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रामपुर का पारंपरिक चाकू सिर्फ एक औजार नहीं, बल्कि नवाबी दौर की कारीगरी और विरासत की पहचान माना जाता है. चाकू कारोबारी शहजाद आलम बताते हैं कि इसे आज भी हाथों से तैयार किया जाता है और इसका बटन वाला मैकेनिज्म इसे खास बनाता है.
रामपुर: चाकू तो आपने कई तरह के देखे होंगे, लेकिन रामपुर का एक पारंपरिक चाकू ऐसा है जिसकी कहानी सीधे नवाबी दौर से जुड़ी है. कभी यही चाकू नवाबों के दरबार तक पहुंचता था और उनकी फौज में भी इस्तेमाल किया जाता था. समय के साथ बाजार और तकनीक बदल गए, लेकिन रामपुर में इसकी पुरानी कारीगरी आज भी जिंदा है. खास बात यह है कि इसे अब भी कारीगर अपने हाथों से तैयार करते हैं.
लोकल 18 से बातचीत में चाकू कारोबारी शहजाद आलम ने बताया कि रामपुर के इस खास चाकू की अपनी अलग पहचान है. उनके मुताबिक, दुनिया में इसी अंदाज का चाकू न तो कहीं और तैयार होता है और न ही उसी तरह बिकता है. यही वजह है कि इसे रामपुर की पुरानी कारीगरी और विरासत की खास निशानी माना जाता है.
शहजाद आलम के मुताबिक, नवाबी दौर में यहां के कारीगर चाकू बनाकर नवाबों के दरबार में पेश करते थे. इसकी बनावट और कारीगरी को खास पसंद किया जाता था. बताया जाता है कि नवाबों की फौज में भी इसका इस्तेमाल हथियार के तौर पर होता था. इसी वजह से रामपुर का यह चाकू आम चाकुओं से अलग पहचान रखता है.
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आज बाजार में ज्यादातर सामान मशीनों से तैयार होता है, लेकिन रामपुर का यह चाकू अब भी हाथों से बनाया जाता है. कारीगर इसके अलग-अलग हिस्से तैयार करके उन्हें जोड़ते हैं और फिर चाकू का अंतिम रूप देते हैं. यही बारीक कारीगरी इसे मशीन से बने सामान्य चाकुओं से अलग बनाती है.इस चाकू की सबसे खास बात इसका मैकेनिज्म है. इसमें ब्लेड अंदर की तरफ बंद रहता है और बटन दबाते ही बाहर आ जाता है.
हालांकि बाजार में ऐसे कई चाकू मिलते हैं, लेकिन शहजाद आलम के अनुसार रामपुर के पारंपरिक चाकू की पहचान उसका पुराना डिजाइन और हाथ से तैयार करने का तरीका है. कारीगरों के अनुसार, इस चाकू को बनाने में ऐसी सामग्री का इस्तेमाल किया जाता है, जिस पर आसानी से जंग नहीं लगती. शहजाद आलम बताते हैं कि सही देखभाल करने पर यह लंबे समय तक मजबूत रहता है और इसका रंग भी जल्दी नहीं उतरता. रामपुर की चाकू कारीगरी सिर्फ इस पारंपरिक चाकू तक सीमित नहीं है. यहां दुनिया का सबसे बड़ा चाकू भी मौजूद है, जो इस पुराने हुनर को अलग पहचान देता है. नवाबों के दौर से चली आ रही यह कारीगरी आज भी रामपुर के कारीगरों के हाथों में जिंदा है.