Tips: केले की खेती में सिर्फ नाइट्रोजन काफी नहीं, पोटाश की कमी से 40% तक नुकसान संभव, ऐसे करें बचाव

Tips: केले की खेती में सिर्फ नाइट्रोजन काफी नहीं, पोटाश की कमी से 40% तक नुकसान संभव, ऐसे करें बचाव


Last Updated:

Banana Cultivation Tips: केले की खेती में पोटाश की कमी से 40% तक पैदावार घट सकती है. डॉ. एस.के. सिंह के अनुसार, संतुलित N:P:K प्रबंधन महत्वपूर्ण है. पोटाश की कमी से पत्तियों का पीला पड़ना, वृद्धि रुकना जैसे लक्षण दिखते हैं. मिट्टी की जांच से सही पहचान कर प्रबंधन करना जरूरी है.

दरभंगा: मिथिलांचल में बड़े पैमाने पर केले की खेती होती है. अच्छी पैदावार के लिए किसान नाइट्रोजन पर अधिक ध्यान देते हैं. लेकिन पोटाश को नजरअंदाज करना भारी पड़ सकता है. पोटाश की कमी से केले के पौधे की वृद्धि प्रभावित होने के साथ फल और गुच्छे की गुणवत्ता पर भी असर पड़ सकता है. पौधा रोग एवं सूत्रकृमि विभाग, डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय के प्रोफेसर (डॉ.) एस.के. सिंह के अनुसार केले की बेहतर पैदावार के लिए नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश (N:P) का संतुलित प्रबंधन जरूरी है. भारत में करीब 9.48 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में केले की खेती होती है. लगभग 377 लाख टन उत्पादन होता है.

पोटाश की कमी क्यों होती है?
डॉ. सिंह के अनुसार एक ही खेत में लगातार केले की खेती, जैविक खाद की कमी, रेतीली मिट्टी और अधिक बारिश के कारण पोषक तत्वों के बह जाने से पोटाश की कमी हो सकती है. केले की फसल में पोटाश की जरूरत अधिक होती है. इसलिए इसकी कमी का सीधा असर पौधे की वृद्धि और उत्पादन पर पड़ सकता है.

इन लक्षणों से करें पहचान
पोटाश की कमी के शुरुआती लक्षण पुरानी पत्तियों में दिखाई देते हैं. पत्तियों के किनारों पर पहले पीलापन आता है. बाद में भूरापन दिखाई देने लगता है. धीरे-धीरे पत्तियों के किनारे सूखने लगते हैं. इसके अलावा पौधे की वृद्धि रुकना, तना कमजोर होना, पत्तियों का मुड़ना और गुच्छे का छोटा रह जाना भी इसके संकेत हो सकते हैं. हालांकि, केवल लक्षण देखकर पोटाश की कमी की पुष्टि नहीं की जा सकती. इसके लिए मिट्टी की जांच सबसे जरूरी है.

40% तक नुकसान संभव?
डॉ. सिंह के अनुसार हर खेत में पोटाश की कमी से 40 फीसदी नुकसान हो, यह जरूरी नहीं है. नुकसान कमी की गंभीरता, मिट्टी की स्थिति और फसल प्रबंधन पर निर्भर करता है. गंभीर कमी की स्थिति में उपज में बड़ी गिरावट हो सकती है. इसलिए समय रहते इसकी पहचान और सुधार जरूरी है.

किसान कैसे करें प्रबंधन?
किसानों को बिना मिट्टी जांच के अंधाधुंध MOP या अन्य पोटाश उर्वरक नहीं डालना चाहिए. जरूरत के अनुसार पोटाश की मात्रा तय कर इसे विभाजित खुराक में देना बेहतर हो सकता है. ड्रिप सिंचाई वाले खेतों में विशेषज्ञ की सलाह से फर्टिगेशन किया जा सकता है. इसके अलावा गोबर की सड़ी खाद और कम्पोस्ट का इस्तेमाल मिट्टी की गुणवत्ता बनाए रखने में मदद करता है. पत्तियों पर पोटाश का छिड़काव करते समय भी सावधानी जरूरी है. क्योंकि अधिक सांद्रता से पत्तियां झुलस सकती हैं. डॉ. सिंह के अनुसार केले में पानी और पोटाश दोनों का संतुलित प्रबंधन जरूरी है. किसानों को लक्षण दिखने का इंतजार करने के बजाय मिट्टी की जांच कराकर समय पर पोषक तत्वों का प्रबंधन करना चाहिए.



Source link