मिथिला की पहचान केवल उसकी भाषा, साहित्य और विद्या की परंपरा से नहीं है. यहां की संस्कृति में ऐसे अनेक लोकपर्व हैं, जिनमें धार्मिक आस्था के साथ जीवन-दर्शन, सामाजिक संबंध और लोकस्मृति भी पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ती रही है. जितिया पावनि भी इसी समृद्ध परंपरा का एक महत्वपूर्ण पर्व है. शास्त्रीय रूप में इसे जीवित्पुत्रिका व्रत कहा जाता है, जबकि मिथिला और आसपास के क्षेत्रों में यह जितिया या जितिया पावनि के नाम से लोकप्रिय है. यह व्रत मुख्य रूप से माताएं अपनी संतान की दीर्घायु, स्वास्थ्य, सुख और मंगल की कामना से करती हैं. इसकी खासियत है कि इसमें मातृत्व की संवेदना, त्याग, लोकविश्वास, सामूहिकता और मैथिली लोकसंस्कृति एक साथ दिखाई देती है.
3 अक्टूबर को जितिया का मुख्य व्रत
वर्ष 2026 में जीवित्पुत्रिका व्रत शनिवार, 3 अक्टूबर को है. इसकी शुरुआत शुक्रवार, 2 अक्टूबर को नहाय-खाय के साथ होगी. रविवार, 4 अक्टूबर को पारण किया जाएगा. पारण के मुहूर्त को लेकर सुबह 6:15 और 7:28 के बाद का समय बताया जा रहा है. हालांकि, सही समय की पुष्टि स्थानीय पंचांग के अनुसार करना जरूरी है. इस अवसर पर समस्तीपुर के चर्चित मिथिला पेंटिंग कलाकार कुंदन राय ने भी एक आकर्षक पेंटिंग बनाई है, जो इन दिनों चर्चा में है.
जितिया नाम क्यों पड़ा?
जीवित्पुत्रिका का अर्थ है संतान के जीवित रहने की कामना. लोकपरंपरा में समय के साथ जीवित्पुत्रिका का उच्चारण और लोकभाषा का प्रभाव इसे जितिया के रूप में लोकप्रिय बनाता गया. हालांकि परंपरागत नाम में पुत्र का उल्लेख मिलता है, लेकिन आज अनेक परिवारों में माताएं अपनी सभी संतानों, बेटों और बेटियों, के स्वास्थ्य और दीर्घायु की कामना से यह व्रत करती हैं.
जीमूतवाहन की त्याग-कथा
जितिया व्रत की प्रमुख पौराणिक और लोकमान्यता जीमूतवाहन की कथा से जुड़ी है. इसके विभिन्न लोक संस्करण प्रचलित हैं. कथा के अनुसार, जीमूतवाहन एक त्यागी और करुणाशील राजकुमार थे. उन्हें पता चलता है कि नागवंश का एक बालक संकट में है और उसकी बलि दी जानी है. बालक और उसके परिवार का दुख देखकर जीमूतवाहन स्वयं उसके स्थान पर संकट स्वीकार करने का निर्णय लेते हैं. वे दूसरे के जीवन की रक्षा के लिए अपना जीवन दांव पर लगा देते हैं. उनकी करुणा और त्याग से प्रभावित होकर अंततः संकट टलता है और जीवन की रक्षा होती है. यह कथा जितिया के आध्यात्मिक आधार में त्याग, करुणा और जीवन-संरक्षण के भाव को स्थापित करती है. इसके अलग-अलग क्षेत्रीय रूप मिलते हैं, इसलिए इसे लोकपरंपरा और धार्मिक मान्यता के रूप में समझना उचित है.
महाभारत और जीवित्पुत्रिका की लोकमान्यता
जितिया से जुड़ी एक अन्य लोकमान्यता महाभारत के अश्वत्थामा और उत्तरा के पुत्र परीक्षित की कथा से संबंधित बताई जाती है. लोकविश्वास के अनुसार, अश्वत्थामा के ब्रह्मास्त्र से गर्भस्थ परीक्षित के जीवन पर संकट आया था और भगवान कृष्ण ने उनकी रक्षा की. जितिया की कथा-परंपराओं में अलग-अलग क्षेत्रों के अनुसार विभिन्न आख्यान मिलते हैं. इसलिए इन्हें एक ही ऐतिहासिक घटना के रूप में प्रस्तुत करना उचित नहीं है. इन कथाओं का मूल भाव संकट में जीवन की रक्षा और संतान के मंगल से जुड़ता है.
