देहरादून: देवभूमि उत्तराखंड के दूर-दराज पहाड़ों से बेहतर भविष्य का सपना लेकर शहरों का रुख करने वाले हजारों लैब टेक्नीशियन आज घोर आर्थिक तंगी और मानसिक तनाव की मार झेल रहे हैं. मां-बाप की गाढ़ी कमाई, लाखों की फीस और वर्षों की कठिन पढ़ाई के बाद जब हाथ में महज 8 से 10 हजार रुपये की नौकरी आए, तो इसे आजीविका नहीं बल्कि व्यवस्था की बेरुखी ही कहा जाएगा. अपनी आजीविका, सुरक्षित भविष्य और सम्मानजनक मानदेय की गुहार लगाते हुए ये युवा पिछले 136 दिनों से देहरादून की सड़कों पर आंदोलनरत हैं, लेकिन शासन की अनदेखी ने अब इन्हें आत्मदाह जैसा आत्मघाती कदम उठाने की कगार पर ला खड़ा किया है.
17 साल के तजुर्बे के बाद भी केवल ₹12 हजार वेतन
पौड़ी के रहने वाले विपुल ने बताया कि 2007 में वह देहरादून गांव से पढ़ने के लिए आए थे. गांव में बीएससी एमएलटी का कोर्स नहीं होता था, इसलिए वह शहर आए. मां-बाप ने बड़ी मुश्किल से पैसे जुटाकर देहरादून के एक प्राइवेट कॉलेज में दाखिला दिलाया. यहां लाखों के खर्च के बाद भी सरकारी भर्ती न होने से वह बेरोजगार रहे. इसके बाद 6 हजार रुपये से एक नौकरी शुरू की और आज 17 साल बाद भी उनकी सैलरी मात्र 12 हजार ही हो पाई है. उन्होंने कहा कि हम जैसे 4 हजार से ज्यादा लोग या तो रोजगार ही नहीं पा रहे हैं या फिर बहुत कम वेतन में काम करने को मजबूर हैं. हम तो मजदूरों से भी बदतर स्थिति में पहुंच गए हैं.
136 दिनों से आंदोलन, अब आत्मदाह की चेतावनी
अपनी इन जायज मांगों, सम्मानजनक मानदेय और रोजगार सुरक्षा को लेकर यह बेरोजगार संघ पिछले 136 दिनों से लगातार शांतिपूर्ण आंदोलन कर रहा था, लेकिन शासन-प्रशासन की उपेक्षा और कोई ठोस समाधान न निकलने से हताश होकर अब उन्होंने आत्मदाह जैसी आत्मघाती चेतावनी देने जैसा कड़ा कदम उठाने का फैसला लिया है. यह स्थिति राज्य में युवाओं के रोजगार के संकट और उनकी अनदेखी की एक बेहद गंभीर और चिंताजनक तस्वीर पेश करती है.
पहाड़ों में सेवा का सपना टूटा, नीति न होने का दंश
कुलभूषण सिंह ने बताया कि वह पौड़ी गढ़वाल के रहने वाले हैं. उनके गांव में स्वास्थ्य सुविधाएं ठीक नहीं थीं, इस वजह से उन्होंने सोचा कि पैरामेडिकल का कोर्स करने के बाद उन्हें अपने ही गांव में नौकरी मिल जाएगी, जिससे वह काम के साथ-साथ लोगों की सेवा भी कर पाएंगे. वह देहरादून आए और उन्होंने यहां एक प्राइवेट कॉलेज में दाखिला लिया. लाखों की फीस खर्च करने के बाद भी सही जगह नौकरी न मिलने के कारण उन्होंने मजबूरी में 6 हजार की नौकरी करना शुरू किया. उन्होंने भर्ती का भी लंबा इंतजार किया लेकिन उन्हें उपयुक्त नौकरी नहीं मिल पाई. उन्होंने कहा कि अलग राज्य तो बन गया लेकिन ठोस नीति न बनने के कारण हम जैसे लोग बेरोजगारी का दंश झेल रहे हैं. हम आज पढ़े-लिखे मजदूर बनने को मजबूर हैं.
कोविड वीरों की अनदेखी और निजी लैबों की लापरवाही
अखिलेश बिष्ट ने बताया कि वह कोविड के समय अपने गांव में काम पर तैनात थे, लेकिन जैसे ही कोविड का दौर बीता, सरकार भी उन्हें भूल गई. उन्होंने कहा कि आज सरकारी अस्पतालों में निजी लैब जुड़कर काम कर रही हैं. कई लैबों में गैर-तकनीकी (नॉन-टेक्निकल) लोग काम कर रहे हैं, जिससे मरीजों के स्वास्थ्य पर सीधा और गंभीर असर पड़ सकता है. उन्होंने बताया कि अभी उनके उत्तरकाशी जिले से ही एक मरीज उनके पास आया था, जिसकी रिपोर्ट सही नहीं थी. उस मरीज को कैंसर था; अगर डॉक्टर को समय पर सही जांच और रिपोर्ट मिल जाती, तो उसका सही समय पर इलाज शुरू हो पाता.
26 साल से सेवा नियमावली नदारद, 1985 के नियमों पर अटकी व्यवस्था
मेडिकल लैब टेक्नोलॉजिस्ट संघ उत्तराखंड के महासचिव मयंक राणा ने बताया कि हम पिछले 136 दिनों से लगातार अपनी मांगों को लेकर सरकार के सामने जा रहे हैं. धरना स्थल पर भी बैठे रहे, हमें केवल आश्वासन मिला लेकिन अभी तक इस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया. उन्होंने बताया कि पिछले 26 सालों से लैब टेक्नीशियनों के लिए सेवा नियमावली ही नहीं बन पाई है.
उत्तर प्रदेश से अलग होने के बाद अब तक उत्तराखंड में भी 1985 की पुरानी नियमावली ही खींची जा रही है. इतना ही नहीं, सरकारी भर्ती के लिए भी लंबा इंतजार करना पड़ता है. सरकार को नए नियमों के तहत उन लोगों के लिए भी सोचना चाहिए जिनकी उम्र सीमा निकलती जा रही है, और उनकी उम्र सीमा में छूट देनी चाहिए. यदि सरकार हमारी मांगें नहीं मानती है, तो हम आंदोलन को और अधिक उग्र करने तथा आत्मदाह करने को मजबूर होंगे.