टाटा ग्रुप में टाटा संस की लिस्टिंग को लेकर शुरू हुआ विवाद अब टाटा ट्रस्ट्स के कामकाज और ट्रस्टियों की नियुक्ति तक पहुंच गया है. सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट के ट्रस्टी वेणु श्रीनिवासन ने महाराष्ट्र के चैरिटी कमिश्नर को चिट्ठी लिखकर ट्रस्ट के प्रशासन और कामकाज की जांच कराने की मांग की है. उन्होंने नोएल टाटा की स्थायी ट्रस्टी के रूप में नियुक्ति, उनके चेयरमैन बनने के आधार और उनके बेटे नेविल टाटा को ट्रस्टी बनाए जाने की प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं.
वेणु श्रीनिवासन ने अपनी शिकायत में तीन प्रमुख मुद्दे उठाए हैं. पहला, नोएल टाटा को स्थायी ट्रस्टी बनाने और टाटा ट्रस्ट्स का चेयरमैन बनाए जाने का आधार क्या है. दूसरा, नवंबर 2025 में नेविल टाटा को ट्रस्टी नियुक्त करने की प्रक्रिया में उन्हें शामिल क्यों नहीं किया गया. तीसरा, टाटा ट्रस्ट्स की ओर से टाटा संस के कारोबारी फैसलों में भूमिका निभाने का औचित्य क्या है.
श्रीनिवासन ने चैरिटी कमिश्नर से यह भी मांग की है कि जांच पूरी होने तक नोएल टाटा कुछ खास फैसलों से खुद को अलग रखें. इनमें टाटा संस की आम बैठकों के लिए प्रतिनिधि नामित करना और कंपनी के बोर्ड में आर्टिकल 121 से जुड़े मामलों पर वोट करना शामिल है. उन्होंने जांच पूरी होने तक ट्रस्ट की बैठकें, सर्कुलर प्रस्ताव और बोर्ड में बदलाव रोकने की मांग भी की है.
टाटा संस की लिस्टिंग पर कैसे बढ़ा विवाद?
इस विवाद की अहम कड़ी 16 सितंबर 2026 को सामने आई थी. उस दिन सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट ने एक प्रस्ताव जारी किया, जिसमें टाटा संस की प्रस्तावित लिस्टिंग पर श्रीनिवासन को वोट देने से रोकने की कोशिश की गई. श्रीनिवासन टाटा संस के बोर्ड में सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट और सर रतन टाटा ट्रस्ट के संयुक्त नामित निदेशक हैं.
हालांकि, उन्होंने 17 सितंबर को हुई बोर्ड बैठक में लिस्टिंग के पक्ष में वोट दिया. नोएल टाटा इस प्रस्ताव के विरोध में वोट देने वाले इकलौते निदेशक थे. अगले दिन टाटा ट्रस्ट्स ने कहा कि टाटा संस को शेयर बाजार में सूचीबद्ध करने के बजाय दूसरे विकल्पों पर विचार किया जाना चाहिए. यह मामला भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के 11 सितंबर के संवाद के बाद और अहम हो गया.
SP ग्रुप को राहत देने के प्रस्ताव पर भी सवाल
17 सितंबर को नोएल टाटा ने टाटा संस के बोर्ड के सामने शापूरजी पालोनजी (SP) ग्रुप को लिक्विडिटी उपलब्ध कराने का प्रस्ताव रखा था. इसमें दो चरणों में हिस्सेदारी खरीदने और नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) के जरिए चुनिंदा पूंजी में कटौती जैसे विकल्प शामिल हैं.
श्रीनिवासन का तर्क है कि इस तरह के प्रस्तावों में ट्रस्ट की भूमिका उसके धर्मार्थ उद्देश्यों और कानूनी जिम्मेदारियों के अनुरूप होनी चाहिए. उन्होंने ट्रस्ट की व्यावसायिक गतिविधियों से जुड़े संभावित कर परिणामों का मुद्दा भी उठाया है. हालांकि, ये उनकी शिकायत में उठाए गए सवाल हैं; इन्हें किसी नियामक या अदालत की ओर से स्थापित उल्लंघन नहीं माना जा सकता.
पहले भी चैरिटी कमिश्नर तक पहुंचा था मामला
टाटा ट्रस्ट्स में स्थायी ट्रस्टियों की नियुक्ति का विवाद पहले भी महाराष्ट्र के चैरिटी कमिश्नर तक पहुंच चुका है. अप्रैल 2026 में सर रतन टाटा ट्रस्ट के बोर्ड में स्थायी ट्रस्टियों की संख्या को लेकर शिकायत दर्ज कराई गई थी. इसके बाद मई में चैरिटी कमिश्नर ने सर रतन टाटा ट्रस्ट को बैठक करने और फैसले लेने से रोकने का आदेश दिया था. टाटा ट्रस्ट्स का पक्ष रहा है कि कानून में बदलाव भविष्य में होने वाली नियुक्तियों पर लागू होता है, पहले से नियुक्त स्थायी ट्रस्टियों पर नहीं.
अब सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट ने क्या कदम उठाया?
वेणु श्रीनिवासन की शिकायत के बाद सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट ने महाराष्ट्र के चैरिटी कमिश्नर के समक्ष कैविएट दाखिल करने की पहल की है. इसका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि श्रीनिवासन की शिकायत पर कोई आदेश जारी करने से पहले ट्रस्ट को भी अपना पक्ष रखने का अवसर मिले. इस पूरे विवाद का असर सिर्फ ट्रस्टियों की नियुक्ति तक सीमित नहीं है. टाटा संस की लिस्टिंग, उसके बोर्ड के फैसले और टाटा ट्रस्ट्स की भूमिका जैसे मुद्दे भी इससे जुड़े हैं. अब चैरिटी कमिश्नर की जांच और आगे की कार्रवाई पर नजर रहेगी.