मिथिला में जितिया का अपना रंग
मिथिला में जितिया केवल व्रत नहीं, बल्कि लोकजीवन का उत्सव है. गांवों में महिलाएं कई दिन पहले से इसकी तैयारी करती रही हैं. घर की साफ-सफाई, पूजा की सामग्री जुटाना, पारंपरिक पकवान तैयार करना और परिवार की महिलाओं का एक साथ बैठना, इन सबने जितिया को सामाजिक स्वरूप दिया है. पहले कई गांवों में महिलाएं शाम के समय एक जगह एकत्रित होकर जितिया की कथा सुनती थीं. इसके बाद लोकगीत गाए जाते थे. इन गीतों में मां की ममता के साथ मायके की याद, ससुराल का जीवन, पति-पत्नी के संबंध, संतान के प्रति चिंता और ग्रामीण जीवन की अनेक तस्वीरें दिखाई देती हैं.
जितिया के लोकगीत: महिलाओं का मौखिक इतिहास
मिथिला की महिलाओं ने सदियों तक अपनी भावनाओं को लोकगीतों के माध्यम से सुरक्षित रखा है. जितिया के गीत इसी परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं. इन्हें केवल पूजा के गीत मानना इनके महत्व को सीमित करना होगा. इनमें तत्कालीन समाज की झलक मिलती है. बेटी को मायके की याद कैसे आती थी, संतान के लिए मां की बेचैनी कैसी होती थी और परिवार में रिश्तों की गर्माहट किस तरह व्यक्त होती थी, इन भावनाओं को लोकगीतों ने शब्द दिए. इस अर्थ में जितिया के लोकगीत मिथिला के ग्रामीण समाज के मौखिक इतिहास के दस्तावेज भी हैं.
नहाय-खाय और ओठगन की परंपरा
जितिया की परंपरा में व्रत से पहले की तैयारी का विशेष महत्व है. कई क्षेत्रों में नहाय-खाय से इसकी शुरुआत मानी जाती है. इसके बाद व्रती महिलाएं निर्धारित नियमों के अनुसार उपवास करती हैं. अष्टमी के दिन पूजा-अर्चना, कथा-श्रवण और संतान के मंगल की कामना की जाती है. कई परंपराओं में यह निर्जला व्रत होता है. अगले दिन निर्धारित समय पर पारण के साथ व्रत पूरा किया जाता है. जितिया की विशिष्ट परंपराओं में ओठगन का भी उल्लेख मिलता है. अलग-अलग क्षेत्रों में इसके स्वरूप और समय में भिन्नता दिखाई देती है. लोकपरंपरा के अनुसार, व्रती महिलाएं उपवास शुरू होने से पहले निर्धारित समय पर भोजन करती हैं और इसके बाद व्रत का संकल्प लेती हैं. पूजा-पद्धति, भोजन, प्रसाद और पारण से संबंधित नियम क्षेत्र, समुदाय और परिवार के अनुसार अलग-अलग हो सकते हैं.
पूजा में क्या है आध्यात्मिक भाव?
जितिया की आध्यात्मिकता का केंद्र केवल संतान की लंबी उम्र की प्रार्थना नहीं है. इसके भीतर एक व्यापक संदेश है कि जीवन अमूल्य है और उसकी रक्षा महत्वपूर्ण है. जीमूतवाहन की कथा त्याग और करुणा का संदेश देती है. मां का उपवास समर्पण का प्रतीक बनता है और कथा-श्रवण जीवन तथा धर्म के मूल्यों की याद दिलाता है. इस तरह जितिया में ममता, त्याग और जीवन-संरक्षण के तीन भाव एक साथ दिखाई देते हैं.
प्रकृति और लोकजीवन से संबंध
मिथिला के पारंपरिक पर्व प्रकृति से अलग नहीं हैं. कृषि प्रधान समाज में मौसम, नदी, खेत, पशु-पक्षी और प्राकृतिक संसाधन लोकजीवन का हिस्सा रहे हैं. जितिया के अवसर पर उपयोग होने वाली पूजा सामग्री और स्थानीय रीति-रिवाजों में भी ग्रामीण जीवन की छाप दिखाई देती है. इसी कारण जितिया को केवल मंदिर या घर की पूजा तक सीमित करने के बजाय मिथिला की ग्रामीण संस्कृति के व्यापक संदर्भ में देखना चाहिए.
महिलाओं के सामाजिक संवाद का मंच
जितिया का एक महत्वपूर्ण पक्ष इसका सामुदायिक स्वरूप है. पहले गांवों में महिलाएं सामूहिक रूप से कथा सुनती थीं और गीत गाती थीं. इस सामूहिकता ने उन्हें एक-दूसरे के सुख-दुख से जुड़ने का अवसर दिया. महिलाएं अपने परिवार की चिंता और अनुभव साझा करती थीं. लोकगीतों और कथाओं के माध्यम से सामाजिक अनुभव अगली पीढ़ी तक पहुंचते थे. इस दृष्टि से जितिया ग्रामीण समाज में महिलाओं के सांस्कृतिक संवाद का एक मंच भी रहा है.
