रोहतास. शाहाबाद क्षेत्र खासकर रोहतास जिले में करीब 100 वर्षों से उगाए जा रहे पारंपरिक सोनाचूर धान को अब उसकी खास पहचान मिलने की उम्मीद बढ़ गई है. इस स्थानीय धान की गुणवत्ता, स्वाद, सुगंध और पोषण संबंधी विशेषताओं पर धान अनुसंधान केंद्र, रोहतास के वैज्ञानिक डॉ. प्रकाश सिंह ने विस्तृत अध्ययन किया है. डॉ. सिंह के अनुसार सोनाचूर धान का दाना देखने में आकर्षक होता है और चावल में प्राकृतिक सुगंध के साथ बेहतरीन स्वाद पाया जाता है. यह धान करीब 150 से 155 दिनों में तैयार होता है जबकि इसकी पौध की ऊंचाई लगभग 235 से 250 सेंटीमीटर तक पहुंचती है.
इसकी औसत उपज करीब 35 से 40 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है. डॉ. सिंह के मुताबिक सोनाचूर चावल में अन्य कई सामान्य चावल की किस्मों की तुलना में आयरन और जिंक की मात्रा अधिक है, वहीं इसका प्रोटीन कंटेंट करीब 11 से 12 प्रतिशत पाया गया है.
नहीं मिल पा रही थी पहचान
इन्हीं पोषण संबंधी खूबियों के कारण इसे एक तरह का बायोफोर्टिफाइड चावल भी माना जा सकता है. हालांकि इतनी खूबियों के बावजूद लंबे समय तक सोनाचूर धान को बाजार में उसकी गुणवत्ता के अनुरूप पहचान और उचित कीमत नहीं मिल पा रही थी. किसानों के सामने सबसे बड़ी समस्या यही थी कि स्थानीय स्तर पर इसकी विशेषता तो पहचानी जाती थी लेकिन व्यापक बाजार में इसकी अलग पहचान नहीं बन पाई थी.
इसी को देखते हुए डॉ. प्रकाश सिंह ने सोनाचूर धान की वैज्ञानिक और क्षेत्रीय स्तर पर विस्तृत पड़ताल शुरू की. उन्होंने यह जानने का प्रयास किया कि आखिर इस धान की खास गुणवत्ता किन परिस्थितियों में विकसित हुई और क्या इसका संबंध शाहाबाद क्षेत्र की भौगोलिक एवं कृषि परिस्थितियों से है.
60-70 गांवों से जुटाया धान का नमूना
डॉ. प्रकाश सिंह के अनुसार पिछले करीब तीन सालों के दौरान उन्होंने शाहाबाद क्षेत्र के 60 से 70 गांवों का दौरा कर सोनाचूर धान के नमूने और बीज का संग्रह किया. अलग-अलग गांवों से प्राप्त धान की किस्मों का अध्ययन किया गया. इसके बाद चयनित बीजों को करीब दो वर्षों तक शुद्धिकरण की प्रक्रिया से गुजारा गया ताकि सोनाचूर की वास्तविक और विशिष्ट किस्म को वैज्ञानिक रूप से स्थापित किया जा सके.
इसके बाद इसकी गुणवत्ता की जांच के लिए नमूने वाराणसी और कटक की प्रयोगशालाओं में भेजे गए. प्रयोगशाला जांच में सामने आए गुणवत्ता संबंधी परिणामों ने सोनाचूर की विशिष्टता के दावे को मजबूत आधार दिया. डॉ. सिंह बताते हैं कि अध्ययन के दौरान एक महत्वपूर्ण बात सामने आई कि शाहाबाद क्षेत्र में पैदा होने वाले सोनाचूर धान के चावल का स्वाद और गुणवत्ता विशेष रूप से बेहतर पाई गई.
