राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप काफी टाइम से माहौल बना रहे थे. कह रहे थे कि अमेरिका में ब्याज दरें दुनिया में सबसे कम होनी चाहिए. 16 सितंबर की मीटिंग से पहले भी उन्होंने पब्लिक में कह दिया था कि रेट घटाओ. लेकिन फेडरल रिजर्व के गवर्नर ने उनकी एक न सुनी.
फेड ने रेट घटाने के बजाय 25 बेसिस पॉइंट बढ़ा दिए. अब ब्याज दर 3.75 से 4 फीसदी हो गई है. जुलाई 2023 के बाद ये पहला मौका था जब दरें बढ़ाई गईं. मजे की बात ये है कि ये फैसला किसी एक आदमी का नहीं था, फेड के पूरे 12 सदस्यों ने मिलकर इस पर मुहर लगाई. वजह बताई गई-महंगाई.
क्या फिर शुरू हो गई पॉवेल वाली कहानी?
यह सीन देखकर लोगों को जेरोम पॉवेल याद आने लगे. अमेरिकी राष्ट्रपति के पिछले कार्यकाल में ट्रंप और तत्कालीन फेड चीफ जेरोम पॉवेल के बीच खूब टशन चला था. ट्रंप कहते थे कि रेट गिराओ, पॉवेल कहते थे कि महंगाई ज्यादा है, अभी नहीं गिराएंगे. बात इतनी बढ़ गई थी कि ट्रंप ने पब्लिकली पॉवेल को खूब खरी-खोटी सुनाई थी. मई 2026 में पॉवेल का कार्यकाल खत्म हो गया और तो ट्रंप ने उनकी जगह केविन वॉर्श को नामित कर दिया.
मजे की बात देखिए. वॉर्श को ट्रंप ने ही चुना था. सबको लगा कि वॉर्श तो उनके अपने आदमी हैं, वो ट्रंप की कम ब्याज दरों वाली लाइन पर ही चलेंगे. लेकिन 16 सितंबर को वॉर्श ने भी दिखा दिया कि कुर्सी बदलते ही फेड का मिजाज नहीं बदलता.
वॉर्श ने दरें बढ़ाने के बाद साफ कर दिया कि अमेरिका में महंगाई अभी भी फेड के 2% वाले टारगेट से ऊपर करीब 3.7% चल रही है. ऐसे में मॉनिटरी पॉलिसी में ढील देना खतरनाक हो सकता है. यानी राष्ट्रपति की प्रॉयोरिटी और बैंक की प्रॉयोरिटी अलग-अलग है.
ट्रंप का लॉजिक vs फेड की चिंता
दोनों का अपना-अपना तर्क है. ट्रंप का लॉजिक एकदम सीधा है. ब्याज दर कम होगी तो लोन सस्ता मिलेगा. लोन सस्ता होगा तो कंपनियां निवेश करेंगी, घर खरीदने वालों की ईएमआई घटेगी और मार्केट में पैसा घूमेगा. राजनीति के हिसाब से भी ये एकदम चकाचक मामला है.
लेकिन फेड की सोच अलग है. उनका कहना है कि अगर सस्ते लोन के चक्कर में महंगाई आउट ऑफ कंट्रोल हो गई, तो लेने के देने पड़ जाएंगे. इसलिए जब तक महंगाई पूरी तरह काबू में नहीं आती, वो ढिलाई बरतने के मूड में नहीं हैं.
असली लड़ाई तो आजादी की
लड़ाई ब्याज दरों से ज्यादा फेड की स्वतंत्रता की है. अगर सेंट्रल बैंक के फैसले व्हाइट हाउस की राजनीतिक जरूरतों के हिसाब से होने लगे, तो फिर अर्थव्यवस्था का बंटाधार होना तय है. फैसले के बाद ट्रंप ने फिर कहा है कि दरें 1 फीसदी या उससे कम होनी चाहिए. हालांकि, इस बार उन्होंने वाशिंगटन पोस्ट के मुताबिक ये भी कहा कि मैंने फेड प्रमुख से कहा है कि वो वही करें जो उन्हें ठीक लगे. यानी इस बार ट्रंप ने पॉवेल वाले दौर की तरह सीधा निजी हमला नहीं किया.
पिक्चर अभी बाकी है
अगर अमेरिका में महंगाई कम नहीं हुई, तो वॉर्श भी दरें टाइट रखेंगे. और अगर ऐसा हुआ, तो ट्रंप का गुस्सा फूटने में देर नहीं लगेगी. अगली कहानी सिर्फ ‘ट्रंप बनाम वॉर्श’ की नहीं होगी, बल्कि राजनीति बनाम अर्थव्यवस्था की होगी.