर उसके पंखों पर खड़ा देखा गया, जबकि आसपास की नावें उन्हें बचाने पहुंचीं. यही घटना बाद में ‘मिरेकल ऑन द हडसन’ के नाम से मशहूर हुई. इस पर एक फिल्म भी बनी है.



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