1 मन में 40 नहीं 64 किलो, मखाना की ‘गुड़िया’ का ये कैसा हिसाब? जानिए पूरा गणित
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Makhana Measurement Tips: क्या आप जानते हैं मखाना गुड़िया की माप अन्य फसलों से अलग होती है? आमतौर पर 1 मन 40 किलो के बराबर होता है. लेकिन मखाना गुड़िया के लिए यह माप 64 किलो प्रति मन होती है. ऐसा क्यों होता है. जानिए पूरा गणित.
पूर्णिया: आमतौर पर जब 1 मन की बात होती है तो ज्यादातर लोगों के दिमाग में 40 किलो का हिसाब आता है. लेकिन मखाना की खेती से जुड़ी एक ऐसी मापी है. जो इस आम धारणा से बिल्कुल अलग है. बिहार के पूर्णिया में मखाना की कच्ची ‘गुड़िया’ की खरीद-बिक्री में 64 किलो को एक मन माना जाता है. आखिर ऐसा क्यों होता है? किसानों व मजदूरों के भुगतान का हिसाब कैसे तय होता है? इसके पीछे मखाना की कच्ची उपज और उसमें मौजूद पानी का वजन अहम वजह बताया जाता है. जानिए इसका पूरा गणित.
क्या कहते हैं अनुभवी किसान?
पूर्णिया के हरदा इलाके के ठाड़ा गांव के अनुभवी मखाना किसान विजय कुमार सिंह बताते हैं कि मखाना की खेती से लेकर इसकी गुड़िया की बिक्री तक कई प्रक्रियाएं सामान्य फसलों से अलग होती हैं. खेत या पानी से निकली मखाना की गुड़िया को किसान सीधे तैयार मखाना के रूप में बाजार में नहीं बेचते. पहले इसे स्थानीय व्यापारियों को दिया जाता है. इसके बाद कई प्रक्रियाओं से गुजरकर इसी कच्चे माल से मखाना का लावा तैयार होता है, जिसकी देश ही नहीं बल्कि विदेशों में भी मांग है.
40 किलो नहीं, 64 किलो क्यों?
विजय कुमार सिंह के मुताबिक मखाना की गुड़िया की मापी में 40 किलो को एक मन नहीं माना जाता. यहां 64 किलो गुड़िया को एक मन के हिसाब से गिना जाता है. इसकी वजह मखाना की गुड़िया का कच्चा और पानी से जुड़ा होना बताया जाता है. गुड़िया पानी में पड़ी रहती है. जब उसे निकाला जाता है तो उसके वजन में पानी का हिस्सा भी शामिल होता है. ऐसे में शुरुआती वजन सामान्य सूखी उपज की तरह नहीं माना जाता. खरीद-बिक्री के हिसाब में पानी के वजन को ध्यान में रखकर वास्तविक माल का मूल्य तय किया जाता है.
मजदूरों की मजदूरी का भी अलग हिसाब
मखाना की गुड़िया निकालने वाले मजदूरों के काम में भी वजन का अलग कैलकुलेशन देखने को मिलता है. किसान के मुताबिक मजदूरों के भुगतान में भी गुड़िया के वजन और पानी के हिस्से को ध्यान में रखा जाता है. 12.5 किलो गुड़िया निकालने पर 5 किलो के हिसाब से मजदूरी का भुगतान किए जाने की बात बताई गई है. यानी मखाना की खेती सिर्फ खेती की तकनीक के मामले में ही अलग नहीं है, बल्कि इसकी कच्ची उपज की मापी और मजदूरी का हिसाब भी दूसरी फसलों से अलग है.
पानी के अंदर तैयार होता है ‘व्हाइट गोल्ड’
मखाना को बिहार का ‘व्हाइट गोल्ड’ भी कहा जाता है. इसकी खेती का बड़ा हिस्सा पानी वाले क्षेत्रों में होता है. पानी के अंदर से मखाना की गुड़िया निकालना मेहनत वाला काम है. इसके बाद गुड़िया को व्यापारियों तक पहुंचाया जाता है. कई चरणों की प्रोसेसिंग के बाद इससे सफेद और कुरकुरा मखाना तैयार होता है. पूर्णिया और आसपास के इलाकों में मखाना की खेती किसानों की आय का महत्वपूर्ण जरिया बन रही है.