दिल्ली के रोहिणी में रहने वाले एक फार्मा कारोबारी के बैंक खाते में नोटबंदी के दौरान 2.47 करोड़ जमा हुए तो इनकम टैक्स डिपार्टमेंट की नजर गई. कारोबारी ने तीन सेविंग अकाउंट में कुल 2,47,91,057 कैश जमा किया था. टैक्स विभाग ने इस रकम को समझाने के लिए कहा और बाद में पूरी रकम को अनएक्सप्लेंड यानी जिसका स्रोत साफ नहीं है, मान लिया. मामला आखिरकार इनकम टैक्स अपीलेट ट्रिब्यूनल यानी ITAT तक पहुंचा. तब ट्रिब्यूनल ने कारोबारी को राहत देते हुए टैक्स विभाग की ओर से की गई पूरी एडिशन को हटा दिया. यानी 10 साल बाद यह मामला सुलझा.
कारोबारी राकेश कुमार ने बताया कि जमा की गई रकम का बड़ा हिस्सा उनके फार्मास्युटिकल कारोबार की कैश बिक्री से आया था. उन्होंने टैक्स विभाग के सामने सिर्फ मौखिक दावा नहीं किया. इसके साथ ऑडिटेड अकाउंट, VAT रिटर्न, बिक्री के रिकॉर्ड और बिक्री के बिल भी जमा किए. उनका कहना था कि ₹1,64,37,357 उनके दवा कारोबार की कैश बिक्री से मिले थे.
टैक्स विभाग ने पूरी रकम को नहीं माना
इनकम टैक्स अधिकारी ने इस पूरी कैश जमा रकम को आय का ऐसा हिस्सा माना जिसका स्रोत ठीक से साबित नहीं हुआ. इसके बाद इनकम टैक्स एक्ट की धारा 68 के तहत रकम को जोड़ा गया. इस पर धारा 115BBE के तहत टैक्स का प्रावधान भी लागू किया गया. मामला यहीं खत्म नहीं हुआ. फरवरी 2026 में इनकम टैक्स कमिश्नर ने भी टैक्स विभाग की ओर से की गई इस एडिशन को बरकरार रखा. इसके बाद कारोबारी ITAT पहुंचा.
ITAT ने पूछा- रिकॉर्ड में गड़बड़ी मिली भी थी?
ट्रिब्यूनल ने मामले में जमा किए गए दस्तावेजों को देखा. यहां कारोबारी के लिए सबसे अहम बात यह रही कि टैक्स अधिकारियों ने उसके अकाउंट, बिक्री रिकॉर्ड और दूसरे दस्तावेजों में कोई खास गड़बड़ी नहीं बताई थी. साथ ही कारोबारी की किताबों को भी इनकम टैक्स एक्ट की धारा 145 के तहत खारिज नहीं किया गया था. ITAT ने इन बातों को ध्यान में रखते हुए कारोबार की कैश बिक्री से जुड़ी 1.64 करोड़ की रकम को स्वीकार कर लिया और उस पर की गई एडिशन हटा दी.
बाकी 83.7 लाख का क्या हुआ?
अब सवाल था कि बची हुई करीब 83.7 लाख रकम कहां से आई. कारोबारी ने बताया कि इसमें पहले बैंक से निकाला गया और फिर जमा किया गया पैसा, उसकी अपनी बचत और परिवार के सदस्यों से मिली रकम शामिल थी. इसमें पत्नी, भाई, भाई की पत्नी, बेटी और बेटे से मिली रकम भी शामिल थी. कारोबारी ने इनके इनकम टैक्स रिटर्न, बैंक डिटेल, घोषणाएं और दूसरे दस्तावेज भी पेश किए.
परिवार से मिले 72 लाख पर भी राहत
कारोबारी ने करीब ₹72 लाख की रकम के लिए परिवार के सदस्यों के दस्तावेज और बैंक रिकॉर्ड दिए. ITAT ने पाया कि इन दस्तावेजों को टैक्स विभाग की ओर से प्रभावी तरीके से खारिज नहीं किया गया था. इस आधार पर ट्रिब्यूनल ने बची हुई रकम पर की गई एडिशन भी हटा दी. यानी नोटबंदी के दौरान बैंक में जमा किए गए ₹2.47 करोड़ की पूरी रकम पर कारोबारी को ITAT से राहत मिल गई.
इस मामले से आम टैक्सपेयर क्या समझे?
इस फैसले की सबसे बड़ी सीख यह है कि बड़ी रकम का कैश लेन-देन हो तो उसके स्रोत का रिकॉर्ड संभालकर रखना बेहद जरूरी है. कारोबार की बिक्री है तो बिक्री के बिल, अकाउंट बुक, बैंक रिकॉर्ड और टैक्स रिटर्न जैसे दस्तावेज काम आ सकते हैं. परिवार से पैसा मिला है तो उसके स्रोत और बैंक ट्रेल से जुड़े दस्तावेज रखना भी अहम है. कारोबारी के पक्ष में सबसे महत्वपूर्ण बात यही रही कि उसने अपने दावे के समर्थन में दस्तावेज दिए और टैक्स अधिकारियों ने उन रिकॉर्ड में कोई ठोस गड़बड़ी नहीं बताई.