शायरी के थे दीवाने, फिल्मों में लिखना नहीं था पसंद, फिर एक सलाह से बदली राह और बॉलीवुड को मिले मजरूह सुल्तानपुरी

शायरी के थे दीवाने, फिल्मों में लिखना नहीं था पसंद, फिर एक सलाह से बदली राह और बॉलीवुड को मिले मजरूह सुल्तानपुरी


मशहूर गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी के लिखे गीत आज भी लोगों की जुबान पर हैं. प्यार, दर्द, दोस्ती और जिंदगी के अलग-अलग रंगों को उन्होंने इतने आसान शब्दों में लिखा कि उनके गीत आम लोगों से सीधे जुड़ गए. हालांकि बहुत कम लोग जानते हैं कि जिस फिल्मी दुनिया में उन्होंने पांच दशक से ज्यादा करियर बनाया, उसमें आने के लिए वह शुरुआत में तैयार ही नहीं थे. उन्हें फिल्मों के लिए गीत लिखना कुछ खास पसंद नहीं था, इसलिए एक मशहूर शायर को उन्हें मनाने के लिए काफी मेहनत करनी पड़ी थी.

मजरूह सुल्तानपुरी का जन्म 1 अक्टूबर 1919 को उत्तर प्रदेश के सुल्तानपुर में हुआ था. उनका असली नाम असरार हसन खान था. उनके पिता पुलिस विभाग में थे और उन्होंने बेटे की पढ़ाई की शुरुआत मदरसे में कराई. आगे चलकर मजरूह ने यूनानी चिकित्सा की पढ़ाई की और कुछ समय तक हकीम के तौर पर काम भी किया लेकिन उनका असली लगाव शायरी से था. मुशायरों में उनकी शायरी को लोगों से खूब तारीफ मिली और धीरे-धीरे उन्होंने शायरी को ही अपना रास्ता बना लिया.

मजरूह सुल्तानपुरी का करियर
मजरूह की शायरी को सबसे ज्यादा दिशा देने वालों में मशहूर शायर जिगर मुरादाबादी का नाम आता है. साल 1945 में मुंबई के एक मुशायरे में मजरूह ने अपनी शायरी सुनाई. वहां फिल्म निर्माता एआर कारदार ने उन्हें सुना और अपनी फिल्म के लिए गीत लिखने का ऑफर दिया लेकिन मजरूह ने इस ऑफर को ठुकरा दिया. उनका मानना था कि फिल्मी गीत लिखना उनकी शायरी के मुकाबले कमतर काम है. इसके बाद जिगर मुरादाबादी ने उन्हें समझाया कि फिल्मों के लिए लिखने से अच्छी कमाई होगी और इससे वह अपने परिवार की मदद कर सकेंगे. आखिरकार मजरूह इसके लिए तैयार हो गए.

ऐसे शुरू हुआ मजरूह सुल्तानपुरी का फिल्मों का सफर
इसके बाद कारदार उन्हें संगीतकार नौशाद के पास लेकर गए. नौशाद ने मजरूह को एक धुन और उसका मीटर दिया और उस पर कुछ लिखने को कहा. मजरूह ने उसी के आधार पर ‘जब उसने गेसू बिखराए, बादल आए झूम के’ लिखा. नौशाद को उनका लिखा पसंद आया और इसके बाद 1946 में आई फिल्म ‘शाहजहां’ से मजरूह के फिल्मी गीतों का सफर शुरू हुआ. इसी फिल्म में उनका लिखा ‘जब दिल ही टूट गया’ भी था, जिसे के. एल. सहगल ने आवाज दी थी.

मजरूह सुल्तानपुरी की फिल्में
‘शाहजहां’ के बाद मजरूह ने पीछे मुड़कर नहीं देखा. ‘अंदाज’, ‘आर पार’, ‘मिस्टर एंड मिसेज 55’, ‘सीआईडी’, ‘नौ दो ग्यारह’, ‘काला पानी’, ‘सुजाता’, ‘गाइड’ और ‘ज्वेल थीफ’ जैसी फिल्मों के लिए उन्होंने यादगार गीत लिखे. एसडी बर्मन, ओपी नैयर, आरडी बर्मन, नौशाद और कई दूसरे संगीतकारों के साथ उनकी शानदार जोड़ी बनी. उनके गीत अलग-अलग दौर के हिसाब से बदलते रहे.

350 फिल्मों के लिए हजारों गीत लिखे
मजरूह ने नई पीढ़ी के लिए भी गीत लिखे. ‘कयामत से कयामत तक’ का ‘पापा कहते हैं बड़ा नाम करेगा’, ‘जो जीता वही सिकंदर’ का ‘पहला नशा’ और ‘हम किसी से कम नहीं’ जैसे गीत लोगों को काफी पसंद आए. उन्होंने पांच दशक से ज्यादा लंबे करियर में करीब 350 फिल्मों के लिए हजारों गीत लिखे.

दादा साहेब फाल्के पुरस्कार पाने वाले पहले गीतकार
उनके काम को कई बड़े अवॉर्ड्स मिले. ‘दोस्ती’ के गीत ‘चाहूंगा मैं तुझे सांझ सवेरे’ के लिए उन्हें 1965 में फिल्मफेयर का सर्वश्रेष्ठ गीतकार पुरस्कार मिला. साल 1993 में वह दादा साहेब फाल्के पुरस्कार पाने वाले पहले गीतकार बने. साहित्य के लिए भी उन्हें गालिब पुरस्कार और इकबाल सम्मान जैसे अवार्ड मिले. मजरूह सुल्तानपुरी का निधन 80 साल की उम्र में 24 मई 2000 को मुंबई में हुआ था.



Source link