Are Chinese Schools Dropping English?: चीन के कई स्कूल-कॉलेज में बंद हो गई English Class, क्या एआई के चक्कर में बदल रहे पढ़ाई के मायने?

Are Chinese Schools Dropping English?: चीन के कई स्कूल-कॉलेज में बंद हो गई English Class, क्या एआई के चक्कर में बदल रहे पढ़ाई के मायने?


नई दिल्ली (Are Chinese Schools Dropping English?). स्कूल डेज याद करते ही व्याकरण के भारी-भरकम नियम और अंग्रेजी की स्पेलिंग्स दिमाग में ताजा हो जाती हैं. भारत की ही तरह चीन के एजुकेशन सिस्टम में भी अंग्रेजी अहम और अनिवार्य हिस्सा रही है. अंग्रेजी में फर्राटेदार होने से बच्चे का ग्लोबल करियर में भविष्य ठीक माना जाता है. लेकिन वक्त तेजी से बदल रहा है और चीन के स्कूलों में अजीब सी खामोशी के साथ-साथ सुगबुगाहट भी तेज हो गई है.

AI और रियल-टाइम ट्रांसलेशन टूल्स के दौर में एक सवाल उठ रहा है. क्या कंप्यूटर के एक क्लिक पर भाषाएं बदलने वाले जमाने में बच्चों पर अंग्रेजी का बोझ लादना जरूरी है? चीन के बड़े-बड़े शिक्षाविदों, पॉलिसी मेकर और यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर्स के बीच इस पर तीखी बहस छिड़ चुकी है. टेक क्रांति ने इंसानी भाषा की दूरियां मिटा दी हैं. अब चीन अपनी प्राचीन संस्कृति और घरेलू तकनीकी शिक्षा को मजबूत करने पर ज्यादा जोर दे रहा है. चीन के कई स्कूल-यूनिवर्सिटी ने अंग्रेजी के कोर्स के घंटों में कटौती शुरू कर दी है.

अंग्रेजी भाषा कम करके चीन क्या करेगा?

स्कूल-कॉलेज में अंग्रेजी की जगह लोकल इतिहास, कला और आधुनिक तकनीकी विषयों को सिलेबस का मुख्य हिस्सा बनाया जा रहा है. जानकारों का मानना है कि यह सिर्फ किसी भाषा को हटाने का फैसला नहीं है, बल्कि ग्लोबल एजुकेशन और राष्ट्रवाद के बीच चल रहे विचारों के बड़े बदलाव का उदाहरण है. जानिए आखिर चीन के स्कूलों में ‘लैंग्वेज शिफ्ट’ के पीछे की असल कहानी क्या है और यह भविष्य के स्टूडेंट्स को कैसे प्रभावित करने वाली है.

AI ट्रांसलेशन का दौर: क्या अब भाषा सीखने के मायने बदल गए हैं?

जेब में रखा एआई गैजेट चुटकियों में विदेशी भाषा का अनुवाद कर सकता है. फिर रटने की क्या जरूरत? टेक्नोलॉजी ने दुनिया की तस्वीर बदल दी है. जब हाथों में मौजूद स्मार्टफोन या ईयरबड कुछ ही सेकंड में किसी भी विदेशी भाषा को मातृभाषा में ट्रांसलेट कर सकता है तो सालों तक ग्रामर के नियम रटने का क्या मतलब है? चीन में टेक एक्सपर्ट्स का बड़ा वर्ग दलील दे रहा है कि भविष्य में कम्युनिकेशन की दीवारें एआई तकनीक खुद-ब-खुद गिरा देगी. इसीलिए स्टूडेंट्स अब कठिन विदेशी भाषाओं में माथापच्ची करने के बजाय कोडिंग, डेटा साइंस और मशीन लर्निंग जैसे विषयों पर ज्यादा फोकस कर रहे हैं.

चीनी स्कूल-यूनिवर्सिटी में अंग्रेजी के घटते घंटे

चीन के कई स्कूलों और विश्वविद्यालयों में अंग्रेजी के अनिवार्य क्रेडिट आवर्स को कम किया जाने लगा है. जहां पहले अंग्रेजी को मैथ और साइंस के बराबर का दर्जा मिलता था, वहीं अब कई जगहों पर इसे ऑप्शनल या कम वेटेज वाला विषय बना दिया गया है. इसकी जगह पर चीनी इतिहास, दर्शन, नैतिकता और प्रैक्टिकल टेक्निकल एजुकेशन को प्राथमिकता दी जा रही है. सरकार का मानना है कि छात्रों को अपनी कल्चरल वैल्यूज से जुड़कर रहना चाहिए. उन्हें वेस्ट के इम्पैक्ट से निकलकर घरेलू प्रतिभाएं निखारनी चाहिए.

शिक्षाविदों की राय: कुछ मानते हैं जरूरी, कुछ बता रहे गुलामी की निशानी

इस बदलाव को लेकर चीन का शैक्षणिक समुदाय दो हिस्सों में बंट गया है. एक ग्रुप का कहना है कि अगर चीन को दुनिया की महाशक्ति बने रहना है तो ग्लोबल बिजनेस और रिसर्च के लिए अंग्रेजी पर मजबूत पकड़ होना बेहद जरूरी है. इसके बिना इंटरनेशनल मंचों पर संवाद कमजोर पड़ सकता है. वहीं, दूसरा ग्रुप इसे वेस्टर्न कल्चर और ‘मानसिक गुलामी’ से जोड़कर देखता है. उनका तर्क है कि जब पश्चिमी देश अपनी भाषा में रिसर्च कर सकते हैं तो चीन भी अपनी मजबूत इकोनॉमी और टेक्नोलॉजी के दम पर दुनिया को अपनी भाषा अपनाने पर मजबूर कर सकता है.

भारत vs चीन का एजुकेशन सिस्टम

यह ट्रेंड भारत के बिलकुल उलट है. भारत में आज भी अंग्रेजी को करियर की सीढ़ी और मॉडर्निटी का सबसे बड़ा पैमाना माना जाता है. भारत के आईटी सेक्टर, एमएनसी और हायर एजुकेशन में अंग्रेजी सफलता का सबसे बड़ा शॉर्टकट है. इसके उलट, चीन ने अपनी मजबूत डोमेस्टिक कंपनियों (जैसे अलीबाबा, हुआवेई और टेनसेंट) के दम पर साबित कर दिया है कि तरक्की के लिए सिर्फ अंग्रेजी की बैसाखी जरूरी नहीं है. चीन का यह मॉडल अब कई डेवलपिंग देशों के लिए भी अध्ययन का नया विषय बन चुका है.

भविष्य के क्लासरूम: टेक्निकल स्किल्स बनेंगी नई ग्लोबल भाषा

चीन के स्कूलों में चल रही हलचल से इशारा मिलता है कि आने वाले समय में ‘ग्लोबल लैंग्वेज’ के मायने बदल जाएंगे. भविष्य में शायद किसी इंसान को दूसरी भाषा सीखने के लिए दशकों मेहनत न करनी पड़े. एआई टेक्नोलॉजी यह काम पलक झपकते ही कर देगी. ऐसे में स्टूडेंट्स के लिए असली ताकत उनकी भाषाई दक्षता नहीं, बल्कि प्रॉब्लम सॉल्विंग स्किल्स और तकनीकी ज्ञान होगा. चीन का यह कदम भविष्य के एजुकेशन सिस्टम की नई इबारत लिख रहा है, जिस पर पूरी दुनिया की निगाहें टिकी हुई हैं.



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