उत्तराखंड कैडर के एक अधिकारी हैं. IFS ऑफिसर यानी भारतीय वन सेवा अधिकारी संजीव चतुर्वेदी. पुरस्कार विजेता यह अधिकारी चर्चा में इसलिए रहते हैं कि इनसे जुड़े कानूनी केस की सुनवाई से जज खुद को अलग कर लेते हैं. इनके कानूनी मामलों से जजों के खुद को अलग करने का सिलसिला लगातार जारी है और संख्या 17 तक पहुंच चुकी है. यहां इसकी चर्चा इसलिए हो रही है कि हाल ही में केंद्रीय प्रशासनिक ट्रिब्यूनल (CAT) की दिल्ली बेंच के जूडिशल मेंबर राजवीर सिंह वर्मा ने खुद को संजीव चतुर्वेदी की याचिका पर सुनवाई से अलग कर लिया. इसके साथ ही साल 2013 से लेकर अब तक सुप्रीम कोर्ट, हाई कोर्ट और CAT के कुल 17 जज और जूडिशल ऑफिसर चतुर्वेदी से जुड़े मामलों की सुनवाई से हटने का फैसला कर चुके हैं. आखिर ऐसा क्यों है? इसकी वजह क्या है?
कौन हैं IFS संजीव चतुर्वेदी?
संजीव चतुर्वेदी 2002 बैच के उत्तराखंड कैडर के इंडियन फॉरेस्ट ऑफिसर अधिकारी हैं. वह एक निडर व्हिसल ब्लोअर और भ्रष्टाचार विरोधी अधिकारी के रूप में जाने जाते हैं. हरियाणा कार्यकाल की बात करें तो अपने करियर की शुरुआत में हरियाणा में तैनाती के दौरान उन्होंने अवैध खनन, वाइल्डलाइफ सैंक्चुअरी में हुए घोटालों और सरकारी धन के दुरुपयोग को उजागर किया था.
एम्स दिल्ली में उनके कार्यकाल पर गौर करें तो 2012 से 2014 के बीच वे नई दिल्ली स्थित AIIMS में मुख्य सतर्कता अधिकारी यानी चीफ विजिलेंस ऑफिसर (CVO) रहे, जहां उन्होंने कई बड़े भ्रष्टाचार मामलों का पर्दाफाश किया. उन्हें रैमन मैगसेसे पुरस्कार मिला है. भ्रष्टाचार के खिलाफ निडर होकर लड़ाई लड़ने के लिए संजीव चतुर्वेदी को साल 2015 में इस अवॉर्ड से सम्मानित किया गया था.
पूरा मामला और ताजा विवाद की जड़
संजीव चतुर्वेदी अपने सेवा मामलों एनुअल अप्रैजल रिपोर्ट (APAR), सेंट्रल डेप्युटेशन, और सिस्टमैटिक करप्शन को लेकर सरकार और कई सारे ट्राइब्यूनल्स के फैसलों के खिलाफ लगातार कानूनी लड़ाई लड़ते आ रहे हैं. पिछले पांच सालों में उनका 12 बार ट्रांसफर हो चुका है.
CAT दिल्ली पीठ का ताजा मामला क्या है?
हालिया मामला उत्तराखंड सरकार के नवंबर 2021 के उस आदेश से जुड़ा है, जिसमें IFS अधिकारियों की अप्रैजल रिपोर्ट (APAR) चैनल के नियमों में बदलाव किया गया था. संजीव चतुर्वेदी ने इस आदेश को CAT में चुनौती दी थी. 21 सितंबर 2026 को CAT के सदस्य राजवीर सिंह वर्मा ने कुछ देर सुनवाई करने के बाद खुद को इस मामले से अलग कर लिया.
अब तक किन 17 जजों ने खुद को किया अलग?
संजीव चतुर्वेदी के केस में 2013 से शुरू हुआ यह सिलसिला अब तक 17 जजों तक पहुंच चुका है. सुप्रीम कोर्ट तक के 2 जज इससे हट चुके हैं. सबसे पहले 2013 में जस्टिस रंजन गोगोई और 2016 में जस्टिस यू. यू. ललित ने इस मामले से खुद को अलग किया था. वहीं उत्तराखंड हाईकोर्ट के 4 जज भी दूरी बना चुके हैं. इनमें जस्टिस राकेश थपलियाल (2023), जस्टिस मनोज तिवारी (2024), जस्टिस आलोक वर्मा (2025) और जस्टिस रविंद्र मैथानी (2025) शामिल हैं.
सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल यानी CAT के 9 जज भी हट चुके हैं. CAT के पूर्व चेयरमैन जस्टिस एल. नरसिम्हा रेड्डी (2019), जस्टिस आर.एन. सिंह (2021), जस्टिस मनीष गर्ग और छबीलेंद्र राउल (2023), जस्टिस हरविंदर ओबेरॉय, बी. आनंद (2025), जस्टिस राजीव जोशी (2025) और हाल ही में जस्टिस राजवीर सिंह वर्मा (2026) शामिल हैं. वहीं निचली अदालत की बात करें तो जिला न्यायपालिका के 2 अधिकारी भी खुद को अलग कर चुके हैं.
किसी केस से क्यों हटते हैं जज?
अदालती आदेशों में आमतौर पर जजों की तरफ से खुद को सुनवाई से अलग करने के पीछे का खास कारण दर्ज नहीं किया जाता है. हालांकि कानूनी प्रक्रिया के अनुसार अगर किसी भी जज को ऐसा लगता है कि उनका किसी पक्ष से पर्सनल या प्रोफेशनल संबंध या हित जुड़ा हो सकता है. या फिर किसी भी प्रकार कॉन्फ्लिक्ट ऑफ इंट्रेस्ट यानी ‘हितों के टकराव’ होने या निष्पक्षता पर सवाल उठने की आशंका हो तो वे खुद-ब-खुद ही उस मामले से हट जाते हैं.
IFS संजीव चतुर्वेदी के मामलों में दर्ज अधिकांश आदेशों में पर्सनल रीजन या बिना किसी स्पष्ट टिप्पणी के मामले को दूसरी बेंच के सामने लिस्ट करने का निर्देश दिया गया है.