यही बात इस धान को दूसरे क्षेत्रों में उगाई जाने वाली समान किस्मों से अलग पहचान देने में महत्वपूर्ण मानी जा रही है. वैज्ञानिक अध्ययन में यह भी सामने आया कि शाहाबाद क्षेत्र की मिट्टी, जलवायु और यहां की कृषि परिस्थितियां सोनाचूर की गुणवत्ता को प्रभावित करती हैं.
सोन नदी के पानी और शाहाबाद की भौगोलिक परिस्थितियों का भी संबंध
डॉ. सिंह के मुताबिक सोनाचूर की विशिष्टता के पीछे शाहाबाद क्षेत्र की भौगोलिक परिस्थितियों और सोन नदी से होने वाली सिंचाई की भूमिका भी सामने आई है. किसानों का भी मानना है कि सोन नदी के पानी, क्षेत्र की मिट्टी और स्थानीय जलवायु का संयुक्त प्रभाव इस धान के स्वाद और गुणवत्ता को खास बनाता है. यही वजह है कि शाहाबाद क्षेत्र में उत्पादित सोनाचूर को एक अलग भौगोलिक पहचान दिलाने की प्रक्रिया शुरू की गई.
पांच जिलों के किसानों को जोड़कर बनाया संगठन
सोनाचूर को सामूहिक पहचान दिलाने के लिए रोहतास के अलावा कैमूर, भोजपुर, बक्सर और औरंगाबाद के कुछ किसानों को भी जोड़ा गया. इन किसानों के साथ मिलकर ‘शाहाबाद सोनाचूर धान उत्पादक संघ’ नाम से एक सोसाइटी का बिहार में पंजीकरण कराया गया. इसके बाद इसी संगठन के माध्यम से भारत सरकार के सामने सोनाचूर धान के लिए GI टैग प्राप्त करने का आवेदन दिया गया.
डॉ. प्रकाश सिंह के अनुसार GI टैग की प्रक्रिया में आवश्यक दस्तावेज, किस्म की पहचान, गुणवत्ता संबंधी जांच और अन्य महत्वपूर्ण प्रक्रियाएं लगभग पूरी हो चुकी हैं. अब आने वाले दो से तीन महीनों में सोनाचूर धान को GI टैग मिलने की पूरी उम्मीद जताई जा रही है. GI टैग मिलने के बाद शाहाबाद के इस पारंपरिक धान को आधिकारिक भौगोलिक पहचान मिल सकेगी और इससे किसानों को अपने उत्पाद को विशिष्ट ब्रांड के रूप में बाजार तक पहुंचाने में मदद मिलने की संभावना है.
कोGI टैग से किसानों मिल सकती है नई बाजार पहचान
सोनाचूर धान को GI टैग मिलने से केवल एक पारंपरिक फसल को पहचान ही नहीं मिलेगी बल्कि इसके उत्पादक किसानों के लिए भी नए बाजार के रास्ते खुल सकते हैं. स्थानीय स्तर पर लंबे समय से उगाई जा रही इस किस्म को अगर प्रमाणित भौगोलिक पहचान मिलती है तो इसके नाम पर बाजार में अलग पहचान बनाई जा सकती है. इससे किसानों को अपनी उपज की बेहतर ब्रांडिंग और संभावित रूप से बेहतर मूल्य प्राप्त करने का अवसर मिल सकता है.
डॉ. प्रकाश सिंह का कहना है कि सोनाचूर केवल एक पारंपरिक धान की किस्म नहीं बल्कि शाहाबाद क्षेत्र की कृषि और भौगोलिक पहचान से जुड़ा उत्पाद है. वर्षों से किसानों के खेतों में सुरक्षित रही इस विरासत को वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित कर GI टैग दिलाने की कोशिश अब अंतिम चरण में पहुंच चुकी है. आने वाले महीनों में GI टैग की प्रक्रिया पूरी होने के साथ ही रोहतास समेत पूरे शाहाबाद क्षेत्र के लिए यह कृषि क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि होगी.