Pitru Paksha 2026 Tarpana Vidhi: पितृ पक्ष का प्रारंभ हो चुका है, जो 10 अक्टूबर को सर्व पितृ अमावस्या तक चलेगा. पितृ पक्ष की 15 तिथियों में अपने पूर्वजों के लिए तर्पण और श्राद्ध करते हैं. इससे पितृ दोष नहीं लगता है. जो लोग पितरों के लिए तर्पण, श्राद्ध या पिंडदान नहीं करते हैं, उनको कई प्रकार के कष्टों का सामना करना पड़ता है. लेकिन जो लोग तर्पण करते हैं, वे भी सही विधि का पालन नहीं करते हैं तो उसका कोई लाभ नहीं है क्योंकि तर्पण का जल पितरों को प्राप्त होना चाहिए, नहीं तो वे अतृप्त ही रहेंगे. मान्यता है कि कुशा की मदद से ही पितरों के लिए तर्पण करना चाहिए, नहीं तो वो जल अन्य आत्माएं ग्रहण कर लेती हैं. वो पितरों को प्राप्त नहीं होता है. इससे आपके पितर नाराज होंगे और श्राप दे देंगे. आइए जानते है पितरों के तर्पण की सही विधि और समय.
तर्पण का सही समय
पितृ पक्ष में आपको पितरों के लिए तर्पण कुतुप मुहूर्त या फिर रौहिण मुहूर्त में करना चाहिए. कुतुप मुहूर्त दिन में करीब 11:45 ए एम से 12:33 पी एम तक होगा, वहीं रौहिण मुहूर्त दोपहर 12:33 पी एम से 01:20 पी एम तक होगा.
भगवान विष्णु के रोम से बना कुशा, इस वजह से देते हैं तर्पण
जब आप पितरों के लिए तर्पण करते हैं तो कुशा के अग्र भाग से जल अर्पित करते हैं. ऐसे जल अर्पित करने से तर्पण का जल पितरों को प्राप्त होता है, जिसे पाकर वे तृप्त और संतुष्ट होते हैं.
मत्स्य पुराण और गरुड़ पुराण की मान्यताओं के अनुसार कुशा की उत्पत्ति भगवान विष्णु के रोम से हुआ है. इसे भगवान विष्णु का प्रतीक माना जाता है. वराह अवतार में जब भगवान विष्णु पृथ्वी का उद्धार कर रहे थे तब उनके शरीर से रोम धरती पर गिरे, जिससे कुशा की उत्पत्ति हुई. नारायण की कृपा से ही मोक्ष मिल सकता है, इसलिए विष्णु जी के प्रतीक के रूप में कुशा को उपयोग करते हैं, ताकि उससे प्राप्त जल पितरों को मुक्ति प्रदान करे.
एक अन्य मान्यता है कि भगवान विष्णु के वाहन गरुड़ जब स्वर्ग से अमृत कलश लेकर आए, तो उन्होंने कुशा पर ही कुछ समय के लिए अमृत कलश रखा था. इस वजह से कुशा अत्यंत पवित्र और दिव्य हो गया.
तर्पण विधि
सबसे पहले हाथ में कुशा, जौ, अक्षत् और जल लेकर संकल्प करते हैं. उसके बाद तांबे के लोटे में जल और अक्षत् डालें. कुशा को आगे रखकर उस लोटे को दाएं हाथ में लेकर बाएं हाथ से ढंक लें.
सबसे पहले देवों का तर्पण करें. इसमें पूर्व दिशा की ओर मुख करके दाहिना घुटना जमीन पर लगा कर बैठ जाएं. अर्घ्य वाले पात्र में अक्षत् छोड़ें. फिर कुशा को आगे रखें और दाएं हाथ की अंगुलियों के आगे वाले हिस्से से जल छोड़ें. उस जल को तांबे या कांसे के बर्तन में रखें.
इसके बाद ऋषि तर्पण करें. जिसमें मरीचि आदि ऋषियों का तर्पण भी देवों की तरह ही करते हैं. फिर दिव्य मनुष्य तर्पण करें. इसमें आप उत्तर की ओर मुख कर लें. सीधा बैठें और घुटना जमीन पर न लगाएं. अर्घ्य पात्र में जौ छोड़ें. फिर कुशा को आगे रखें यानि कुशा को दाहिने हाथ की सबसे छोटी अंगुली के मूल भाग में रखें. यहीं से दो दो अंजलि जल दें.
अब अंत में पितरों का तर्पण करें. आप दक्षिण दिशा की ओर मुख करें और बायां घुटना जमीन लगाकर बैठ जाएं. अर्घ्य वाले बर्तन में काले तिल छोड़ें. कुशा के आगे वाले भाग को अंगूठे और तर्जनी अंगुली के बीच रखें. वहीं से 3-3 अंजलि जल पितरों को अर्पित करें.
तर्पण देने के बाद अपने पितरों से प्रार्थना करें कि वे तृप्त और संतुष्ट होकर आशीर्वाद दें, ताकि परिवार की उन्नति हो. वंश की वृद्धि हो और घर में समृद्धि एवं उन्नति आए.
तर्पण क्यों करते हैं?
पौराणिक मान्यता के अनुसार, पितृ लोक में पानी की कमी रहती है, इसलिए पितरों को जल की आवश्यकता पड़ती है. जब हम तर्पण करते हैं तो उस जल को पाकर पितर अत्यंत प्रसन्न होते हैं और आशीर्वाद देते हैं.