मां और संतान के रिश्ते का लोकपर्व
जितिया का केंद्र मातृत्व है. मां अपनी संतान के लिए उपवास करती है, लेकिन इस परंपरा को केवल त्याग के रूप में देखना पर्याप्त नहीं है. इसके भीतर मां की वह इच्छा है कि उसका बच्चा जीवन के हर संकट से सुरक्षित रहे. यही भावना जितिया को भावनात्मक रूप से मजबूत बनाती है. पर्व के दौरान परिवार के अन्य सदस्य भी व्रती महिला की सहायता करते हैं और पारण तक उसकी देखभाल करते हैं.
क्या जितिया केवल पुत्र के लिए है?
परंपरागत नाम जीवित्पुत्रिका में पुत्र का उल्लेख मिलता है, लेकिन सामाजिक जीवन में इस पर्व की भावना समय के साथ व्यापक हुई है. आज अनेक महिलाएं पुत्र और पुत्री दोनों की दीर्घायु और मंगल के लिए व्रत करती हैं. इस बदलाव को परिवार और समाज में बेटियों के प्रति समान भाव की बढ़ती स्वीकृति के संदर्भ में भी देखा जा सकता है.
वैज्ञानिक दृष्टि से क्या कहता है व्रत?
जितिया का धार्मिक आधार आस्था और परंपरा में है. वैज्ञानिक दृष्टि से ऐसा प्रमाणित निष्कर्ष नहीं है कि किसी व्रत के कारण संतान की आयु निश्चित रूप से बढ़ती है. उपवास के स्वास्थ्य संबंधी प्रभाव व्यक्ति की उम्र, स्वास्थ्य, मौसम और शारीरिक स्थिति पर निर्भर करते हैं. विशेषकर निर्जला उपवास में शरीर में पानी की कमी का जोखिम हो सकता है. इसलिए गर्भवती महिलाओं, बीमार लोगों या किसी चिकित्सकीय स्थिति वाले व्यक्ति को उपवास का निर्णय डॉक्टर की सलाह के अनुरूप लेना चाहिए. यह सावधानी धार्मिक आस्था को कम नहीं करती, बल्कि परंपरा और स्वास्थ्य के बीच संतुलन की आवश्यकता बताती है.
बदलते समय में बदलता जितिया
मोबाइल फोन, सोशल मीडिया और बदलती जीवनशैली ने जितिया के स्वरूप को भी प्रभावित किया है. पहले जहां कथा और लोकगीत गांव के चौपाल या आंगन में सामूहिक रूप से होते थे, वहीं अब कई जगह डिजिटल माध्यमों से भी इन्हें साझा किया जाता है. इसके बावजूद पर्व की मूल भावना बनी हुई है. आज भी मां अपनी संतान के लिए प्रार्थना करती है, परिवार साथ आता है और नई पीढ़ी इस परंपरा को देखती-सुनती है. यही किसी लोकपर्व की शक्ति है कि वह समय के साथ अपना स्वरूप बदलते हुए भी अपनी मूल संवेदना को बचाए रखता है.
मिथिला की सांस्कृतिक पहचान में जितिया
मिथिला में जितिया को केवल धार्मिक कैलेंडर की एक तिथि मानना इसके व्यापक सांस्कृतिक महत्व को छोटा करना होगा. इसमें मैथिली भाषा, लोकगीत, स्त्री की भावनाएं, परिवार, गांव, प्रकृति, पौराणिक कथाएं और पीढ़ियों से चली आ रही स्मृतियां शामिल हैं. समस्तीपुर के कलाकार कुंदन राय की पेंटिंग भी इसी सांस्कृतिक भाव को रंगों के माध्यम से सामने लाती है.
व्रत से आगे जीवन-दर्शन
जितिया की खूबसूरती यह है कि इसमें एक मां की व्यक्तिगत प्रार्थना सामूहिक लोकविश्वास का रूप ले लेती है. जीमूतवाहन की कथा त्याग का संदेश देती है. मां का संकल्प ममता को व्यक्त करता है. लोकगीत समाज की स्मृति को सुरक्षित रखते हैं और सामूहिक पूजा परंपरा को अगली पीढ़ी तक पहुंचाती है. इसलिए जितिया केवल संतान की दीर्घायु के लिए रखा जाने वाला व्रत नहीं, बल्कि जीवन के प्रति सम्मान, मातृत्व की संवेदना और मिथिला की लोकसंस्कृति की निरंतरता का पर्व भी है. मिथिला की धरती पर जब जितिया के लोकगीत गूंजते हैं, तो उनमें पूजा की आवाज के साथ पीढ़ियों से चली आ रही माताओं की प्रार्थना, बेटियों की स्मृतियां, परिवार की चिंता और जीवन के प्रति अटूट आस्था भी सुनाई देती है.