न रंग, न महंगे सामान… गोबर से बनती है खूबसूरत सांझी, श्राद्ध पक्ष में ऐसे निभाई जाती है मेवाड़ की परंपरा

न रंग, न महंगे सामान… गोबर से बनती है खूबसूरत सांझी, श्राद्ध पक्ष में ऐसे निभाई जाती है मेवाड़ की परंपरा


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Udaipur Hindi News: आज के समय में जब घरों की सजावट का तरीका बदल गया है और बाजार में हर तरह की सजावटी चीजें आसानी से मिल जाती हैं, ऐसे में गोबर से सांझी बनाना अपने आप में मेवाड़ की पुरानी संस्कृति को संभालने जैसा है.कई जगहों पर नई पीढ़ी भी बुजुर्गों से इसे बनाने का तरीका सीख रही है.

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उदयपुर: मेवाड़ में त्योहार और परंपराएं सिर्फ पूजा-पाठ तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यहां की लोककला और घर-आंगन से भी जुड़ी हुई हैं. ऐसी ही एक पुरानी परंपरा है सांझी बनाने की, जो श्राद्ध पक्ष के दिनों में देखने को मिलती है. इस दौरान महिलाएं और बेटियां घर की दीवार या आंगन में गोबर से सांझी तैयार करती हैं और उसे अलग-अलग तरह के प्राकृतिक रंगों और सजावटी चीजों से सजाती हैं.

सांझी बनाने के लिए सबसे पहले गोबर से दीवार या जमीन पर एक आधार तैयार किया जाता है. इसके बाद उस पर अलग-अलग आकृतियां बनाई जाती हैं. कहीं फूल-पत्तियों की डिजाइन दिखाई देती है तो कहीं देवी-देवताओं और पारंपरिक प्रतीकों को जगह दी जाती है. इसे सजाने के लिए फूल, पत्तियां, अनाज और आसपास आसानी से मिलने वाली प्राकृतिक चीजों का इस्तेमाल भी किया जाता है.

परिवार के लोगों को एक साथ जोड़ने वाली परंपरा
मेवाड़ की इस परंपरा की खास बात यह है कि इसमें बाजार से महंगी सजावट की चीजें लाने की जरूरत नहीं होती.घर में उपलब्ध साधारण चीजों से ही सांझी को खूबसूरत रूप दिया जाता है. यही वजह है कि यह परंपरा गांवों और पुराने परिवारों में आज भी अपनी अलग पहचान बनाए हुए है. पहले के समय में सांझी बनाना बच्चों और महिलाओं के लिए रोजाना की एक खास गतिविधि हुआ करती थी. शाम के समय परिवार की महिलाएं और बच्चे मिलकर सांझी तैयार करते थे. इसके साथ लोकगीत भी गाए जाते थे. इस तरह सांझी सिर्फ एक सजावट नहीं, बल्कि परिवार के लोगों को एक साथ जोड़ने वाली परंपरा भी रही है.

हमारी संस्कृति को आगे बढ़ाते आ रहे
आज के समय में जब घरों की सजावट का तरीका बदल गया है और बाजार में हर तरह की सजावटी चीजें आसानी से मिल जाती हैं, ऐसे में गोबर से सांझी बनाना अपने आप में मेवाड़ की पुरानी संस्कृति को संभालने जैसा है.कई जगहों पर नई पीढ़ी भी बुजुर्गों से इसे बनाने का तरीका सीख रही है. मेवाड़ की सांझी हमें यह बताती है कि हमारी लोकपरंपराओं की खूबसूरती हमेशा महंगी चीजों में नहीं, बल्कि मिट्टी, गोबर, फूल-पत्तियों और परिवार के साथ मिलकर बनाए गए उन छोटे-छोटे रंगों में छिपी होती है, जो पीढ़ियों से हमारी संस्कृति को आगे बढ़ाते आ रहे हैं.



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